बदलाव : वापस लौटे ग्रामीणों को अब सरकार से मदद की आस , आंध्र में कर रहे थे मजदूरी

दोबारा बसेगा मरईगुड़ा , 25 परिवार 13 साल बाद वापस लौटे अपने गांव

सुकमा जिले से सीमांध्र की ओर 2006 में पलायन कर गए थे ग्रामीण , कनापुरम में रह रहे थे
माओवादी हिंसा के बीच ग्रामीणों के घरों को कर दिया गया था आग के हवाले.

जगदलपुर . 26.04.2019

सीमांध्र से आमतौर पर माओवादी हिंसा और संघर्ष की खबरें आती हैं । इस बीच गुरुवार को इस इलाके से सुकमा जिले में एक अच्छी खबर आई । ये खबर बस्तर में बदलाव की है । दरअसल 13 साल पहले 2006 में सुकमा जिले के मरईगुड़ा में जिन 25 परिवारों के घर माओवादी हिंसा में जला दिए गए थे , उन सभी परिवारों के लोग वापस अपने गांव लौट आए हैं । ग्रामीण गुरुवार को एक मिनी बस में सवार होकर सीमांध्र के कनापुरम से मरईगुड़ा पहुंचे । यहां पहले से दूसरे गांवों के लोग भी मौजूद थे , जिन्होंने उनका जोशीला स्वागत किया । इस दौरान ग्रामीणों ने बताया कि वे अपना आशियाना दोबारा बनाएंगे और खेती – किसानी कर जीवन यापन करेंगे । आंध्र में उन्हें किसी भी तरह की सरकारी मदद नहीं मिल रही थी ।

वे मिर्ची के खेतों में बतौर मजदुर 140 रुपए रोजी में काम कर रहे थे ।ग्रामीण चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ की सरकार उन्हें दोबारा मरईगुड़ा में बसने में मदद करे और उनके लिए रोजगार की भी व्यवस्था करे ।मरईगुड़ा से ग्रामीणों के लौटने के बाद अब उम्मीद की जा रही है ।कि सलवा जुडूम के दौरान हुई माओवादी हिंसा से प्रभावित गांवों के लोग वापस लौटेंगे ।मरईगुड़ा के ग्रामीण उनके लिए प्रेरणा बनेंगे.

घर जलाने के आरोप  माओवादियों और सलवा जुडूम पर : 

25 परिवार 13 साल के बाद अपने गांव लौटे । उनके चेहरे पर अपनी मिट्टी में आने की एक अलग ही तरह की चमक थी । लेकिन वे 2006 में हुई घटना के बारे में बात नहीं करना चाहते थे । उनके जेहन में घटना एक खौफनाक वाकये के रूप में आज भी कैद है । मालूम हो कि बस्तर में जब सलवा जुडूम अपने चरम पर था , तब माओवादियों ने मरईगुड़ा गांव और आसपास के इलाको में हिंसा फैल दी थी । सलवा जुडूम और माओवादी हिंसा के बीच आदिवासी पीस रहे थे । उस वक्त कुछ अज्ञात लोग दोपहर में मरईगुड़ा गांव पहुंचे और उनके घरों में आग लगा दी । घटना के बाद कुछ ने कहा कि इसे माओवादियों ने अंजाम दिया तो कुछ ने सलवा जुडूम से जुड़े लोगों पर आरोप लगाए ।

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पत्रिका .काम से आभार सहित