बिलासपुर , मई दिवस का आव्हान .

साथियों,

आज से 133 साल पहले शिकागो के मजदूरों ने एक निश्चित सेवा शर्तों और 8घंटे काम के अधिकार के लिए अपना खून बहाया था और उसी खून से सने कमीज़ को झंडा बना लहराया था।तब से यही लाल झंडा दुनियाभर के श्रमजीवियों के संगठन, संघर्ष और अधिकारों का प्रतीक बना हुआ है। अधिकार संपन्न इस मेहनतकश वर्ग ने दुनिया से गरीबी भुखमरी और अन्याय दूर करने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।

आज इसी मेहनतकश वर्ग ने इतनी उत्पादन क्षमता पैदा कर लिया है कि संपूर्ण मानवता भूख और गरीबी से मुक्त हो जाए। बावजूद इसके यदि आज गरीबी भूखमरी और विषमता है तो वह इसलिए कि पूरी व्यवस्था निजी लाभ के लिए समर्पित है। आज मेहनतकश वर्ग के मानवीय विकास में योगदान की घोर उपेक्षा हो रही है, ऐसे समय में हमें अपने इतिहास को भी एक बार फिर से समझने की जरूरत आ पड़ी है ताकि हम मेहनतकश वर्ग का भविष्य संवार सकें।

दोस्तों 1886 में जब मजदूर वर्ग ने अपना लाल परचम लहराया था तब सारी दुनिया की आबादी आज के भारत की आबादी से भी कम थी। और अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कमी के चलते लगातार युद्ध की स्थिति बनी रहती थी। लेकिन जैसे ही संगठित मजदूर वर्ग ने राजनीति में नीतियां तैयार करने में अहम भूमिका निभाना शुरू किया अंधविश्वास की सामंती जड़ता को तोड़ा वैसे ही विज्ञान तकनीक और मानवश्रम ने मिलकर मनुष्य के जीवन स्तर को बढ़ाया और उसके सर्वांगीण विकास का रास्ता प्रशस्त किया।आज दुनिया की आबादी 700 करोड़ से अधिक है, हमारे देश की आबादी 130 करोड़ से अधिक है, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रचुरमात्रा में सामग्रियां उपलब्ध है हां यह जरूर है कि आय की विषमता और बेरोजगारी के कारण समाज के बड़े हिस्से तक वह नहीं पहुंच रहा।90 के दशक से जारी आर्थिक उदारीकरण की नीतियों ने देश के करोड़ों मेहनतकशों के श्रम से उपजे लाभ को चंद अमीरों की झोली में डाल दिया नतीजा यह हुआ कि आज देश में उंगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद अमीरों के हाथों देश की दो तिहाई संपत्ति सिमट गई है।हाल में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार 73 कारपोरेट घरानों के हाथ देश की आधी संपत्ति है।

इसलिए आज ये कारपोरेट इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि अब वो लोग सरकार बनाते हैं और जनता उनके मोहरे बनकर रह गई है। ये कारपोरेट कभी नहीं चाहते कि दुनियाभर में और हमारे देश में आई संपन्नता का श्रेय मेहनतकश हिस्से को मिले। मेहनतकश हिस्सों की घोर उपेक्षाओं का ही नतीजा है कि उदारीकरण की नीतियों के कारण जहां पांच लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं वहीं प्रचुर उत्पादन के बावजूद भुखमरी की स्थिति मौजूद है और यदि जनता के बड़े हिस्से को सस्ता अनाज अन्य सबसीडियां न मिले तो स्थिति और भयावह हो जाए। और अब यह विषमता धीरे धीरे पश्चिम के संपन्न देशों तक पहुंच रहा है।

दुनिया का और हमारे देश का मेहनतकश हिस्सा अपनी उपलब्धियों और अपने अधिकारों की चेतना के साथ विषमता वादी समाज व्यवस्था को बदलने आगे न बढ़े इसके लिए दुनिया की तीन चौथाई संपत्ति पर काबिज कारपोरेट इतिहास और विचारों के खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं और धार्मिक भाषाई नस्लवादी समूहों को धन उपलब्ध कराकर दुनियाभर में आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रहे हैं।कितनी हास्यास्पद बात है कि मुस्लिम शासकों वाले देशों में इस्लाम खतरे में है और हिन्दू शासित देश में हिंदुत्व ख़तरे में है का नारा लगा मेहनतकश हिस्से में बिखराव, अलगाव पैदा किया जा रहा है।इस तरह का नारा लगाने वाले कभी भी कारखाना लगाने,स्कूल अस्पताल खोलने, रोजगार देने किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य देने , समाज में व्याप्त विषमताओं को दूर करने का नारा नहीं देते।इन नारों का एक ही उद्देश्य होता है मेहनतकशों की एकता को तोड़ना और दुनिया की सारी संपत्ति को चंद पूंजीपतियों के हाथों सौंपना।

इसलिए आर्थिक उदारीकरण के दौर से हम देखते हैं कि कारपोरेट उन्ही राजनीतिक दलों को धन और प्रचार का संरक्षण दे रहे हैं जो लगातार उन्माद पैदा कर व्यापक जनता के बीच असुरक्षा पैदा कर सकें और फिर उस असुरक्षा को धन और बाहुबल से अपने पक्ष में कर सकें। भीड़ की हिंसा इसी षड्यंत्र का हिस्सा है। पूंजीवाद आज इस स्थिति में पहुंच चुका है जहां वह रोजगार पैदा नहीं कर सकता। इसलिए वह लोककल्याण की जगह विध्वंसक राजनीति को स्थापित कर रही है।इस अमानवीय विनाशकारी राजनीति का मुकाबला जागरूक मेहनतकश वर्ग ही कर सकता है और उसी में यह क्षमता है। इसलिए आइए हम अपनी ताकत को पहचानें और विज्ञान तकनीक और मानवश्रम को मिला विघटनकारी ताकतों को परास्त करें।

ट्रेड यूनियन कौंसिल बिलासपुर

और समस्त मेहनतकश वर्ग