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आदिवासी और मुण्डा जाति पर एक लेख प्रस्तुत है!


सबसे पहले यह जान लें कि आदिवासी शब्द भारत के आदिम मूलनिवासी के शब्दकोश में नहीं थी। यह शब्द सवर्णों या गैर आदिवासियों ने हीन भावना से कही थी।भारत के प्राचीनतम आदिवासियों को महज #मानोवा #होन यानी मानव कहा जाता था। हाड़प्पा संस्कृति के पूर्व आदिवासियों का सिर्फ दो वर्ग था। एक #कोल और दुसरा #भील ! लेख को संक्षिप्त करने के लिए हम सिर्फ #कोल और मुण्डाओं का बिश्लेषण करेंगे।


कोल समुदाय का पुनः उपविभाजन हूआ ।
1.मुनु होड़ो यानी मुण्डा और हो जन जाति।
2.मुनु होड़ यानी संथाल और पहाड़िया जन जाति।
3.होड़ो यानी खड़िया जनजाति जो मुण्डा और असुर की एक कड़ी है।
4.उरांग यानी उराँव ! भाषा वैज्ञानिकों ने भारत के उराँव आदिवासियों को मुण्डा, हो, संथाली और खड़िया से अलग रखा है। उराँव जनजाति संभवता सिन्धु घाटी में सुर और असुर की लड़ाई के बाद दक्षिण भारत चले गये थे। दक्षिण से कुछ लोग पुनः छोटानागपुर के पठार में लौट आए थे। तमिल भाषा में कुछ मुण्डारी शब्दों का होना । इस बात का प्रमाण है कि कुछ मुण्डा/हो लोग तमिलनाडु-केरल तक गये या उराँव लोगों ने मुण्डारी शब्दों का प्रचार किये हों! कुडुख बोली द्रविड़ भाषा यानी कन्नड़-तमिल-कोंकण से उदभव हुआ होगा। मुण्डा पूरखे कहते हैं कि उराँव लोगों को शरण दिए थे। एक मुण्डा ने एक कुडुख आदमी को खेत कोड़ने का आदेश दिया था।वह रात भर कोड़ कर सुबह कर दिया। कोड़कर सुबह करने को मुण्डारी में #ऊरआंङ कहते हैं। इसी से कुडुख लोगों के जाति का नाम #उरांग पड़ा। आज विकृत हो कर #उराँव हो गया। मुण्डाओं ने ही उराँव जन जाति को गाँव में शरण दिये थे। खेती के लिए जमीन दिए थे। यहाँ तक की कुछ मुण्डाओं ने अपनी बेटी भी दे दिए थे। भले कुछ प्रेम-विवाह ही रहा हो। मुण्डा और उराँव से सृजित लोगों को #केरोमुण्डा कहा गया।

आज कुछ मुण्डा कहते हैं कि #सरनाझंडा उराँव लोगों की है लेकिन उन्हे यह पता नहीं है कि उराँव जनजाति मुण्डाओं के सनिध्य में रहने के कारण। मुण्डा संस्कृति का ही अनुकरण किए हैं। अब पुनः सिन्धु घाटी से एक दल काशी-बनारस होते हूए नेपाल ,भूटान तक गया। दुसरा दल #नागापूर आए।यहाँ नागा राजाओं का साम्राज्य था। जब नागापूर में आर्यों से लड़ाई हूई तो कुछ #कोल सीधे #नागालैंड गये।रास्ते में संथालपरगना में जो रहे वही संथाल कह लाए।#नागापूर से जो #छोटानागपुर के पठार में आए वही #होड़ो थे यानी मुण्डा। वास्तव में काबिला का हेड को ही #मुण्डा कहा जाता था। मुण्डा, हो, खड़िया, संथालों की जाति तो #होड़ो थी और बोली #होड़ोजगर! यह महज एक उपजाति थीं। मुण्डाओं में पहले काबिला या कुनबा का मूखिया को #मुण्डा और युद्ध-लड़ाई का सेनापति को #सरदार कहते थे। यही कारण है आज भूमिज मुण्डा लोग #सरदार लिखते हैं।

खूँटी के मुण्डा लोग खुद को #हासादाः मुण्डा कहते हैं। बंगला में #भूमिजल यानी भूमिज मुण्डा। सुतियम्बेगढ़ का सुतिया पहाड़ पर ही मुण्डाओं का काबिला शरण लिया था। पहाड़ की चोटी पर दुनुब/सभा होती थी। उस सभा के बुद्धिजीवी लोगों को कुम्पाट मुण्डा कहा जाता था। नागाओं के वंशज थे इसलिए स्वयं को #नागावंशी कहते थे। पहले कुम्पाट मुण्डा फिर सुतिया मुण्डा को राजा बना दिया गया। कालान्तर में आबादी बढ़ी। फिर सुतिया मुण्डा ने निर्णय लिया कि भविष्य में अपनों को पहचानने में चूक हो सकती है। इसलिए पवित्र कुम्पाट स्थल में बुद्धिजीवी मुण्डाओं को #संकेत या #स्मृतिचिन्ह दिया। जो आज #किली या #गोत्र कहलाया। शुरुआत में 24-28 किली दिया गया था। लेकिन आज उपविभाजन होकर 143 के लगभग है। राजा मादरा मुण्डा अन्य पड़हा मुण्डा राजाओं को भी दिशनिर्देश देते थे। इसलिए महाराजा मादरा मुण्डा कहलाए। मादरा मुण्डा के साम्राज्य में ही बनारसी ब्राह्मण #बामड़े लोगों का आगमन हूआ। महाराजा मादरा मुण्डा ने राजपूत राजाओं की नकल में ब्राह्मण राजपुरोहित रखा जो #मुण्डाओं के साम्राज्य/राजपाठ पतन का मूख्य कारण था। जब फणीमुकुट राय नागवंशी राजा बना तो राजपूत और ब्राह्मणों ने घेर लिया। आदिम मुण्डाओं नें सुतियम्बेगढ़ छोड़ना उचित समझा। लेकिन फणीमुकुट को अपना राजा और ब्राह्मणों को अपना पूजारी के रूप में स्वीकार नहीं किए। आज भी 80% पड़हा राजा लोग पाहन से ही पूजा कराते हैं। कुछ पड़हा राजा ईसाई भी बन गये हैं। ईसाई पड़हा राजाओं को भी मुण्डाओं ने दिल से स्वीकार नहीं किया है।


आज भी कुछ लोग ईसाइयों को आदिवासी की श्रेणी में देखना नहीं चाहते हैं। लेकिन जरुरत है हिन्दुत्व यानी मन्दिर में पूजा करने वाले आदिवासियों को सबसे पहले ST सूचि से बाहर करने की। आदिवासियों की पहचान से पहले मुण्डाओं की पहचान को जानें:-


1.होड़ोजगर यानी मुण्डारी बोली की जानकारी
2.मुण्डाओं के नेग-बाः,बताऊली,मागे, फागु सेन्देरा
3.मुण्डाओं की संस्कृति-गोनोंग, लोकगीत, लोकनृत्य
4.धरम-संस्कार-सरना विधि से जन्म,शादी, मृत्यु संस्कार
5.ससनदिरी-गाँव में स्व हड़गाड़ी और मासड़ा हों!
6.आदिवासी जमीन-भूंईयारी, खुटकटी,CNT दायरा ।
7.मुंडाई,डालीकतरी/पहनाईत जमीन, जायरा,भूतखेता
8.मृत शरीर या जंगबा/हड्डी को गाड़ते हों और कब्र में पत्थर चढ़ाते हों, हड़गाड़ी के पास पत्थलगड़ी करते हों!
9.सिङबोंगा, पूरखा और प्राकृतिक का उपासक हों!
10.मुण्डाओं की रीति-रिवाज और दस्तूर को मानते हों!


Note:-नंगपरिया में ऊपर सूरज,चाँद-सितारे बारिस और बादल-बिजली थे। धरती पर नदी-नाला,पहाड़-पर्वत, गाछ-वृक्ष, पशु-पक्षी ,हवा-पानी और माटी-पत्थर!
बगल में आजा-आजी और माँ-आबा !
इसलिए हमारे ईश्वर सिर्फ प्राकृतिक और पूरखे ही हैं!
सोना-चाँदी,हीरे-जवारत और रेशमी वस्त्र से लदे देवी-देवता नंगपरिया में नहीं थे। झोपड़ी के बदले घोंसला और गुफा होते थे। इसलिए इस धरती में मन्दिर, मस्जिद, गिरजा,गुरुद्वारा सब पापी मानव की रचना है।


सिर्फ प्राकृतिक और पूरखों की आराधना ही एक सत्य है, सरना धरम है, विज्ञान है! बस ठंडा दिमाग से साखुआ वृक्ष और पत्थर की मूर्ति की तुलना करें। आप को एक वृक्ष ही मानव और प्राणी के लिए लाभकारी प्रतीत होगा।
जोअर-जोअर!

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