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जबलपुर/ भारत मे विभाजन कारी राजनीति का प्रयोग 1961 में जबलपुर में हुए साम्प्रदायिक दंगे से आरंभ हुआ जिसका तीव्र प्रतिरोध कॉमरेड महेन्द्र बाजपेयी जैसे साथियों ने किया। आज समाज और देश को बांटने वाली यह राजनीति अपने चरम पर है। लेकिन साथ ही लोगों का जनतांत्रिक प्रतिरोध भी जारी है और वर्तमान संदर्भों में कन्हैया कुमार इसका एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। यह विचार दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं जाने माने विचारक अपूर्वानंद ने कॉमरेड महेन्द्र बाजपेयी स्मृति व्याख्यान में मुख्य वक्तव्य प्रदान करते हुए व्यक्त किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता कॉमरेड अरविन्द श्रीवास्तव, एडवोकेट ने एवं संचालन सत्यम पाण्डेय ने किया।


कार्यक्रम के आरंभ में ट्रेड यूनियन कॉउंसिल के अध्यक्ष एस वी रानडे ने कॉमरेड महेन्द्र बाजपेई के जीवन,संघर्ष और विचारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि बाजपेयी जी जबलपुर में ट्रेड यूनियन आंदोलन के संस्थापक थे और उनकी स्मृति, मेधा, जिजीविषा का लोहा सभी मानते थे।
मुख्य वक्तव्य प्रदान करते हुए प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि विभाजन कारी राजनीति ने न केवल लोगों को जातीय और साम्प्रदायिक आधार पर बाँट कर वोटों की गोलबंदी की है बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के अंदर राजनैतिक आधार पर विभाजन किया है। खासतौर पर सेना के सत्ताधारी दल के हित मे इस्तेमाल से देश के भविष्य पर एक गहरा सवालिया निशान लग गया है। क्योंकि राजनैतिक मतभेदों के बावजूद अब तक लोग देश की सेना पर सर्वाधिक विश्वास करते थे। उन्होंने वर्तमान में जारी लोकसभा चुनाव के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस चुनाव में नेताओं की नहीं बल्कि देश की तकदीर तय होनी है और हमें विभाजन कारी राजनीति और जनतंत्र में से एक का चुनाव करना है।


व्याख्यान के अवसर पर प्रो. ज्ञानरंजन, डॉ. मलय, प्रो. कुंदन सिंह, परिहार, विजेन्द्र सोनी, एस के मिश्र,पीके बोस, देवेन्द्र सुरजन, राजेन्द्र दानी, पंकज स्वामी, बसंत काशीकर, अशोक शिरोडे,आशीष पाठक, प्रकाश दुबे, विनय अम्बर, सुप्रिया अम्बर, आर एस तिवारी, अनिल शर्मा, शब्बीर मंसूरी, मुस्तफा अंसारी, रुचिरा गुप्ता, आरती साकेत, अजय यादव, शिवकुमार चौधरी, कृष्णा चौधरी, अजय सिंगोर, अनिल करने, तनवीर हर्ष,कुणाल, रामप्रवेश, शरद अल्बल, अर्णब दास गुप्ता और अखिलेश कुमार आदि उपस्थित थे। आभार ज्ञापन राजेन्द्र गुप्ता ने किया।

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