ख्यातिनाम कवि नरेश सक्सेना ने समझाया कविताओं का मर्म : विचार मंच का आयोजन , बिलासपुर .

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बिलासपुर लाइव से आभार सहित

6.05.2019

देश के जाने-माने कवि और विचारक Naresh Saxena का मानना है कि विचार ही हमें जानवर से मनुष्य बनाता है और विचार करने से सवाल पैदा होते हैं पर आज हालात ऐसे बन गये हैं कि सवाल पूछे जाने पर आप देशद्रोही ठहरा दिये जाएंगे और अधिक सवाल करेंगे तो आपकी हत्या भी हो सकती है।

संवाद और परिचर्चा पर केन्द्रित साहित्यकार द्वारिका प्रसाद अग्रवाल की संस्था ‘विचार मंच’ के 25 वर्ष पूरा होने पर आयोजित कार्यक्रम में लखनऊ से विशेष रूप से पधारे श्री नरेश सक्सेना ने कहा कि विचार के बिना हम कुछ भी नहीं हैं। यदि हम जानवर से मनुष्य बने हैं तो विचार के ही कारण बने। विचार आस्था का निषेध करता है। आस्था में सवाल नहीं पूछे जाते सिर्फ समर्पण होता।

विचार के स्रोत के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि देखना एक बहुत बड़ी क्रिया है। जब हम कुछ देखा करते हैं तब हमारे मन में विचार पैदा होता है। कई बार हम आंखों से देखते हैं लेकिन कई बार कानों से सुन कर भी कोई चीज देखते हैं। नाक से महक महसूस करके और होठों से चखकर भी देखते हैं। फिर किसी वस्तु या विषय पर अपना विचार बनाते हैं। यह साधारण क्रिया नहीं है। देखना, सोचना, प्रश्न करना और उसका समाधान ढूंढना विज्ञान संभव करता है। जिस तरह बिना विचार के विज्ञान संभव नहीं उसी तरह कविता भी संभव नहीं।

सक्सेना ने कहा कि बिना विचार के कविता फलित नहीं होती है। कविता का पहला सूत्र है, बहुत थोड़े से में बहुत ज्यादा कह देना। यदि बहुत सारे शब्द हैं और थोड़ा सा कथन है तब वह कविता है ही नहीं। दूसरा सुंदर कविता का सौंदर्य या ताल, छंद में या फिर कल्पनाशीलता में हो सकती है। यदि कविता रमणीय नहीं है तो वह स्मरणीय कैसे होगी? और अगर स्मरणीय नहीं हुई, फिर तो सुन लिया और बस फिर खत्म। कविता जब तक आप की स्मृति में उतर नहीं जाएगी तब तक काम नहीं करती। कविता कैसे स्मरणीय होगी इसका कोई फार्मूला नहीं है हर बार कवि एक नया अविष्कार करता है। जैसे कोई वैज्ञानिक करता है।

उन्होंने डॉक्टर संजय चतुर्वेदी की कविता को इसके उदाहरण के रूप में रखा

सभी लोग समान हैं

सभी लोगों को है समानता का अधिकार

सभी चीजें सभी लोगों के लिए है

बाकी लोग अपने घर जाएं…।

नरेश सक्सेना ने कहा कि आजकल यह बहस होती है कि कविता छंद में है या उससे बाहर। मेरा कहना है कविता छंद में हो या ना हो, है तो वह कविता ही। उन्होंने बताया कि एक शब्द के कई पर्याय होते हैं पर कविता में सटीक शब्दों के प्रयोग से ही सौंदर्य आ सकता है। जैसे कहीं आकाश लिखा जाना जरूरी है तो आप नभ या आसमान लिखकर काम नहीं चला सकते।

उन्होंने यह रोचक जानकारी दी कि हमारी ज्यादातर कविताएं यहां तक कि नर्सरी कक्षाओं में बच्चों के रिद्म भी ताल कहरवा में होती हैं। उसके बाद दादरा और मिश्रित धुनों में कविताएं लिखी जाती हैं।

उन्होंने नागार्जुन की कविता कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास कविता को डायस थपथपा कर ताल कहरवा में गुनगुनाकर बताया। उन्होंने दादरा तथा दूसरे धुनों में आबद्ध कविताएं भी सुनाईं। इसके बाद उन्होंने अपनी खुद की भी कई कविताएं सुनाईं, जिस पर खचाखच भरा हाल बार-बार तालियों से गूंजता रहा।

विचार मंच का रजत जयंती वर्ष पर आयोजित यह कार्यक्रम सीएमडी महाविद्यालय स्पोर्ट्स कॉमप्लेक्स सभागार में रखा गया था। कार्यक्रम में 25 वर्षों में जिन महत्वपूर्ण हस्तियों को आमंत्रित किया गया, उनके नाम लिए गये और साथ ही उन लोगों को याद किया जो इन वर्षों से उनके साथ रहे और उन्हें भी जो अब दिवंगत हो गये।


(रिपोर्ट सौजन्य : श्री राजेश अग्रवाल)

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