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प्रोमिथ्यस प्रताप सिंह द्वारा प्रस्तुत

13 मई 1942* इतिहास के पन्नों में आज का दिन एक दर्दनाक, भयावह घटना के रूप में मौजूद है। आज के दिन आश्विट्ज़ के गैस चेम्बर में लगभग 1400 यहूदियों को मारा गया था।आश्विट्ज़ जो दक्षिणी पोलैंड में औसवेसिम के औद्योगिक शहर के पास स्थित है, द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत में जर्मनी द्वारा यहां कब्जा कर लिया गया था। यहां हिटलर की नाज़ी सेना के तीन तरह के शिविर थे जेल शिविर, यातना शिविर, गुलाम मज़दूर शिविर।


इस यातना शिविर में 1.5 लाख लोगों को मारा गया था, जिसमें 90 प्रतिशत यहूदी थे। इन शिविरों में आए कैदियों को उनकी आयु और शारीरिक क्षमता के अनुरूप विभाजित किया जाता। हृष्ट-पुष्ट कैदियों से ज़्यादा भारी भरकम काम कराये जाते। बच्चों, महिलाओं और बूढ़े कैदियों को सीधे गैस चेम्बर में भेज दिया जाता था। इसके अलावा हजारों कैदियों को यातना शिविर के डॉक्टर जोसेफ मेंगेले के द्वारा मेडिकल शोध करने के लिए रखा जाता। यहां कैदियों पर बड़े पैमाने पर विकिरण की खुराक, गर्भाशय इंजेक्शन व अन्य बर्बर शोध उन पर आजमाए जाते। गर्भाशय से जुड़वा बच्चों को मार कर उनके शवों पर अच्छे ऊंचे नस्लों(aryan race) को पैदा करने का शोध भी शामिल था।
हिटलर की क्रूरता और विश्वविजय के सपने ने जो किया उसे हमें व भावी पीढ़ियों को जानना, पढ़ना-पढ़ाना ज़रूरी है ताकि ऐसी विचारधारा दोबारा न जन्में।


तस्वीरों का विवरण-गैस चैंबर में ले जाने से पहले कैदियों की मार्मिक तस्वीर, गैस चेम्बर की तस्वीर, कैदियों के बैरक की तस्वीर, गैस चेम्बर के अंदर कैदियों के बर्बरता, जिसमें दीवालों पे संघर्ष के निशान मौजूद हैं।

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