सियाह हाशिये। ( स्व . मंटो से क्षमायाचना सहित ) शाकिर अली .

27.04.2019

शाकिर अली जगदलपुर में 2004 से 2007 तक ग्रामीण बेंक में आडीटर के पद पर रहे ,अपने कार्यक्षेत्र में उन्हे  दक्षिण बस्तर के अंदरूनी  शाखाओं में बार बार जाना पडता था.इसी समय उन्होंने ” बचा रह जायेगा बस्तर”  कविता संग्रह तैयार किया .जब प्रकाशन के लिये उद्भावना में भेजा तो  प्रकाशक ने उनसे कहा कि एक भूमिका तो लिख दीजिये .उन्होंने कहा भी कि हमारी कवितायें ही अपने आप में हमारा वक्तव्य हैं ,अलग से क्या लिखें. लेकिन उन पर भूमिका लिखने का दबाव था.तो  2006  के जुलाई महीने के किसी दिन कुटरू से बस में बैठे , कागज पेन निकाला और रास्तेभर लिखते रहे.

जब बस से उतरे तो संग्रह की भूमिका या वक्तव्य जो भघ कहें तैयार किया और भेज दिया .

पिछले आठ दिनों से इसी कविता संग्रह की कवितायें पांच किश्तों में पढ रहे है.लेकिन पुस्तक की भूमिका रह गई थी .जैसे उनकी पुस्तक म़े भूमिका के नीचे उनका नाम ही नहीं लिखा था. सो इस बहाने शाकिर भाई आफिस आये बहुत से सुधार किये और जहाँ से प्रारंभ करना था ,अब उस वक्तव्य से संग्रह का  समापन  कर रहें है.

तो प्रस्तुत है  बचा रहेगा बस्तर की भूमिका …

 

                   सियाह हाशिये
         ( स्व . मंटो से क्षमायाचना सहित )

बस्तर पर डिस्पैच लिखना बहुत कठिन है , और उससे भी ज्यादा कठिन है , यहाँ के लोगों के दुखों पर लिखना , जिनका दुख नदी जितना गहरा धरती जितना फैला हुआ और पहाड़ जितना ऊँचा है ! बस्तर के इंसान का दुख अनंत है , क्योंकि यह पूरी धरती के इंसानों के अनंत दुखों का ही एक हिस्सा है …।

बस्तर एक लंबी कविता की तरह है , चारामा से कोंटा तक , केरल राज्य से भी बड़ा लंबा – चौड़ा , विविध वर्णी !यहां के पहाड़ और धरती दोनों खनिज से लदे , भरे – पूरे लबालब हैं !यहाँ के पहाड़ और धरती दोनों हरापन संभालते , संवारते , अपनी छाती पर समेटे , जंगल , शालवन , थपेड़े सहते , मौसम की मार के .केवल देते , देते , देते और देते , लेकिन लेते कुछ नहीं !टूटते हैं पहाड़ , साफ होते जाते जंगल , बंजर होता जाता धरती का कुछ हिस्सा , हर साल !! बने पहाड़ हजारों लाखों वर्ष पहले , टूटना विखरना ही उनकी नियति रह गया है अव !!! नदी – नाले , दोनों अब बरसाती हो गये , बाकी दिन प्लांट का लाल पानी , सूखी रेत , चमकते पत्थर उबलते – बहते रहते हैं , उनमें ..

आप पहाड़ बो नहीं सकते , न लोहा कोरंडम , टिन , अभ्रक !सब कुछ समाप्त होने , नष्ट होने की तरफ गतिमान है !!धरती में जंगल है , और अब जंगल शांत है , वे आवाज , पुरानी आवाजें अव खो गई !जंगल का बहुत बड़ा हिस्सा नष्ट कर दिया गया !हम प्रकृति नहीं है , जो हजारों साल से खड़े जंगलों को काटकर बिखरा दे और फिर से उन्हें बड़ी जल्दी बो कर हरा – भरा पूरा कर दे ! हरापन हारता जा रहा है , पीछे हटता जा रहा है , जंगल !अब यहां ट्रकों , बसों की , भारी मशीनों की , मशीनगनों की आवाज गूंजती हैं , जंगल गूंगे हो गये हैं , पंछी , जानवर और यहां तक कि बचे खुचे पेड़ भी पहाड़ों के उन हिस्सों की तरफ चले गये हैं , जहाँ मशीने अब तक नहीं पहुंची हैं …

मेरे मित्र विजय सिंह कहते हैं ” बस्तर के शहरों में कोई आदिवासी रहता नजर नहीं आता , सभी अपने गांवों से शहर आते हैं , और काम निपटाकर वापस गांव चले जाते हैं । ” निम्न मध्य वर्ग या मध्यवर्गीय उखड़े हुए लोग कहीं भी बस जाते हैं , उग जाते हैं , लेकिन आदिवासी उजड़कर किस बंजर में बसेगा ?

आदिवासी और जंगल लड़ रहे हैं , आधुनिक सशस्त्र तकनीक सज्जित सभ्यता से , हारकर पीछे हटता जा रहा है , मिटता जा रहा है , नक्शे से भारत का अमेजान , सिमटता जा रहा है । कैमरे की सेटेलाइट तस्वीरें गवाह हैं ! बस्तर में पेड़ पंछी , खाईयों में , घाटियों में जा छिपे हैं , मृत्यु – संगीत और काठ के स्मृति चिन्हों को अपने साथ लेकर , किसी दिन आकाश में विलोपित होने के लिए . . . .

सभ्यता की चौड़ी होती सड़क ने हजारों पेड़ों को नष्ट करके सड़क के किनारे खड़े , काठ के स्मृति चिन्हों को , खेतों के बीच खदेड़कर विस्थापित कर दिया है । जटिल सभ्यता ने सरल जीवन को खदेड़ दिया है , मार दिया है ! ! स्मृति चिन्हों के नीचे सोये सरल जीवन की कराह क्या आपको सुनाई नही दे रही हैं ?
शोर भरे संगीत का इयर फोन आप कान में लगाये हुए , जो हैं ! ! !

बहुत से स्मृति चिन्हों को पुरखों के कोठार से हटाकर राजधानी में पुरखौती आंगन में कैद कर दिया गया है । लाला जगदलपुरी की कविताओं में , उनकी किताबों में , शानी के काला जल में , उनकी कहानियों में बचा रह जायेगा , बस्तर शायद कुछ और दिनों तक ! !

आदिवासी के सरल जीवन को , उसके आहार व्यवहार की चीजों को फासिल बनाकर , संजोकर , सजाकर राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में रख दिया गया है , जटिल सभ्यता द्वारा यही एक अंतिम श्रद्धांजलि उन्हें दे दी गई है मानों .
.
आदिवासी बाला की उन्मुक्त निश्छल हंसी , अब कहीं भी नहीं दिखाई देती , जिसका कैलेंडर बरसों हर घर में टंगा रहता था ! जे . पी . सिंघल के चित्रों में दिखता बस्तर का स्वच्छंद हाट – बाजार लुप्त हो चुका है ! ! आदिवासियों के जल – जंगल जमीन को , उनके खनिज , वनोपज को हजम कर लिया गया , रेड इंडियन की तरह , उन्हें भी एक दिन हजम कर लिया जायेगा ?

पगडंडियों के बीच तारों की रौशनी में राह चलना , सरल आदिवासी जीवन को भाता है , जबकि अरबों की चमक वाले सितारे नगरीय जीवन को भाते हैं , वे उनके प्रतीक पुरूष हैं , मॉडल हैं , ब्रांड एम्बेसेडर हैं !

बस्तर में जंगल के आदमी को , उसके जंगल को , पहाड़ को , नदी को हारते देखना – बेहद रूला देने वाला दृश्य है बस्तर पर ये कविताएँ लंबी कविता नहीं , यह लंबा पर्वत रूदन है , जंगल क्रंदन है , नदी की सिसकियाँ हैं , इनमें
आक्रोश नहीं है , सिर्फ आदिवासियों में आक्रोश है , बाकी सब तटस्थ है , या लूट में शामिल ! . . .

निर्वासित इराकी कवयित्री मिखाइल दुन्या के शब्दों में कहूँ तो ” कविता घावों की देखभाल करती है . ..वह उस घाव को निरंतर खुला रखती है . . . वह किसी
भी त्रासद् घटना को ज्यादा संवेदनशील , सौंदर्य शास्त्रीय और गहन बना देती है , . . . ” सभ्य मनुष्य ने धरती पर कई घाव किये हैं बस्तर भी उनमें से एक है ! . .

शाकिर अली

जुलाई 2006 . कुटरू .(बीजापुर ,बस्तर )

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