नुक्कड़ कैफे में शरद कोकास और मीर अली मीर का कविता पाठ .

प्रस्तुति अनुज श्रीवास्तव

पिछले दिनों भिलाई के मशहूर हो रहे नुक्कड़ कैफे में शरद कोकास ने अपनी दो कवितायें , पिता हुये नाराज ,भाई ने दी धमकी मां ने बंद कर दी बातचीत ,उसने नाटक नहीँ छोड़ा ..और . स्त्री होना कितना दुखद है .. पानी का पाठ किया .

छत्तीसगढ़ के जाने माने लोक कलाकार मीर अली मीर ने अपनी बहुचर्चित कविता नदा जाही का रे … का पाठ किया .

शरद कोकास की दोनों कविता का मूल पाठ ….

नाटक में काम करने वाली लड़की

पिता हुए नाराज़
भाई ने दी धमकी
माँ ने बन्द कर दी बातचीत
उसने नाटक नहीं छोड़ा

घर में आए लोग
पिता ने पहना नया कुर्ता
माँ ने सजाई बैठक
भाई लेकर आया मिठाई

वह आई साड़ी पहनकर
चाय की ट्रे में लिए आस

सभी ने बांधे तारीफों के पुल
अभिनय प्रतिभा का किया गुणगान

चले गए लोग
वह हुई नाराज़
उसने दी धमकी
बन्द कर दी बातचीत

घरवालों ने नाटक नहीं छोड़ा ।

    

पानी हो तुम

यह प्यास का आतंक है या निजता का विस्तार
दिवास्वप्नों में तुम्हारा स्त्री से पानी बन जाना
नदी बनकर बहना अपनी तरलता में
दुनिया भर की प्यास बुझाते हुए
अंतत: समा जाना सागर में

जरुरी नहीं जो रुपक स्वप्न में संभव दिखाई दें
सच अपनी सफेदी में उन्हें धब्बे की तरह न देखे
इसलिए प्रकृति में सब कुछ जहाँ अपने विकल्प में मौज़ूद है
एक अजीब सा खयाल होगा तुम्हारा स्त्री से नदी हो जाना

पानी होने की इच्छा को शक्ल देना इतना ज़रुरी हो
तो बेहतर है तुम झरना बन जाओ
अपने खिलंदड़पन में पहाड़ों से कूदो
बरसात में पूर्णता के अहसास से भर जाओ लबालब
निरुपाय होकर सूख जाओ ग्रीष्म में

इसके बाद भी तुम्हारा उत्साह कम न हो
और यथार्थ के इन नैसर्गिक चित्रों से तुम भयभीत न हो
तो निश्चिंत होकर कल्पना के समंदर में गोते लगाओ
मन के गीलेपन में फिर पानी का स्वप्न बुनो
और आवारा बादल बन जाओ
प्रेमियों के इस विशेषण को चुनौती दो
अपनी आवारगी में मुक्ति के गीत रचो
फिर न बरस पाने का दुख लिए
थक हार कर बैठ जाओ

बेहतर है मिट्टी की गंध लिए वाष्प बन जाओ
बहो बहो हवाओं में फैलो आँखों में नमी बनकर
घुटन में जीती दुनिया की साँसों में बस जाओ
ठंड में ठिठुरते लोगों के मुँह से निकलो
निकलो किसी ग़रीब की चाय की केटली से

या फिर शबनम बन जाओ
मुकुट सी सजो किसी पत्ती के माथे पर
किसी शहीद की लाश पर चढाए जाने तक
फूल की पंखुडियों में बस कर उसे ताज़ा रखो
चाहो तो काँटों पर सज जाओ
पगडंडी पर चलते पाँव सहलाओ

इससे तो अच्छा है बर्फ ही बन जाओ तुम
पड़ी रहो हिमालय की गोद में
गोलियों से टकराकर चूर हो जाओ
अपने स्नेह की उष्णता में पिघलो
धोती रहो अपनी देह पर लगा रक्त
या फिर बर्फ की रंगबिरंगी मीठी चुस्की बन जाओ
बच्चों के मुँह चूमो और खिलखिलाओ
अपनी लाल लाल जीभ दिखाकर उन्हें हँसाओ

यह सब न बन सको यदि तुम
तो अच्छा है आँसू बन जाओ
बहो पारो की आँखों से जीवन भर
देवदास की शराब में घुलकर उसे बचाओ
सुख से अघाई आँखों से अपनी व्यर्थता में फिसलो
या फिर उस माँ की पथराई आँखों से निकलो
पिछले दिनों जिसका जवान बेटा मारा गया था दंगो में

बेहतर है पानी बनने की जिद छोड़ो
वैसे भी तुम पानी ही तो हो
पानी से घिरी पृथ्वी की आँख का पानी
जो अभी मरा नहीं है
मानवता की देह में उपस्थित पानी
जो मनुष्य की मनुष्य के प्रति दया भाव में छलकता है

पानी हो तुम समाज के चेहरे का
जिसके बल पर जीवित है सामाजिकता
तुम पानी हो और ज़रुरी है तुम्हें बचाना
इससे पहले कि यह पानीदार दुनिया
तुम्हारे बग़ैर रुखी- सूखी और बेरौनक हो जाए ।

शरद कोकास

(कविता संकलन हमसे तो बेहतर हैं रंग से)

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