पूर्व पाषाण काल(Pre stone age) में आग का अविष्कार नहीं हुआ था। इसलिए शेर जैसा अन्य जानवरों को कच्चा खाते थे। मानव भी जंगली जानवरों को वैसा ही कच्चा खाते थे। लेकिन शेर के प्राजाति को मानव से और मानव को भी जंगल में सबसे अधिक शेर-भालू से ही डर लगा होगा। जानवरों में यह प्रवृत्ति देखा गया है कि एक बार इंसान का खून या मांस चख लेने के बाद #आदमखोर बन जाते थे। इस बात की जानकारी हमारे आदिम पूरखों को भी थी। जंगली जानवर इंसानों पर एक बार हमला करने के बाद,भविष्य में भी इंसानों को निशाना बनाते हैं। बचने का एक ही उपाय था। मृत शरीर को दफना दें या जला दें!


आग का अविष्कार नहीं हुआ था। इसलिए चिता का विधान अस्तित्व में नहीं था। अतः प्राचीन विधि में शव को #गाड़ना ही था। फिर पाषाण काल में भी पत्थर के औजार थे। इसलिए बालू में या आधा-आधूरे गड्डा करके गाड़ते थे। गड्डा कम होने पर शेर, लकड़ा बाघा शव को कब्रगाह से निकाल कर खाते थे। इसकी रोकथाम के लिए एक उपाय था ,कब्र के ऊपर पत्थर चढ़ाना। कालांतर में यही पत्थर #ससनदिरी बन गया।पाषाण काल की इतिहास में ससनदिरी को ही #महापाषाण कहा जाता था। पूरखों ने कब्र का पत्थर को पूर्वजों की स्मृति चिन्ह के रुप में भी देखा। धीरे-धीरे यह आदिम पारम्परा एक #मृत्यु #संस्कार का रुप ले लिया। नया पत्थर को चढ़ाने एवं शुद्धिकरण के दिन पूराने पत्थर को भी तलाशे जाते हैं। लेकिन पत्थर का माटी में दबना और झाड़ी में छुपना आम बात थी। अतः कब्र के ऊपर पत्थर रखना और बगल में स्मारक पत्थर गाड़ना भी एक संस्कृति बन गयी।

स्मारक पत्थर पर आकृति बनाना भी एक कलाकृति है। अधिकतम लोग #छातरी या उगता #सूरज की छवि बनाते थे। फिर #लिपि का अविष्कार हुआ तो नाम -पता भी लिखना शुरू कर दिए थे।

आज जरुरत है, आदिवासियों को संविधान की शक्ति एवं 5वीं-6वीं में वर्णित हक,अधिकारी की सरल जानकारी देना। यानी आदिवासी हित और स्मृति की बातों को बतलाना भी एक संस्कृति है !


अब पत्थलगड़ी के कुछ महत्वपूर्ण प्रकार का बिश्लेषण भी जान लें!


1.हाड़गड़ी में-जहाँ पर मृत शरीर का नाखून या हड्डी को मिट्टी की हांडी में गाड़ा जाता है।
2.असमय या अश्वभाविक मृत्यु होने पर भी रास्ता किनारे पत्थर गाड़े जाते हैं।
3.ससनदिरी, शमसान में भी मुण्डा एवं पाहन के पत्थरों को विभक्त किया जाता हैँ
4.किसी बिशेष व्यक्ति की कब्र को बिशेष पहचान के लिए।
5.गाँव और मौजा का सीमांकन के लिए।
6.किसी व्यक्ति को #ताड़ीपार की सजा देने पर ।
7.प्रेमी-प्रेमिका का एक #किली या #गोत्र का होने पर। इस सामाजिक अपराध को #गोत्रबोध और #जातिबोरा की संज्ञा दी गयी है।इसकी सजा गाँव से निकालना और सीमा पर स्मृति स्वारूप एक पत्थर गाड़े जाते हैं।
8.भाई.भाई में जमीन का बाँटवारा के लिए।
9.गाँव का जातरा टाँड़ में !
10.अपने घर के बगान में मारंगबोंगा के लिए।
11.गाँव का मुण्डा ,कितना मौजा को संभालता है। उसकी जानकारी के लिए।
12.पड़हा राजा लोग भी किस गोत्र का पड़हा राजा है। लिख दिया जाता है। #तिडुपड़हा, #टुटीपड़हा कुछ उदाहरण हैं।


Note:-पत्थरगड़ी के लगभग 41-42 प्रकार है।


संक्षिप्त में इतना जान लें कि पत्थर पर अपने समाज हित की बातें लिखना कोई #अपराध या #देशद्रोह नहीं है। पूरखे अनपढ़ थे इसलिए सिर्फ संकेत बनाते थे। आज शिक्षित हैं तो शिलालेख भी संभव है। It is just like a pre permission to enter in Village. May I come in sir! फूल तोड़ना मना है! कुत्तों से सावधान ! ग्रामसभा यदि गाँव की कानून व्यवस्था को सशक्त बनाती हैं तोंं ,सरकार को सहयोग करनी चाहिए। कोई आगन्तुक बिना अनुमति का क्यों प्रवेश करें ?

***