यही है हमारा बिलासपुर – द्वारका प्रसाद अग्रवाल .


यही है हमारा बिलासपुरजहां लोग बसते हैं, वहाँ बस्तियाँ बस जाती हैं। आम तौर पर बस्तियाँ वहाँ रूप लेती हैं जहां पानी उपलब्ध होता है। खोड्री के पहाड़ से निकली एक बरसाती नदी अरपा अपने आसपास मनुष्यों की आबादी को निमंत्रित करती हुई बहती रही और उसके पावन जल के आसरे लोग सदियों से जीते आ रहे हैं। उद्गम से लगभग 80 किलोमीटर दूर अरपा नदी का पाट बहुत चौड़ा हो जाता है, वहां उसके दोनों छोर पर लोग अपने घर बनाकर बस गए जिसे अब सब बिलासपुर कहते हैं।

कहते हैं, बिलासा नाम की मछुआरिन के नाम पर इस बस्ती का नामकरण हुआ। इस बात का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, मिथक जैसा लगता है लेकिन दिल को खुशी देता है कि उस जमाने में किसी स्त्री को ऐसा सौभाग्य मिला। अरपा नदी के किनारे बसी यह छोटी सी बस्ती दिनों-दिन पसरती जा रही है, किसी दानव की मानिंद अपने अगल-बगल की उपजाऊ जमीन को लीलते हुए क्रांकीट के मकानों की शक्ल ले रही है। धान की उपज देने वाले खेत अब धन उगल रहे हैं। बिलासपुर में वे लोग अब नहीं रहते जो रहते थे, होते थे; अब इस शहर में ऐसे लोग रहते हैं जो न होने के बराबर हैं। हर इन्सान अकेला रहता है, अपने घर में भी अकेला रहता है। पहले ऐसा न था, सब एक साथ रहते थे, पूरी बस्ती किसी अविभाजित संयुक्त परिवार की तरह एक-दूसरे से हिल-मिल कर रहती थी।

यह है जूना बिलासपुर :

छत्तीसगढ़ी भाषा में ‘जूना’ का अर्थ है, पुराना। जानकार लोगों का अनुमान है कि सबसे पुरानी बस्ती अरपा नदी के किनारे पचरीघाट के आसपास बसी होगी जिसका विस्तृत क्षेत्र जूनाबिलासपुर कहलाता है। यहाँ सभी जाति और व्यवसाय के लोग रहते हैं, पुरानी शैली के घर हैं, पतली गलियां हैं और पुराना रहन-सहन भी। किसी जमाने में यहाँ घरेलू वस्तुओं के कुटीर उद्योग थे। आवागमन के साधन नहीं थे इस कारण सब लोग स्थानीय उत्पादन पर आश्रित थे। कोष्टापारा में कपड़े बुने जाते थे, कुम्हारपारा में मिट्टी के बर्तन बनते थे। तेलीपारा में घानी की मदद से तेल निकाला जाता था, काछीपारा में सब्जी उगाई जाती थी। पारा का अर्थ है मोहल्ला जो बांग्ला भाषा के ‘पाड़ा’ से प्रभावित लगता है। घसियापारा, डबरीपारा, जबड़ापारा, चाटापारा, मगरपारा, इमलीपारा, तालापारा, लोधीपारा, ईरानीपारा, केवटपारा, नाऊपारा, गोंडपारा, बंगालीपारा, बरछापारा, कतियापारा, ब्राह्मणपारा, टिकरापारा, तारबाहर, शनीचरी पड़ाव आदि पुराने मोहल्लों के नाम वहाँ के व्यापार, रोजगार या समूह के आधार पर रखे गए समझ आते हैं। तोरवा, कर्बला, सरकंडा, चाटीडीह, दयालबंद, मसानगंज, खपरगंज, जूनीलाईन, कुदूदंड, जरहाभाटा आदि अनेक प्राचीन मोहल्ले हैं लेकिन इनके नाम के गुणसूत्र का पता नहीं है, ये मोहल्ले अब भी बड़ी शान से कायम हैं।

बिलासपुर सन 1861 के पूर्व छत्तीसगढ़ आठ तहसीलों और जमींदारियों के रूप में रायपुर से प्रशासित होता था। सन 1861 में किये गए प्रशासनिक परिवर्तन के फलस्वरूप बिलासपुर को एक नए जिले का रूप दिया गया। वर्तमान सिटी कोतवाली में बंदोबस्त अधिकारी का कार्यालय बनाया गया। गोलबाजार उस समय जिला कचहरी था। कंपनी गार्डन उन दिनों ईस्ट इण्डिया कंपनी की गारद (परेड) के लिए उपयोग में लाया जाता था। सन 1919 में मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के फलस्वरूप एक नया प्रदेश अस्तित्व में आया जिसे सेन्ट्रल प्रोविंस का नाम दिया गया। इसमें वर्तमान महाराष्ट्र के चार जिले, महाकोशल के अठारह जिले और साथ में छत्तीसगढ़ को भी जोड़ा गया।

योरप की औद्योगिक क्रांति एवं पुनर्जागरण का प्रभाव पूरे विश्व में पड़ने लगा था। अंग्रेजों ने अपने शासित देशों में शिक्षा का प्रसार करना प्रारंभ कर दिया था। फलस्वरूप, बिलासपुर में कई स्कूल खुले जिसमें नगर और आसपास के बच्चे आकर पढ़ने लगे। कुछ समर्थ परिवारों के बच्चे कलकत्ता, नागपुर, इलाहाबाद और बनारस जैसी जगहों में पढ़ने के लिए भेजे गए। हमारे नगर के ई.राघवेन्द्र राव एवं ठाकुर छेदीलाल ‘बार-एट-लॉ’ की पढाई करने के लिए लन्दन गए और बैरिस्टर बनकर आये।

राष्ट्र के राजनीतिक क्षितिज में महात्मा गाँधी का उदय हो चुका था, उनकी प्रेरणा से देश की आजादी का आन्दोलन दिनोंदिन जोर पकड़ रहा था। असहयोग आन्दोलन के दौरान राष्ट्रप्रेम की लहर बिलासपुर में भी दौड़ने लगी और कुछ लोग खुलकर सामने आने लगे। यदुनंदनप्रसाद श्रीवास्तव ने शासकीय विद्यालय की शिक्षा त्याग दी, ई. राघवेन्द्र राव, ठाकुर छेदीलाल एवं हनुमन्तराव खानखोजे ने अदालतों का बहिष्कार किया। हिंदी के प्रख्यात कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने बिलासपुर आकर देश की आजादी के लिए 12 मार्च 1921 को एक क्रांतिकारी भाषण दिया। उन्हें अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर बिलासपुर की केंद्रीय जेल में बंद कर दिया। इस जेल यात्रा के दौरान ही उन्होंने अपनी लोकप्रिय कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ का सृजन किया था।

25 नवम्बर 1933 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बिलासपुर आये। उन्हें देखने और सुनने के लिए दूर-सुदूर से हजारों की संख्या में लोग पैदल और बैलगाडि़यों में भरकर सभास्थल में उमड़ पड़े। सभा समाप्त होने के बाद लोग उनकी स्मृति के रूप में मंच में लगी ईंट और मिट्टी तक अपने साथ उठाकर ले गए।

एक समय का गाँव बिलासपुर, अंग्रेजों के शासन काल में जिला बनने के बाद कस्बा बना फिर अर्धनगर, उसके बाद नगर और अब अर्ध-महानगर नगर बन गया। यहाँ तक की यात्रा लगभग डेढ़ सौ वर्ष में पूरी हुई। इस नगर की धरती को असंख्य लोगों ने अपने परिश्रम से सींचकर हरा-भरा किया, इसमें संस्कार के धागे बुने। बहुत से अनाम हैं जिन्हें कोई नहीं जानता लेकिन कुछ नामचीन भी हैं जिन्हें भारतवर्ष का साहित्यजगत जानता है जैसे रंगकर्मी पंडित सत्यदेव दुबे, नाट्यलेखन के सशक्त हस्ताक्षर डॉ.शंकर शेष और साहित्यकार श्रीकांत वर्मा जैसी मशहूर हस्तियाँ, इसी बिलासपुर की माटी की देन हैं।

बदलाव की बयार :

अंग्रेजों ने बंबई से कलकत्ता तक रेल्वे की लंबी लाइन बिछाई, बिलासपुर बीच में आ गया। सन 1889 में यहाँ रेल्वे स्टेशन बनाया गया। स्टेशन के आसपास का बहुत बड़ा भूखंड रेल्वे को आबंटित किया गया जिसे ‘रेल्वे कालोनी’ कहा जाने लगा। यहाँ दूर तक जाती रेल की पांतों के अलावा रेल कर्मियों के लिए आवासीय घर, खेल के मैदान और क्लब बने। शुरुआत में रेलकर्मियों के रूप में लाल रंग के चेहरे लिए कुछ अंग्रेज़ आए जो लाल रंग के वृहदाकार ‘बंगले’ में रहते थे। दूर-सुदूर बंगाल, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों के भारतीय रेल्वे की नौकरी में यहाँ आए जो मध्यम और छोटे घरों में व्यवस्थित किए गए। इनकी दैनिक जरूरतों की आपूर्ति के लिए बुधवारी बाज़ार बनाया गया जहां अनाज, किराना, कपड़ा, सब्जी आदि उपलब्ध थे। रेल्वेकर्मियों के इस समूह ने बिलासपुर को गाँव से शहर में तब्दील करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिलासपुर के देहातीपन को इन प्रवासियों ने बदल दिया और यह बस्ती शहर बनाने की राह पर चल पड़ी।

तब बिलासपुर एक कस्बा था। कलेक्टोरेट था, कचहरी, बैंक, अस्पताल और सिनेमा थे। आसपास के डेढ़ सौ किलोमीटर तक के लोग बिलासपुर आते थे, ट्रेन में घुसकर, बस में लदकर, बैलगाड़ी में बैठकर या घोड़े पर चढ़कर। बिलासपुर आना और काम निपटाना उनके लिए परेशानी का सबब रहा होगा लेकिन काम पूरा होने के बाद का समय पिकनिक जैसा था। यहाँ के हलवाइयों की दूकानें और सिनेमाघर इन प्रवासियों के दिन भर का अर्जित सारा संताप हर लिया करते थे।

सबसे बड़ा परिवर्तन तब आया जब बिलासपुर के हृदयस्थल पर गोलबाज़ार का निर्माण हुआ। सन 1937 में दिल्ली के कनाटप्लेस की शैली में नगरपालिका ने इसका निर्माण कराया। बड़ी और पक्की दूकानों का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ जो पूरी बस्ती के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया। गोलबाज़ार केवल बाज़ार नहीं, बिलासपुर का वैभव था, शहर का रक्त इसी धमनी से होकर गुजरता था। मिठाई और दूध-दही, साइकिल और सिलाई मशीन, सब्जी और फल, कपड़े और मनिहारी, कापी-किताब और खाता-बही, बीड़ी-सिगरेट और पान याने वह सब-कुछ जो नगरवासियों को चाहिए होता था, अच्छे से अच्छा, वह गोलबाजार की दूकानों में मिलता था। गोलबाजार के पाँच किलोमीटर के वृत्त के लोग साइकल पर हाँफते हुए यहाँ अपना झोला लटकाए आते और झोला भरकर खुशी-खुशी वापस जाते।

गोलबाजार की मिठाई और चाट की दूकानें सबको रोज आने के लिए मजबूर करती। यहाँ एक मिठाई की दूकान थी- गयाप्रसाद पान्डे महराज की। किसी जमाने में उस होटल में सुबह छः बजे से रात दस बजे तक ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। अल-सुबह जलेबी की तई भट्ठी पर चढ़ती तो रात तक अनवरत मीठी-रसीली जलेबी उगलती रहती जिसे निगलने के लिए पूरे होटल में पसरी गंदगी और बदबू को दुर्लक्ष्य कर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती। जलेबी के साथ स्वादवृद्धि के लिए दो नमकीन भी थे। एक- आलू और प्याज को भूंज कर बनाए गए मसाले के ऊपर बेसन लपेट कर तला गया ‘आलूबड़ा’ और दूसरा- पिछली रात बच गए नमकीन को मसल कर, उसमें बेसन और मिर्च मसाला मिला कर तेज लहसुन की छौंक से तैयार किया गया ‘प्याज बड़ा’। जलेबी के साथ इनका ‘काम्बिनेशन’ इस कदर जायकेदार होता था कि मजा आ जाता। नाश्ते की ये तीनों वस्तुएं जब तैयार होती तो इनकी खुशबू इतनी फैलती कि सड़क चलता इन्सान सम्मोहित सा होटल में खिंचा चला आता।

एक चलती-फ़िरती दूकान भी थी, रबड़ी वाले बाबा की. उनका असली नाम किसी को मालूम न था, बस यही नाम था उनका। गोंडपारा वाले अपने घर से निकलकर वे गोलबाज़ार तक शाम को पांच बजे रबड़ी बनाकर सड़क पर आवाज़ देते निकलते- ‘ताज़ी रबड़ी…..’और एक नगरपालिका द्वारा निर्मित एक खाली पड़ी दूकान पर बैठ जाते। उनकी रबड़ी के दीवाने आते, पत्ते के दोने में रबड़ी लेते और अपनी उंगलियों से उठाकर खाते या दोने को मुंह से लगापर रबड़ी को पी लेते। बाबा की रबड़ी का सोंधापन जितना अनोखा था, बाबा भी उतने ही अनोखे थे। उनको यदि किसी की म्रुत्यु का समाचार मिल जाता तो वे अपना काम छोड़्कर उसके अंतिम संस्कार में पहुंच जाते, रबड़ी बने या न बने।

रबड़ी वाले बाबा का कोई घर भी न था, एक मंदिर के बरामदे में सोते। उन्होने कोने में एक छोटी-सी भट्ठी बना ली थी जिसमें प्रतिदिन वे रबड़ी तैयार करते। ये काम वे इसलिए करते ताकि किसी के सामने हाथ न फ़ैलाना पड़े और स्वाभिमानपूर्वक जिया जा सके। झुकी हुई कमर और छोटी कद-काठी के रबड़ी वाले बाबा एक दिन गरिमा के साथ इस संसार से विदा हो गए। देवकीनन्दन श्मशान गृह में उनके अंतिम संस्कार के समय मोहल्ले का हर व्यक्ति उनकी पार्थिव देह के सामने ग़मगीन खड़ा था।

जगदीशनारायण की दूकान ‘पेंड्रावाला’ में सभी वस्तुएँ देशी घी से बनाई जाती थी, मिठाई, नमकीन और पूरी- सब्जी। पूरी-सब्जी की लोकप्रियता का आलम ऐसा था कि बिलासपुर के आसपास सौ-पचास मील दूर बैठे किसी व्यक्ति को अगर पूरी-सब्जी की याद आ गई तो वह अगले दिन बिलासपुर जाने के लिए कोई न कोई बहाना अवश्य खोजता, जैसे, कचहरी में पेशी है, कलेक्टर आफिस जाना है, आर॰टी॰ओ॰ का काम है, डाक्टर को दिखाना है, खरीदी करना है, बैंक में काम है आदि कुछ भी काम ‘खोजा’ जाएगा और उसे बिलासपुर जाने वाली अगली ट्रेन या बस में बैठकर रवाना होना ही है। बिलासपुर पहुँच कर खोजा गया काम बाद में होगा, पहले ‘पेंड्रावाला’ में पूरी-सब्जी का आस्वादन होगा क्योंकि घर से निकल-भागने का असली मकसद पहले पूरा होना चाहिए।

स्थानीय निवासियों को इतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी, घर से पैदल निकले, गोलबाजार पहुंचे और सीधे ‘पेंड्रावाला’ में घुस जाते और आदेश देते- ‘आधा पाव पूरी देना।’ पलाश के पत्तों से बने दोने में आधा पाव में तीन फूली हुई खरी पूरियाँ परोसी जाती और साथ में आलू की छिलके वाली रसीली सब्जी। बस, साथ में आचार-चटनी कुछ नहीं। मर्जी हो तो आधा पाव दही मँगवा लो या आधा पाव रबड़ी और फिर परमानंद।

यही हाल मौसाजी, इलाहाबादी, दामू, होरीलाल की चाट का था। इनकी चाट ऐसी थी कि शहर भर को लुभाती थी और अपने पास बुलाती थी। अब चाट के स्वाद की वह विविधता कहीं भटक गई। ठेलों में मिलने वाली चाट के विभिन्न स्वाद उसी तरह खो गए हैं जिस प्रकार सामूहिक भोज में ‘बफे’ शैली में परोसा जाने वाला भोजन, कुछ भी खाओ, सबका स्वाद एक जैसा !

गोलबाजार की तरह सदरबाजार बर्तन, आभूषण और कपड़े की दूकानों का केंद्र बन गया। धीरे-धीरे हर गली-मोहल्ले में दूकानें खुलने लगी और आज पूरा शहर विभिन्न वस्तुओं की दूकानों से पट गया है। बाजार बदल गए हैं, बाजार में मिलने वाली वस्तुएँ भी बदल गई हैं। पहले दूकानों में गरम दूध बिकता था अब आइसक्रीम पार्लर खुल गए, परचून की दूकानें थी अब माल खुल गए, आयुर्वेदिक दवाओं की दो-एक दूकानें थी अब एलोपेथिक दवाओं की असंख्य मेडिकल स्टोर खुल गए। दो अस्पताल थे अब पचास हो गए, दस-पाँच डाक्टर थे अब हजार हो गए। अधिकतर लोग मनुष्य थे अब धन-उत्पादक-यंत्र हो गए।

कभी परमिट का जमाना हुआ करता था, खाने-पीने की चीजों पर भी सरकार की अनुमति लेनी होती थी, लाइन लगानी पड़ती थी और जो थोड़ा-बहुत मिले उससे गुजारा करना पड़ता था। एक परिवार को महीने भर के लिए सिर्फ दो सेर शक्कर मिलती तो वह मंदिर के भोग की तरह थोड़ी-थोड़ी सबको मिलती। चाय या दूध में गुड़ डालकर काम चलता तो कभी फीके के साथ फाकामस्ती। देश की आज़ादी के बाद का वह समय अन्न और व्यवस्था के अभाव का दौर था जो लगभग पच्चीस वर्षों तक चला, जिसका गवाह बिलासपुर भी रहा।

बिलासपुर में ‘होशियारी’ नामक एक किला है जिसमें केवल यहाँ के राजनीतिज्ञ निवास करते हैं। इस किले की होशियारी का इतिहास अक्षुण्ण है जो आजादी के बाद से अब तक कायम है। सबसे पहले सांसद बने अमरसिंह सहगल, उसके बाद ‘ये’ और ‘वो’ भी। इन सबके दर्शन कभी किसी को नहीं मिले, सबके सब मिट्टी के माधव थे, किसी काम के नहीं निकले। पैंसठ साल की स्वर्णिम कालावधि को उन सबने मिलकर मिट्टी में मिला दिया। यही हाल विधायकों का भी था। बिलासपुर के जितने विधायक बने, संयोग से सब मंत्री बने लेकिन सबको अपनी और अपने परिवार के उत्कर्ष की चिंता थी, शहर भी ऐसा गज़ब का है जो उन्हीं के विकास के लिए चिंतित रहता है ! ऐसा शहर कहीं और भी है क्या ? आप सोचिए कि कितना गजब हुआ, इस शहर से छः लोग राज्य के स्वास्थ्यमंत्री बने और ये निर्लज्ज बिलासपुर में एक मेडिकल कालेज न खुलवा पाए। आज़ादी के पहले नगरपालिका के एक अध्यक्ष थे कुंजबिहारीलाल अग्निहोत्री जिन्होंने गोलबाज़ार बनवाया था, उनके बाद बने अध्यक्षों और महापौरों के कार्यकलाप यहाँ लिखने लायक नहीं है, वैसे, मौखिक बताने लायक बहुत कुछ है।

बिलासपुर ऐसा शहर है जो हमेशा अंगड़ाई लेने की मुद्रा में रहता है, जैसे अभी-अभी जागा हो और उसकी नींद पूरी न हुई हो। जिन पर शहर को संवारने का गुरुतर भार सौंपा जाता है वे नगर विकास की समुचित योजना और सक्षम कार्य संस्कृति के अभाव में कुछ खास नहीं कर पाते और खिसियानी हंसी का भाव अपने चेहरे पर चिपकाए हुए अपने चम्मचों की वाहवाही के इर्दगिर्द छुपे रहते हैं. बिलासपुर की आबादी बढ़ी, लोगों की आवाजाही बढ़ी, यातायात बढ़ा, व्यापार बढ़ा, साथ ही अव्यवस्था बढ़ी, अपराध बढ़ा. किसी समय में बिलासपुर की गिनती छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक शान्त शहर के रूप में होती थी, लोग सेवानिवृत्ति के बाद यहाँ आकर बसना पसंद करते थे लेकिन अब हमारा शहर भी असुरक्षित हो गया है.

एक समय था जब सड़क पर तांगा चला करते थे, लोग उस पर लदे-फंदे स्टेशन से शहर और शहर से स्टेशन तक यात्रा किया करते थे। अंदरूनी शहर में आने-जाने के लिए साइकल-रिक्शा थे। तांगा अब लुप्त हो चुका, रिक्शा लुप्त होने वाला है। फिल्म ‘नया दौर’ की याद आती है जिसमें मशीन के प्रादुर्भाव से मानवीय श्रम के विस्थापन का हृदयविदारक कथानक पिरोया गया था। अब थ्री-व्हीलर आटो और बस आ गई हैं। तांगे को खीचने वाले घोड़े बुढ़ाकर मर गए, तांगे का ढांचा झोपड़ी के बाहर धूप-पानी-ठंड झेल रहा है, वह भी किसी दिन नष्ट हो जाएगा और बिलासपुर शहर की आंतरिक-यात्रा-परम्परा महज़ इतिहास बन कर रह जाएगी।

देखते-देखते धूल भरी सड़कों पर कोलतार की काली चादर ढँक गई। छोटे घर बड़ी अट्टालिकाओं में तब्दील हो रहे हैं, दूकानें ‘शाप’ बनते जा रही हैं और आपसी रिश्ते अब अपरिचय के हिमालय की वृष्टिछाया में छुपते जा रहे हैं। मोहल्ले के किसी घर में गमी हो जाए तो किसी के घर में चूल्हा नहीं जलता था, अब ‘जिसका दुख, वह जाने’ वाली बेशर्मी से अपना टेलीविज़न तक नहीं बंद करता।

सरकारी और अर्ध सरकारी स्कूलों में रौनक थी, जमकर पढ़ाई होती थी, अब वीरान हो गए। स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक गुरुजन होते थे अब वेतनभोगी नौकर। डाक्टर देवता होते थे अब व्यापारी। व्यापारी ग्राहक की समस्या के सहायक होते थे अब लुटेरे। केवल बाजार नहीं बदला, पड़ोस भी बदल गया। अब सम्बन्धों की गर्माहट दूर बसे लोगों से है, जो जितना करीब है वह उतना अप्रिय और असहनीय। पहले पड़ोसियों से आपस में नमस्कार होती थी अब नज़रें चुराते हुए निकल जाने का रिवाज़ हो गया। पड़ोसिनें अपनी रसोई में बनी सब्जी पड़ोसिनों के घर भेजा करती थी, आपसी आदान-प्रदान चलते रहता था लेकिन अब एक-दूसरे को उपेक्षा की नज़रों से देखती हैं। कस्बाई रहन-सहन और सद्भाव गुम हो गया, अपरिचय और ‘काम-से-काम’ वाली आधुनिक संस्कृति ने बिलासपुर को अपने पंजे में जकड़ना शुरू कर दिया है। एक समय था, जब सब एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, साझा संस्कृति थी, अब ऐसे हाड़-मांस वाले शरीर दिखाई पड़ते हैं मानों वे सब हृदयविहीन यंत्र हों। कितना बदल गया बिलासपुर !
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