जनादेश के बाद जीत का ताना-बाना लेकिन हार के हालात में बीजेपी को जिन्दा रखने का कोई प्लान ना होना संघ को भी डराने लगा है। : पुण्य प्रसून बाजपेयी का विश्लेषण .

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ये कलयुग है और कलयुग में ना तो महाभारत संभव है ना ही गीता का पाठ। या फिर न्याय के लिये संघर्ष। जोड़-तोड़ की भी कलयुग में उम्र होती है। कलयुग में तो ताकत ही सब कुछ है और ताकत का मतलब ज्ञान नहीं बल्कि धोखा-फरेब के आसरे उस सत्ता का जुगाड़ है जिस जुगाड़ का नियम है खुद के साथ सब कुछ स्वाहा करने की ताकत। और जब तक ताकत है तब तक स्वाहा होते हालात पर कोई अंगुली नहीं उठाता। सवाल नहीं करता। 

स्वयंसेवक साहेब का यह अंदाज पहले कभी नहीं था। लेकिन आप ये कह क्यों रहे हैं और हम सभी तो चाय के लिये आपके साथ इसलिये जुटे हैं कि कुछ चर्चा चुनाव की हो जाये। लेकिन आज आप सतयुग और कलयुग का जिक्र क्यों कर बैठे हैं। मुझे टोकना पड़ा। क्योंकि मेरे साथ आज प्रोफेसर संघ के भीतर की उस हकीकत को समझने आये थे जहां प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से उतारने के पीछे संघ है या बीजेपी। या फिर संघ अब अपने पाप-पुण्य का परीक्षण भी मोदी के 2019 के समर में कर लेना चाहता है। 

दरअसल प्रोफेसर साहेब के इसी अंदाज के बाद स्वयंसेवक महोदय जिस तरह कलयुग के हालात तले 2019 के चुनाव को देखने लगे उसमें स्वयंसेवक ने खुले तौर पर पहली बार माना कि मोदी-शाह की खौफ भरी बाजीगरी तले बीजेपी के भीतर की खामोश उथलपुथल। संघ का हिन्दू आंतक को लेकर प्रज्ञा क जरिये चुनाव परीक्षण । और जनादेश के बाद जीत का ताना-बाना लेकिन हार के हालात में बीजेपी को जिन्दा रखने का कोई प्लान ना होना संघ को भी डराने लगा है। 

तो क्या संघ मान रहा है मोदी चुनाव हार रहे हैं। प्रोफेसर साहेब ने जिस तरह सीधा सवाल किया उसका जवाब पहली बार स्वयंसेवक महोदय के काफी हद तक सीधा भी दिया और उलझन भी पैदा कर दी। मैंने आपको कहा ना ये महाभारत काल नहीं है लेकिन महाभारत का कैनवास इतना बड़ा है कि उसमें कलयुग की हर चाल समा सकती है। सिर्फ आपको अपनी मन:स्थिति से हालात को जोड़ना है । और अब जो मैं कहने जा रहा हूं उसे आप सिर्फ सुनेंगे….टोकेंगे नहीं । 

जी…मैं और प्रोफेसर साहेब एक साथ ही बोल पड़े। 

तो समझे …संघ तो भीष्म की तरह बिधा हुआ युद्ध स्थल पर गिरा हुआ है । संघ जब चाहेगा उसकी मौत तभी होगी। लेकिन मौजूदा हालात में संघ की जो ताकत बीजपी को मिला करती थी वह मोदी के दौर में उलट चुकी है। कल तक संघ अपने सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों के जरिये राजनीति का परिष्करण करता था। अब संघ को परिष्करण के लिये भी बीजेपी की जरुरत है। और इसकी महीनता को समझें तो कांग्रेस की सत्ता के वक्त हिन्दू आंतकवाद का सवाल संघ को नहीं बीजेपी को डरा रहा था । क्योंकि बीजेपी को संघ की ताकत और समाज को प्रभावित करने की उसकी क्षमता के बारे में जानकारी थी । और राजनीतिक तौर पर संघ की सक्रियता के बगैर बीजेपी की जीत मुश्किल होती रही ये भी हर कोई जानता है । ऐसे में मोदी सत्ता काल में हिन्दू आंतकवाद की वापसी का भय सत्ता जाने के भय के साथ जोड़ दिया गया । 

किसने जोड़ा….प्रोफेसर बोले नहीं कि …संवयंसेवक महोदय बोल पड़े । प्रोफेसर साहेब पूरी बात तो सुन लीजिये..क्योंकि आपका सवाल बचकाना है। अरे सत्ता जिसके पास रहेगी वह कतई नहीं चाहेगा कि सत्ता उसके हाथ से खिसक जाये । तो सत्ता बरकरार रखने के लिये उसके अपने ही चाहे नीतियों का विरोध करते रहे हों लेकिन सभी को जोड़ने के लिये कोई बड़ा डर तो दिखाना ही पड़ेगा । तो हिन्दू आतंकवाद का भय दिखाकर संघ को सक्रिय करने की बिसात भी मौजूदा सत्ता की ही होगी । और उसी का परिणाम है कि प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से बीजेपी के टिकट पर उतारा गया है । 

लेकिन आप तो डर और खौफ को बड़े व्यापक तौर पर मौजूदा वक्त में सियासी हथियार बता रहे थे । 

वाजपेयी जी आप ठीक कह रहे हैं लेकिन उसकी व्यापकता का मतलब पारंपरिक तौर तरीकों को खारिज कर नये तरीके से डर की परिभाषा को भी गढ़ना है और ये भी मान लेना है कि ये आखरी लड़ाई है । 

आखरी लड़ाई….

जी प्रोफेसर साहेब आखरी लड़ाई । 

तो क्या चुनाव हारने के बाद मोदी-शाह की जोड़ी को संघ भी दकरिनार कर देगा । 

अब ये तो पता नहीं लेकिन जिस तरह चुनावी राजनीति हो रही है उसमें आप ही बताइये प्रोफेसर साहेब क्या-क्या मंत्र अपनाये जा रहे हैं। 

आप अगर मोदी का जिक्र कर रहे हैं तो तीन चार हथियार तो खुले तौर पर हैं। 

जैसे 

जैसे मनी फंडिंग ।

मनी फंडिंग का मतलब । 

मतलब यही कि ये सच हर कोई जानता है कि 2013 के बाद से कारपोरेट फंडिंग में जबरदस्त इजाफा हुआ है । आलम ये रहा है कि सिर्फ 2013 से 16 के बीच 900 करोड़ की कारपोरेट फंडिंग हुई जिसमें बीजेपी को 705 करोड़ मिले । इसी तरह 2017-18 में अलग अलग तरीके से पोलिटिकल फंडिंग में 92 फीसदी तक बीजेपी को मिले । यहां तक की 221 करोड़ के चुनावी बांड में से 211 करोड़ तो बीजेपी के पास गये । लेकिन जब बैंक में जमा पार्टी फंड दिखाने की स्थित आई तो 6 अक्तूबर 2018 तक बीजेपी ने सिर्फ 66 करोड़ रुपये दिखाये । और जिन पार्टियों की फंडिंग सबसे कम हुई वह बीजेपी से ऊपर दिखे । मसलन बीएसपी ने 665 करोड़ दिखाये और वह टॉप पर रही । तो सपा ने 482 करोड़ और कांग्रेस ने 136 करोड़ दिखाये । 

तो इससे क्या हुआ । 

अरे स्वयंसेवक महोदय क्या आप इसे नहीं समझ रहे हैं कि जिस बीजेपी के पास अरबों रुपया कॉरपोरेट फंडिंग का आया है अगर उसके बैंक खाते में सिर्फ 66 करोड़ है जो कि 2013 में जमा 82 करोड़ से भी कम है तो इसके दो ही मतलब हैं । पहला , चुनाव में खूब धन बीजेपी ने लुटाया है । दूसरा, फंडिंग को किसी दूसरे खाते में बीजेपी के ही निर्णय लेने वाले नेता ने डाल कर रखा है । यानी कालेधन पर काबू करेंगे या फिर चुनाव में धनबल का इस्तेमाल नहीं होना चाहिये । इसे खुले तौर खत्म करने की बात कहते-कहते बीजेपी संभालने वाले इतने आगे बढ़ गये कि वह अब खुले तौर पर बीजेपी के सदस्यों को भी डराने लगे हैं। 

कैसे डराने लगे हैं। 

डराने का मतलब है कि बीजेपी के भीतर सत्ता संभाले दो तीन ताकतवर लोगों ने बीजेपी के पूर्व के कद्दावर नेताओं तक को एहसास करा दिया है कि उनके बगैर कोई चूं नहीं कर सकता। या फिर जो चूं करेगा वह खत्म कर दिया जायेगा। इस कतार में आडवाणी, जोशी या यशंवत सिन्हा सरीखों को शामिल करना जरुरी नहीं है बल्कि समझना ये जरुरी है कि मोदी सत्ता के भीतर ताकतवर वही हुए जिसकी राजनीतिक जमीन सबसे कमजोर थी । सीधे कहें तो हारे,पीटे और खारिज कर दिये लोगों को मोदी ने कैबिनेट मंत्री बनाया । और धीरे धीरे इसकी व्यापकता यही रही कि समाज के भीतर लुंपेन तबके को सत्ता का साथ मिला तो वह हिन्दुत्व का नारा लगाते हुये सबसे ताकतवर नजर आने लगा । 

तो दो हालात आप बता रहे हैं। वाजपेयी जी अपको क्या लगता है मोदी सत्ता ने जीत के लिये कौन सा मंत्र अपनाया । 

स्वयंसेवक मोहदय जिस अंदाज में पूछ रहे थे मुझे लगा वह भी कुछ बोलने से पहले हमारी समझ की थाह लेना चाहते हैं । बिना लाग लपेट मैंने भी कहा । डर और खौफ का असल मिजाज तो छापों का है । चुनाव का ऐलान होने के बाद नौ राज्यों में विपक्ष की राजनीति करते नेताओं के सहयोगी या नेताओं के ही दरवाजे पर जिस तरह इनकम टैक्स के अधिकारी पहुंचे । उसने साफ कर दिया कि मोदी अब आल वर्सेस आल की स्थिति में ले आये हैं । इसलिये परंपरा टूट चुकी है क्योंकि मोदी को एहसास हो चला है कि जीत के लिये सिर्फ प्रज्ञा ठाकुर सरीखे इक्के से काम नहीं चलेगा बल्कि हर हथियार को आजमाना होगा । और इसी का असर है कि मध्यप्रदेश , कर्नाटक , तमिलनाडु, यूपी, बिहार, कश्मीर, बंगाल, ओडिशा में विपक्ष के ताकतवर नेताओं के घर पर छापे पड़े । 

तो क्या हुआ ….

हुआ कुछ नहीं बंधुवर ..अब मुझे स्वयंसेवक महोदय को ही टोकना पड़ा । दरअसल हालात ऐसे बना दिये गये हैं कि सत्ता से भागीदारी करते तमाम संस्थानों के प्रमुख को भी लगने लगे कि मोदी हार गये तो उनके खिलाफ भी नई सत्ता कार्रवाई कर सकती है …. तो आखरी लड़ाई संवैधानिक संस्थाओं समेत मोदी सत्ता से डरे सहमे नौकरशाहों की भी है ।

तो क्या ये असरकारक होगी । कहना मुश्किल है । लेकिन मोदी का खेल इसके आगे का है। इसलिये लास्ट असाल्ट के तौर पर इस चुनाव को देखा जा रहा है और संघ इससे हैरान-परेशान भी है । 

क्यों…

बताता हूं । लेकिन गर्म चाय लेकर आता हूं फिर …

जारी ….

 

(ये लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के फेसबुक से साभार लिया गया है।)

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