सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 6 साल पहले ऐडसमेटा में सुरक्षा बालों द्वारा मारे गये आठ आदिवासियों की जाँच करे प्रदेश के बाहर की एजेंसी; सामाजिक कार्यकर्त्ता के याचिका पर किये आदेश . देखते है इस आदेश का होता हैं कुछ या वही ढाक के तीन पात.

4.05.2019
सुप्रीम कोर्ट में मानवाधिकार कार्यकर्ता डिग्री प्रसाद चौहान की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच जस्टिस नाग्लेश्वर राव और जस्टिस केबी शाह की बेंच ने आदेश दिया की ऐडसमेटा में आठ आदिवासियों की हत्या की जाँच राज्य के बाहर की किसी एजेंसी से कराई जाएगी , सीबीआई की एस आई टी गठित करके यह जाँच के आदेश दिये गये हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य से बाहर के सी बी आई ऑफिसर्स का विशेष जांच दल ( एस आई टी) गठन करने का स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है ।

अब पता नहीं ऐसी किसी जाँच का कोई परिणाम निकलता भी है की नहीं. छत्तीसगढ़ में कल्लूरी के रिजिम में ऐसी बहुत से कांड हुए ,जांचे भी हुई ,एस आई टी भी गठित हुए ,जाँच आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट दी ,मानवाधिकार आयोग से लेकर कई स्वतंत्र जाँच समितियों , और कई सरकारी आयोगों ने अपनी  रिपोर्ट दी कई न्यायालयों ने निर्णय दिए ,लेकिन वास्तविकता तो यही है की न हत्याकांड रुके न बलात्कार रुके और न आग जनी पर कोई रोक लगी .और हाँ कभी किसी जिम्मेदार अधिकारियो पर कोई निर्णायक कार्यवाही भी हो ऐसा नहीं लगता .


आज भी लगभग सबकुछ वेसा ही बना हुआ है.   

यह अजीब विडम्बना ही कही जाएगी की करीब 6 साल पहले इसी मई के 17,18 तारीख को दक्षिण बस्तर के गाँव ऐडसमेटा में रात  को गाँव के आदिवासी देवगुड़ी में  अपने परिवार के साथ  बीज त्यौहार मनाने एकत्रित  हुए थे ,की गहन रात में सी आर पी एफ की कोबरा बटालियन के लोगों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया और अंधाधुंध गोली बारी शुरू कर दी.

ग्रामीण चिल्लाते रहे की हम सब इसी गाँव के लोग है कोई माओवादी नहीं है लेकिन किसी ने एक नहीं सुनी और सभी को बिना किसी चेतावनी के दौड़ा दौड़ा कर मारा गया .जिसमे आठ साल के बालक सहित आठ लोगों की हत्या कर दी गई.

मरने वालों में  कर्मा पाडू ,कर्मा गुड्डू ,कर्मा जोगा ,कर्मा बदरू ,कर्मा शम्भू ,कर्मा मासा ,पूनम लाकु ,पूनम सोलू की मौत हो गई। इसमें तीन बेहद कम उम्र के बच्चे थे ।  इसके अलावा ,छोटू ,कर्मा छन्नू , पूनम शम्भु और करा मायलु घायल हो गए. इतना ही नहीं अगली सुबह फिर वही कोबरा बटालियन के लोग गाँव आये और घर घर में घुस घुस कर लोगों को खींच खींच कर मारा पीटा गया .

घटना का विवरण कुछ इस प्रकार है .

17 मई, 2013 की रात को सुरक्षा बलों द्वारा गोलीबारी और एकतरफा गोलीबारी में आठ निर्दोष ग्रामीण मारे गए, जिनमे से 3 नाबालिक थे और पांच निर्दोष ग्रामीण घायल हो गए। इस घटना में एक सुरक्षा बल के जवान को भी गोली लाग्ने से उसकी मृत्यु हो गई। ग्रामीणों का कहना है कि 17 मई, 2013 की रात को, मौके पर बीज़ पांडुम उत्सव मनाया जा रहा था, जिसके लिए लगभग 60-70 ग्रामीण एकत्रित हुए थे जिसके दरमियान सुरक्षा बल ने उनको चारो तरफ से घेर उनपर फायरिंग शुरू कर दी।


सुरक्षा बल का जवाब था की ग्रामीणो को नक्सलियों ने ढाल के रूप में इस्तेमाल किया और उनकी आड़ लेकर वार किया और बाद में सुरक्षा बल को भारी पड़ते देख उनकी आड़ लेकर भागे। ऐसी स्थिति में ग्रामीणों को छती पहुची। ग्रामीणों ने इस जवाब को झूठा करार करते हुए कहा की कोई फायरिंग उस दिन नहीं हुई थी।


ग्रामीणों और अन्य सिविल सोसाइटी और विपक्ष से इस घटना की कड़ी निंदा हुई और भाजपा सरकार ने रिटायर्ड न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी के अग्रवाल के देखपूरती में एक जांच आयोग का गठन किया। 2013 से 2016 तक इस जांच आयोग की खबर ग्रामीणों को नहीं मिली, और वे इस विधिक प्रक्रिया से मसरूफ़ रहे। दिसम्बर 2016 में कुछ ग्रामीण को जब इस जाँच आयोग के बारे में जानकारी प्राप्त हुई तो उन्होने जाँच आयोग के समक्ष अपने शपथपत्र दायर किए। 11 गवाहों ने आयोग के सामने पेश हुए। उसके बाद सीआरपीएफ़ के दो गवाह ने अपना बयान दिया। शाशन की ओर से एक गवाह प्रस्तुत हुए और पोलिस की ओर से एक गवाही हो चुकी है और एक बाकी है। जाँच की अगली तारीख 11 मई की है।


मानवाधिकार संघटनो तथा कोंग्रेस ने इसे फर्जी मुठभेड़ कहा और जिम्मेदार सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की और पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने की भी मांग की .कई संघठनो के जाँच दल भी मुआयना करने गाँव गये , लगभग सभी की यही रिपोर्ट थी की यह कोई मुठभेड़ नहीं है बल्कि पूरी तरह हत्या हैं,

सुरक्षा बलों और सरकार ने कहा की उस रात ऐडसमेटा में माओवादी हमले की योजना बना रहे थे संघर्ष दोनों तरफ से हुआ और गोली बारी में सभी माओवादी की मौत हुई यानि सरकार ने यही कहा की मरने वाले सभी नक्सली थे .

घटना के चार दिन बाद कई जन संघठनो की तरफ से एक फेक्ट फयिन्डिंग दल जाँच करने ग्या जिसमे याचिका कर्ता डिग्री प्रसाद चौहान ,अमर नाथ पाण्डेय ,किशोर नारायण ,बीजापुर के पूर्व विधायक राजा राम तोडम,नुकुल साहू ,अमन शर्मा ,उत्तम नाग ,जगत साहू और भावेश कोसा शामिल थे. जाँच रिपोर्ट में कहा गया की यह कोई मुठभेड़ नहीं बल्कि सामुहिक जनसंहार किया गया है. जाँच दल ने गाँव से लौटकर उसी दिन 22 मई को पुलिस में एफ आई आर दर्ज करने के लिए आवेदन किया .लेकिन जैसा की होना था की कोई कार्यवाही नहीं की गई.

उटसके बाद ही डिग्री प्रसाद सुप्रीम कोर्ट गये और पुरे 6 साल बाद अब निर्णय आया है की जाँच की जाये. यह सही है की जाँच तो होनी ही चाहिए लेकिन क्या इस तरह की जाँच से कोई अंतिम निर्णय कभी होता है क्या.

आपको याद दिला दें की इसी छत्तीसगढ़ के ताड़मेटला में जब ऐसी ही एक हत्या कांड और आगजनी की जाँच करने सी बी आई टीम को गाँव में पहले तो घुसने नहीं दिया जब वह हेलिकोप्टर से गाँव में पहुची तो उसे छत्तीसगढ़ पुलिस और सीआरपी ने एक स्कुल में बंद कर दिया उन्हें जाँच नहीं करने दी .बाद में सी बी आई ने इसी सुप्रीम कोर्ट में कहा की हम जाँच नहीं करने दिया जा रहा हैं .कोर्ट उनकी रक्षा करे .सिर्फ याद दिला दें की छतीसगढ़ की पुलिस ही थी जिन्होंने अपने ही कलेक्टर और कमिश्नर को भी प्रभावित  गांवों में नहीं जाने दिया था और यह भी की स्वामी अग्निवेश गाँव जा रहे थे तब उनके साथ इसी पुलिस ने सहयोग देकर उनके साथ मारपीट की गई .यह सब इसलिए लिख रहे है की यह समझ आये की सुप्रीम कोर्ट हो या सी बी आई उनके आदेश का लाभ किसी को भले ही मिले लेकिन आदिवासियों को कभी नहीं मिला .


चलिए फिर लौटते है मुख्य  केस पर
सरकार एक तरफ माओवादी मान रही थी तो दूसरी तरफ प्रभावितों को दे रही थी मुआवजा


घटना के बाद राज्य सरकार ने ग्रामीणों के लगातार विरोध प्रदर्शन  और मानवाधिकार संघठनो के दबाब में  घटना की जांच के लिए न्यायमूर्ति वी.के. अग्रवाल की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग का गठन किया था, लेकिन योग आज तक किसी निर्णय पर नहीं पंहुचा और वहां तारीख पर तारीख चल रही है. तत्कालीन रमन सिंह सरकार ने मृतकों के परिजनों को पांच पांच लाख का मुआवजा देने का भी ऐलान किया था. जिस पर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कहा था कि अगर सरकार मृतकों के परिजनों को मुआवजा दे रही है तो उन्हें माओवादी कैसे माना जा सकता है.
आज उस घटना को 6 साल हो गये है. अब हमें देखना होगा की सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का क्या होता है या वह भी पहले जैसे आदेश और जाँच आयोग की जाँच का हाल हुआ  वेसा होगा .इसका एक कारण यह भी है की ऐडसमेटा कांड के जिम्मेदार पुलिस अधिकारी अभी भी उसी शान और अधिकार से जमे हैं.