26.04.2019

छत्तीसगढ़ अंचल प्राचीन इतिहास और सांस्कृतिक साक्ष्य में समृद्ध है। यहां मनुष्य के गुफा कालीन जीवन से लेकर ऐतिहासिक काल तक के साक्ष्य और चिन्ह बिखरे हुए हैं, और समय-समय पर नए पुरातत्विक अवशेष प्राप्त होते रहते हैं। अवश्य काल प्रवाह और जागरूकता के अभाव में बहुत से साक्ष्य मिट गए होंगे, मगर उपलब्ध अवशेषों से भी इस क्षेत्र में प्राचीन कालीन मानव रहवास और राजसत्ता का पता चलता है।यहां एक ओर जहां जीवंत आदिम जनजातीय संस्कृति है वहीं पहाड़ो और गुफाओं में आदिम मानव द्वारा बनाये गए शैल चित्र भी प्राप्त होते हैं।कुछ स्थलों से पूर्व ऐतिहासिक काल के पाषाण स्तम्भ(मेगालिथ) भी प्राप्त हुए हैं।


‌ मौर्य-सातवाहन कालीन पुरातत्विक अवशेषों में इस अंचल में ठठारी, अकलतरा, तारापुर आदि स्थानों से तांबा तथा चांदी के आहत मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। इनमें अनेक मुद्राओं ने मयूर का अंकन प्राप्त होता है।

इतिहासकारों का मत है कि मयूर चिन्हांकित मुद्राओं का संबन्ध मौर्य शासकों से था।चीनी यात्री व्हेनसांग ने अपनी यात्रा विवरण में लिखा है कि मौर्य राजा अशोक ने दक्षिण कोशल की राजधानी में स्तूप तथा अन्य इमारतों का निर्माण कराया था। पिछले वर्षों सिरपुर के उत्खनन में एक लघु स्तूप प्राप्त भी हुआ है।मौर्यों के समय के दो लेख सरगुजा जिले में लक्ष्मणपुर के निकट रामगढ़ पहाड़ी की दो गुफाओं में प्राप्त हुए हैं। ये अभिलेख राजनीतिक अथवा धार्मिक नही हैं अपितु किसी सुतनुका नामक देवदासी और इससे प्रेम करने वाले कलाकार से सम्बंधित है.

जिन गुफाओं में ये लेख प्राप्त हुए हैं, उनमें कुछ चित्र भी चित्रित हैं, जो प्रायः नष्ट हो चुके हैं। गुफाओं के नाम जोगी माढ़ा और सीता बेंगा है। सीता बेंगा मौर्यकाल की नाटकशाला है जो भारत की सबसे पुरानी नाटकशाला प्रतीत होती है। सरगुजा में रामगढ़ के पास अशोक का लाट प्राप्त हुआ है।

सातवाहन शासकों में एक ‘आपीलक’ के तांबा का सिक्का रायगढ़ से प्राप्त हुआ है। दक्षिण कोशल में सातवाहनों के राज्य का पता व्हेनसांग के यात्रा विवरण से भी चलता है। उसने लिखा है कि प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन दक्षिण कोशल की राजधानी के निकट के एक विहार में निवास करता था और उसके समय मे कोशल का राजा कोई सातवाहन वंशीय था। चीनी यात्री के इस कथन की पुष्टि जांजगीर-चांपा जिले में सक्ती के निकट गूंजी (ऋषभतीर्थ) में प्राप्त शिलालेख से भी होती है जिसमे सातवाहन राजा कुमारवरदत्त का उल्लेख है।

सातवाहन काल मे निर्मित पाषाण प्रतिमाएं बिलासपुर जिले में प्राप्त हुई हैं। इसी समय का एक काष्ठ स्तम्भ लेख जांजगीर जिले के किरारी नामक ग्राम से प्राप्त हुआ है, जो वर्तमान में रायपुर के महंत घासीदास संग्रहालय में संरक्षित है।

किरारी ग्राम जांजगीर -चांपा जिले के मालखरौदा तहसील में है।इस गांव का ऐतिहासिक महत्व इस बात के लिए है कि अप्रेल 1921 में एक तालाब से सातवाहन कालीन अभिलेख युक्त स्तम्भ प्राप्त हुआ था। वैसे इसके आस-पास के क्षेत्र में प्राचीन अवशेष प्राप्त होते रहे हैं जिनमे खरसिया(रायगढ़) के पास शैल चित्र मिलते हैं। महानदी इस गांव से चार मील दक्षिण में बहती है।किरारी गांव में ‘हीराबांध’ नामक पुराना तालाब है।अप्रेल 1921 में अवृष्टि के कारण तालाब सुख गया था;जिससे वहां के किसान अपनी खेतों में खाद के रूप ने उपयोग के लिए तालाब की मिट्टी खोदने लगें। खुदाई के दौरान अचानक उन्हें लकड़ी का स्तम्भ प्राप्त हुआ,जिसे कीचड़ से निकाल कर उन्होंने धूप में रख दिया।स्तम्भ में अभिलेख देखकर उन्होंने इसकी जानकारी गांव के पुरोहित श्री लक्ष्मी प्रसाद उपाध्याय को दी।लेकिन सैकड़ो वर्षो से पानी मे डूबे स्तम्भ को अप्रेल की धूप में रखने से उसकी ऊपरी सतह(पपड़ी)टूट-टूट कर गिरने लगी।

ग्रामवासी तत्काल इस बात को नही समझ पाए की इसे फिर से पानी मे डूबा दिया जाय। सौभाग्य से श्री लक्ष्मी प्रसाद ने इसका महत्व समझते हुए स्तम्भ में उत्कीर्ण अक्षरों की कागज में कापी उतार ली। वे ब्राम्ही लिपि से अनभिज्ञ थे इसलिए उन्होंने इसकी आकृतिमूलक अनुकृति तैयार कर ली।उन्हें इस बात का ज्ञान नही था कि लेख किधर से शुरू हो रहा है या लिपि का कौन सा हिस्सा ऊपर है और कौन नीचे।फिर भी उन्होंने जितना दर्ज किया, महत्वपूर्ण है।

उन्होंने 349 अक्षर दर्ज किये,लेकिन संरक्षण तक 20-22 अक्षर ही बच सके।अभिलेख की जानकारी जब बालपुर के श्री लोचन प्रसाद पांडे को हुई तब उन्होंने इसे सर जान मार्शल के ध्यान में लाया, जिनके निर्देश पर स्तम्भ को पुनः पानी मे रखा गया तथा इसका रासायनिक उपचार करके नागपुर संग्रहालय में रखा गया।

स्तम्भ की ऊंचाई 13 फ़ीट 9 इंच थी। ऊपरी हिस्से में कलश था(1 फीट 2इंच), जो एक सकरे गर्दन से शेष स्तम्भ से जुड़ा हुआ था।बाद में कलश वाले हिस्से को शेष स्तम्भ से काट दिया गया, जो वर्तमान में संग्रहालय में सुरक्षित है। स्तम्भ ‘बीजा-साल’ की लकड़ी का बना है, जिसकी पानी मे टिकाऊपन के कारण छत्तीसगढ़ के तालाबों में स्तम्भ के रूप में उपयोग किया जाता रहा है।

स्तंभ आलेख
——————-
इस स्तम्भ आलेख का सर्वप्रथम अध्ययन प्रसिद्ध इतिहासकार श्री हीरानंद शास्त्री द्वारा किया गया तथा पाठ प्रस्तुत किया गया; जो ‘एपिग्राफीका इंडिका’ के जिल्द अठारह(1925-26)में प्रकाशित हुआ। ‘उत्कीर्ण लेख'(बालचंद जैन)1961 में इसका सार और पाठ प्रस्तुत है। मगर यहां एक त्रुटि हुई है। यहां स्तम्भ अभिलेख की प्राप्ति सन 1931 बताया गया है जो कि गलत है। घटना 1921 की है, इसलिए वह इपिग्राफिका इंडिका (1925-26) में प्रकाशित है। इसके अलावा श्री प्यारेलाल गुप्त के ‘बिलासपुर वैभव(1923) में प्राप्ति सन 1921 बताया गया है। यहां प्राप्ति सन का जिक्र इसलिए किया गया क्योकि बहुत से किताबों में इसे 1931 दोहराया जाता रहा है। अभिलेख की भाषा सातवाहन कालीन ‘प्राकृत’ तथा लिपि ब्राम्ही है। लिपि की नासिक के गुफा अभिलेख से काफी समानता है; हालांकि इसकी अपनी कुछ विशिष्ठ प्रकृति भी है।आभिलेख में न तो किसी राजा का नाम है, न ही सम्वत। फिर भी लिपि के आधार पर दूसरी शताब्दी का माना जाता है।

अभिलेख की विषयवस्तु

जैसा कि बताया जा चुका है लेख अब काफी नष्ट हो चुका है, लेकिन श्री लक्ष्मीधर उपाध्याय की प्रतिलिपि से ज्ञात होता है कि इसमें अनेक शासकीय अधिकारियों के नाम और पदनाम उल्लेखित हैं। उदाहरण के लिए वीरपालित और चिरगोहक नमक नागररक्षी(कोतवाल), वामदेय नामक सेनापति, खिपत्ति नामक प्रतिहार(दोवरिक), नागवंशीय हेअसि नामक गणक(लेखपाल), घरिक नामक गृहपति, असाधिक नामक भाण्डागारिक(संग्रहागार का अधिकारी), हस्त्यरोह,अश्वारोह, पादमलिक(पुरोहित या पंडा), रथिक, महानसिक,(रसोई संबंधी प्रबंध करने वाला), हस्तिपक, धावक(आगे-आगे दौड़ने वाला), सौगंधक, गोमांडलिक, यानशालायुधगारिक, प्लवीथिदपालिक, लेखहारक, कुलपुत्रक और महासेनानी। इन पदनामों में से बहुतेक का उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी मिलता है। इन पदाधिकारियों का एक साथ इस लेख में उल्लेख होने से अनुमान किया जा सकता है कि प्रस्तुत स्तम्भ अवश्य ही किसी बड़े समारोह के आयोजन के अवसर पर खड़ा किया गया था और उस आयोजन को करने वाला राजा शक्तिशाली रहा होगा।

काष्ठ स्तम्भ आखिर क्या है?
————————————-
इस स्तम्भ के सम्बंध में एक समस्या यह रही है कि यह मूल रूप से क्या है? छत्तीसगढ़(और अन्य प्रांतों में भी) तालाब निर्माण के साथ उसके मध्य में स्तम्भ लगाने की परंपरा रही है, मगर उसमे अभिलेख नही होते हैं। चूंकि यह स्तम्भ तालाब की मिट्टी में ही दबा हुआ प्राप्त हुआ है, इससे प्रथम दृष्टया सामान्य तालाब स्तम्भ होने की तरफ ध्यान जाता है। मगर यह स्तम्भ अभिलेख युक्त है,और इसमें महत्वपूर्ण राजकीय पदाधिकारियों के नाम हैं, इसलिए यह सामान्य तालाब स्तम्भ प्रतीत नही होता। यह स्तम्भ अद्वितीय इसलिए भी है क्योंकि लेखयुक्त स्तम्भ पत्थर के तो बहुत मिलते हैं किंतु काष्ठ का लेखयुक्त प्राचीन स्तम्भ कहीं नही पाया गया है।इतिहासकारों के अनुसार यह यज्ञ स्तम्भ ‘यूप’ हो सकताहै,जो प्राचीन काल मे यज्ञ के दौरान गड़ाये जाते थें। लेकिन डॉ हीरानंद शास्त्री ने यज्ञ स्तंभों के अध्ययन से बताया है कि यह ‘यूप’ प्रतीत नही होता क्योंकि अभी तक प्राप्त स्तम्भ पाषाण के मिले हैं। फिर शास्त्रों में ‘यूप’ के जो विधान बताए गए हैं, यह उसके अनुकूल नही है। शास्त्री जी के अनुसार इसका सम्बन्ध वाजपेय जैसे किसी यज्ञ से है, या फिर जयस्तंभ अथवा ध्वजस्तंभ है। मगर इतना स्पष्ट है कि स्तम्भ किसी विशेष आयोजन अथवा उपलक्ष्य से संबंधित है। स्तम्भ अन्य स्थल का भी हो सकता है; इतिहास के लंबे समय अंतराल में किसी समय अथवा तालाब निर्माण के समय भी स्तम्भ हीराबन्ध तालाब में स्थापित किया गया होगा जो कालांतर में में गिरकर कीचड़ में दब गया होगा।बहरहाल आगे शोध से शायद कुछ और जानकारी मिलेंगे।

अभिलेख का पाठ
—————————–
अभिलेख का सर्वप्रथम पाठ डॉ हीरानंद शास्त्री ने एपिग्राफिका इंडिका के जिल्द अठारह(1925-26) में प्रकाशित कराया गया था बाद में बालचन्द जैन कृत ‘उत्कीर्ण लेख’ में इसका देवनागरी में प्रकाशन हुआ, जो शास्त्री जी के पाठ पर आधारित है। अभिलेख की भाषा प्राकृत और लिपि ब्राम्ही है। प्रस्तुत पाठ ‘उत्कीर्ण लेख’ से लिया गया है।

पंक्ति(1)
नगरखिनो व [ी] रप [।] हके सेनापति देव बमदेया धि—
—ग—णौतावस(ब्) हथिबमदेयिकम-स पटिल- ि———ि——सा—ि—–ि——-सा—–ि—–सा——-नो भटाय केसवविठिदकामिक तते(भभे) साविद निमित

पंक्ति (2)
पतिहार खिपत्ति गणकनाग हेअसि गाहपातिय घरिक असाधिअ वैहाथधिआर हथारोहे असारोहे देवथयक पादमूलिक रथिक सिसार खखिमल बुतनमक तभक महानसिक कुकुडभट

पंक्ति(3)
हाथविक यमसिक धावक सगन्धके गोमण्डलिक यानसालायुधघरिके दलिअखेम्ह पल विठिद बालिके अवसरकारक सखरदापदेअक बदि केसवनाषो बचरे अनु- यिनो दुनुवृत्त लेहहारके पेत्स पयुतसाव कुलीपुत्तमनुसेन [।] पति

पंक्ति(4)
बु ——सलिनम -[बु] हेसर महसेनानि सिठरज—कुद्ध—पुतस—–पिज्त —–रपयति गमे पूवरठि—–कवयु—-से –न कुम[।] र[े]—-ड—न[।] यक

पंक्ति(5)
भययुर [द] पा-ट आ —पुन [वि] यामे

अनुवाद
————
नगररक्षी वीरपालित और चिरगोहक, सेनापति वामदेव–भट केशव वीथिदकामिक—-प्रतिहार खिपत्ति, गणक नाग हेअसि, गृहपतिक घरिक, भांडागारिक असाधिय,——हस्त्यारोह, अश्वरोह, देवस्थानक, पादमूलीक, रथिक सिसार खखिमल —-महानसक कुकुडभट, हस्तिपक यमश्री, धावक, सौगंधक, गोमांडलिक, यानशालायुधागरिक दलितसिंह ?, पलवीथिदपालक, अवश्यकारक,——केशवनाथ,—— लेखहारक प्रयुक्त——कुलपुत्र—–सेनापति——महासेनापति सिद्धराज —के पुत्र —कुमार—-नायक—

अभिलेख से स्पष्ट है कि यदि यह पूरा सुरक्षित होता तो कुछ नामों और सम्भवतः आयोजन अवसर को जाना जा सकता था।बहरहाल इतिहास में इस बात की चिंता नही किया जाता कि क्या सुरक्षित नही रह सका।इतिहास में उपलब्ध सामग्री के अधिकतम विश्लेषण पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

संदर्भ
(1)एपिग्राफिका इंडिका वाल.18- डॉ हीरानन्द शास्त्री का आलेख(1925-26)
(2)उत्कीर्ण आलेख-बालचन्द जैन(1961)
(3)छत्तीसगढ़ का इतिहास-डॉ रामकुमार बेहार
(4) बिलासपुर वैभव- प्यारेलाल गुप्त (1923)


#अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा(छ. ग.)
मो. 9893728320