देश में लोकसभा चुनाव का अर्थ क्या है? कौन जीतेगा- देश ,दल या नेता? विश्लेषण : गणेश कछवाहा

6.05.2019

कोई भी देश अपने संविधान नियम व कानून से चलता है।देश का संविधान ही पूरे देश को न्यायसंगत एक सूत्र में बांधे रखने में सहायक होता है।भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह काफी महत्वपूर्ण है।आम जनता के मौलिक संवैधानिक अधिकार,लोकतंत्र,साम्प्रदायिक सद्भाव व राष्ट्रीय एकता की हिफाज़त,मजबूती और उसे अक्षुण्ण बनाये रखने में संविधान की प्रमुख भूमिका है।

देश मे लोकसभा चुनाव हो रहे हैं।चुनाव के दौरान जिस तरह से नेताओं के बयान आ रहे हैं।जो मुद्दे जनता के सामने रखे जा रहें हैं या जिस प्रकार के उम्मीदवारों को प्रत्याशी बनाया जा रहा है,तथा संविधान पर ही आक्रमण करने की साजिश हो रही है ,चुनावों में संविधान का खुले आम उल्लंघन हो रहा हो और चुनाव आयोग के ईमानदारी, निष्ठा और निष्पक्ष पूर्ण जिम्मेदारी पूर्वक कार्य न करने पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो रहा हो तब देश का चिंतित होना और यह सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है कि आखिर देश में हो रहे लोकसभा चुनाव का अर्थ क्या है?और इस चुनाव में कौन जीतेगा- देश,दल या नेता?यह समझना होगा कि देश का मतलब सबलोग अर्थात जनता होती है।

क्या चुनाव में यह सवाल उठना महत्वपूर्ण नहीं है कि-
देश में साल 2014 से 2016 तक, तीन वर्षो के दौरान ऋण, दिवालियापन एवं अन्य कारणों से करीब 36 हजार किसानों एवं कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की है. कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने 2014, 2015 के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े तथा वर्ष 2016 के अनंतिम आंकड़ों के हवाले से लोकसभा में यह जानकारी दी.


लोकसभा में एडवोकेट जोएस जार्ज के प्रश्न के लिखित उत्तर में कृषि मंत्री ने कहा कि गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के ‘भारत में दुर्घटना मृत्यु तथा आत्महत्याएं’ नामक प्रकाशन में आत्महत्याओं से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014 में 12360 किसानों एवं कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की जबकि वर्ष 2015 में यह आंकड़ा 12602 था वर्ष 2016 के लिये राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनंतिम आंकड़ों के मुताबिक 11370 किसान एवं कृषि श्रमिकों के आत्महत्या की बात सामने आई है.
कृषि मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2015 की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में दिवालियापन या ऋण के कारण 8007 किसानों और 4595 कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की।

बेरोजगारी और रोजगार का सवाल


सर्वे के मुताबिक 2011-2012 में बेरोजगारी की दर 3.8 फीसदी थी जो बढ़कर 2012-2013 में 4.7 फीसदी और 2013-14 में 4.9 फीसदी हो गई थी। मोदी सरकार के सत्ता में आने का वर्ष यानी 2014-2015 में मंत्रालय ने सर्वे नहीं किया। उसके अगले साल 2015-2016 में यह दर घटी नहीं बल्कि और बढ़ गई। इस साल यह दर बढ़कर 5 फीसदी हो गई। यानी केंद्र में सरकार बदलने से देश में बेरोजगारों के हालात नहीं सुधरे। बता दें कि नरेंद्र मोदी ने चुनावी रैलियों में प्रति वर्ष दो करोड़ लोगों को नौकरी देने का वादा किया था।

संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि साल 2019 तक बेरोजगारों की संख्या बढ़कर 1 करोड़ 89 लाख हो जाएगी। इस रिपोर्ट के अनुसार 2019 में भारत में कुल कर्मचारियों की संख्या 53.5 करोड़ होगी मगर उनमें से 39.8 करोड़ लोगों को उनकी योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं मिलेगी। मौजूदा साल में भी बेरोजगारी की हालत में सुधार के संकेत नहीं हैं। यानी आने वाले दिनों में देश में रोजगार की स्थिति और बदतर हो सकती है।

गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों के जीवन का सवाल


हमारे देश की जनसंख्या सवा सौ करोड़ से ज्यादा है। इसमें करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवन यापन करते हैं। इनमें से शेड्यूल ट्राइब (एसटी) के 45.3% और शेड्यूल कास्ट (एससी) 31.5% के लोग इस रेखा के नीचे आते हैं। इसकी जानकारी सरकार के मंत्री राव इंद्रजीत सिंह लोकसभा में दी। मंत्री ने बताया कि वर्ष 2011-12 के आंकड़े के मुताबिक देश में करीब 27 करोड़ लोग (21.92%) गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। शेड्यूल ट्राइब के 45.3% और शेड्यूल कास्ट के 31.5% लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं।
इससे पहले हाल ही में लोकसभा में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने जानकारी दी थी कि देश में स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ने (ड्रॉप आउट) वाले बच्चों में शेड्यूल कास्ट, शेड्यूल ट्राइब और मुस्लिम समुदायों के छात्रों की संख्या सर्वाधिक है। उन्होंने जिला शिक्षा सूचना प्रणाली के अनुसार बताया कि मुस्लिम और शेड्यूल कास्ट/शेड्यूल ट्राइब के विद्यार्थियों का ड्रॉप आउट देश के औसत ड्रॉप आउट से अधिक है।
ठीक इसी प्रकार शिक्षा और स्वास्थ्य का सवाल ,संविधान लोकतंत्र, व राष्ट्रीय एकता की हिफाज़त का सवाल गरीबी और भुखमरी का सवाल चुनाव का प्रमुख मुद्दा क्यो नहीं है? जब ये सवाल चुनाव के हिस्से नहीं होंगे तो फिर आखिर इस चुनाव का अर्थ क्या होगा? आखिर इस चुनाव में कौन जीतेगा देश, दल या कोई व्यक्ति जिसे हम नेता कहते हैं।?

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