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14.04.2019

*शरद कोकास* : गांधी और आंबेडकर दोनों महामानवों का भारत के साहित्यिक समाज में काफी प्रभाव रहा है । लेकिन यह देखा जाता है कि अनेक दलित साहित्यकार आंबेडकर को जितना मानते हैं उतना वे गांधी को नहीं मानते । आंबेडकर के प्रति आस्था तो उनके मन में है लेकिन वे गांधी का विरोध करते हैं क्या इसका कारण यह है कि गाँधी और आंबेडकर के बीच वैचारिक भिन्नता रही है जबकि स्वतंत्रता आंदोलन में दोनों की उल्लेखनीय भूमिका रही है ?

*अजय तिवारी* : इसका सही सही कारण तो दलित विचारक ही बता सकते हैं । लेकिन गांधी और आंबेडकर के बीच के विवाद को आज के संदर्भ में देखना मैं उचित नहीं समझता हूं और उसकी वजह है । गांधी और उनके आंदोलन ने अछूतों के प्रति घृणा का प्रचार नहीं किया बल्कि जो घृणा मौजूद थी उस घृणा को कम करने और राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में सारी भारतीय जनता को सक्रिय करने का काम किया । यही उनका परिप्रेक्ष्य था । उस समय हरिजनों को आबादी के साथ रहने की इजाजत नहीं थी । हम आज की रोशनी में ना देखे जब हम 21वीं शताब्दी में जा रहे हैं बल्कि हम उस रोशनी में देखें जब हम 19 वी शताब्दी से आ रहे थे । तब उन्होंने हरिजनों की बस्तियां बसाई और उन बस्तियों में खुद रहते थे । उन्होंने हरिजन सेवक संघ भी बनाए । यह सही है कि गांधीजी के लिए अछूतोद्धार एक रचनात्मक कार्यक्रम था, सामाजिक परिवर्तन का कार्यक्रम नहीं था । उनकी सुधारवादी दृष्टि की यह सीमा थी और इस सुधारवादी दृष्टि में रहते हुए गांधी जी ने हरिजनों के प्रति और समाज के दलित वर्ग के प्रति सद्भावना का और उनके जीवन में सुधार का प्रयत्न किया । हम अगर उस युग के संदर्भ में देखें तो यह चीज बहुत महत्वपूर्ण थी ।

लेकिन आंबेडकर की स्थिति दूसरी थी । आंबेडकर स्वयं दलित वर्ग से आते थे और इसलिए उन्हें उस कष्ट का जैसा अनुभव था वैसा अनुभव शायद किसी दूसरे विचारक को नहीं हो सकता था । और आंबेडकर जहां से आए थे, कई सौ साल के बाद एक बहुत बड़ा आदमी निकला था दलित वर्ग के बीच से, जो विदेश तक पढ़ने गया और अपने सारे अपमान के विरुद्ध उठते हुए उसने अपने पूरे समाज को आत्म गौरव प्रदान किया । इसलिए अगर हम दलितों की आंख से देखें तो आंबेडकर उनके लिए महामानव हो जाते हैं जिनमें उनकी पीड़ा भी अभिव्यक्त होती है और उनकी मुक्ति भी अभिव्यक्त होती है । दलित साहित्यकार इसलिए आंबेडकर को अधिक मानते हैं और आंबेडकर को मानने में आपत्ति किसी को नहीं होना चाहिए ।

*शरद कोकास* : क्या इसलिए आंबेडकर के बारे में वही रवैया अपनाना चाहिए जो गांधी के बारे में अपनाना चाहिए । केवल आज के संदर्भ में आंबेडकर पर विचार करना गलत है । क्या हमें इसे पूरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता नहीं है ?

*अजय तिवारी* : उदाहरण के लिए मैं खुद आंबेडकर की रचनाएं पढ़ने के पहले यह समझता था कि वे भारतीय समाज के अंतर्विरोधों को अधिक मुख्य समझते थे और इसलिए अंग्रेजों से दोस्ती करने के पक्ष में थे । यह पक्ष उनका मुझे अच्छा नहीं लगता था लेकिन आंबेडकर की रचनाएं पढ़ते हुए एक बात मैंने बार-बार महसूस की कि एक तरफ पश्चिमी जनतंत्र का आदर्श और दूसरी तरफ भारतीय समाज की विसंगतियां और उसके अंतर्विरोध दोनों आंबेडकर की चिंतन धारा में बहुत गहराई से मौजूद हैं इस अंतर को हम उस समय की रोशनी में देखें तो व्याख्या कर सकते हैं लेकिन आंबेडकर ने कहीं भी राष्ट्रीय आंदोलन के प्रश्न को अथवा भारतीय स्वाधीनता के प्रश्न को अंग्रेजी राज्य की दमनकारी व उत्पीड़न कारी भूमिका को कम करके नहीं आंका है इसलिए आंबेडकर राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध नहीं थे । यद्यपि बहुत जगहों पर गांधी से उनका मतभेद था और उस मतभेद का मूल सारतत्व अभी मैंने आपको बताया लेकिन गांधी की प्रशंसा भी आंबेडकर ने की है और गांधी ने भी आंबेडकर को कभी ट्रैटर नहीं कहा, गद्दार नहीं कहा । वह विचारों की टकराहट है और उस युग में कांग्रेस के भीतर भी विचारों की टकराहट मौजूद है जो एक समाज के भीतर है इसलिए आंबेडकर को बड़ा मानना और गांधी को छोटा मानना यह बहुत तर्कसंगत नहीं है । आंबेडकर उन्हें महामानव की तरह लगते हैं, बहुत स्वाभाविक है लेकिन गांधी के प्रति भी हम आज की स्थितियों से प्रेरित ना हो तो शायद ज्यादा अच्छा होगा ।

*शरद कोकास* : लेकिन जब हम देश की आजादी के संदर्भ में दोनों के योगदान की बात करते हैं तो देखते हैं कि आंबेडकरवादी आंबेडकर के योगदान को गांधी के योगदान से ज्यादा मानते हैं यही नहीं स्वतंत्रता प्रप्ति के पश्चात संविधान निर्माण में भी उनकी भूमिका को उल्लेखनीय मानते हैं , वहीँ कुछ गांधी के योगदान को आंबेडकर के योगदान से अधिक समझते हैं तो इनकी तुलना किस तरह से हो सकती है ? क्या इसके पीछे पूर्वाग्रह नहीं है ?

*अजय तिवारी* : मैं दोनों के योगदान को परस्पर पूरक मानता हूं । आंबेडकर स्वाधीनता या राष्ट्रीय आंदोलन की एक बहुत बड़ी असंगति की तरफ ताकत के साथ ध्यान आकर्षित कर रहे थे और वह असंगति थी गांव में खेतीहर संबंध और भारतीय समाज में जाति बिरादरी के संबंध । मैं इस बात को रेखांकित करना चाहता हूँ कि आंबेडकर ने भूमि सुधार की आवश्यकता बहुत अधिक बताई है

*शरद कोकास*: लेकिन इस आवश्यकता की ओर तो किसी का ध्यान ही नहीं गया ? सब लोग केवल जाति बिरादरी की ही बात करते रहे । उनकी वैज्ञानिक सोच पर भी किसी ने बात नहीं की । आम्बेडकर की पूजा करना और उन्हें पढ़ना यह दोनों अलग बाते हैं ।

*अजय तिवारी* : जितनी आवश्यकता आज हमारे दलित नेता और दलित लेखक नहीं महसूस करते हैं और वे आंबेडकर का नाम लेते हैं आंबेडकर को पूजा की वस्तु बनाते हैं लेकिन यह आंबेडकर के विचारों के अनुयाई नहीं है और इस बात पर कोई सूली चढ़ा दे तो भी इस सच को मैं बार बार कहूंगा कि आंबेडकर ने जाति बिरादरी के सवाल को सामाजिक व्यवस्था के सवाल से जिसमें उत्पादन के संबंध और आर्थिक स्त्रोत शामिल हैं, इस सवाल से अलग करके कभी नहीं देखा इसलिए आंबेडकर का चिंतन वैज्ञानिक था । गांधी जी की समस्या यह थी और जिस कारण से यह जरूरत आंबेडकर को ज्यादा महसूस होती थी और किसके कारण आंबेडकर की चिंतन धारा में एकांगी दिखाई पड़ता है कहीं कहीं वह कारण यह था कि गांधी जी भारतीय समाज के अंतर्विरोधों का गुमान कर सारी भारतीय जनता को अंग्रेजो के खिलाफ लड़ने के लिए उठाना चाहते थे । उनकी राजनीति उनकी नजर में गलत नहीं थी लेकिन उनकी राजनीति भारतीय समाज के अंतर्विरोधों का समाधान कर सकती थी या नहीं कर सकती थी । स्वराज के बाद भारतीय समाज कैसा होगा इसके बारे में गांधी जी के समय और गांधीजी की प्रशंसा करने वालों ने भी आलोचना की है । प्रेमचंद जो गांधीवादी आदर्श वाद के अनुयाई माने जाते रहे हैं उन्होंने गांधीवाद की जैसी आलोचना की और यह आलोचना उन्नीस सौ तेईस चोवीस में शुरू कर दी थी । प्रेमचंद ने उनकी आलोचना करनी शुरू की, निराला ने आलोचना करनी शुरू की, उग्र ने आलोचना करनी शुरू की और हिंदी साहित्य में सन तीस के बाद विशेष रूप से गांधीवाद से अलग हटकर चला या नहीं चला ?

अब एक बात पर विचार करें कि तीस के बाद या तीस के आसपास से जब गांधी जी के आंदोलन का सुधारवादी चरित्र लोगों के सामने साफ हो गया जब जनता एक सीमा से आगे बढ़ती है और गांधीजी आंदोलन पीछे खींच लेते हैं । इसमें विदेशी सत्ता को सहायता मिलती है और भारतीय समाज के रूढ़िवादियों को सहायता मिलती है और सांप्रदायिक दंगे ज़ोर पकड़ते हैं । उनकी इस असफलता से राजनीति में अहिंसावाद के विकल्पों की खोज, जिसका परिणाम क्रांतिकारी आंदोलन, कांग्रेस के भीतर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और वामपंथी धारा और साहित्य में आदर्शवाद के विकल्प के रूप में यथार्थवाद की खोज, जिसका विकास प्रगतिवाद में हुआ । दोनों प्रक्रियाएं साथ घटित हो रही हैं । गांधी और आंबेडकर के अंतर्विरोध उन्नीस सौ तीस के पहले वाले हिंदुस्तान की वास्तविकताओं का परिणाम है लेकिन यह चलते रहते हैं । समस्या यह है कि इसके बाद आंबेडकर की विचारधारा में जो परिवर्तन लाना चाहिए था शायद उसे लाने में वे असमर्थ रहे । गांधी जी को जो लाना चाहिए था वे भी असमर्थ रहे और इसलिए भारत की आजादी की लड़ाई और भारत का सामाजिक जीवन इन दोनों से अलग रास्ते पर चला । लेकिन अंतर्विरोधों को सुधारवादी तरीके से दबाने की जो गांधी जी की नीति थी उसका प्रतिवाद आंबेडकर कर रहे थे । इन दोनों को मिलाने से वह नीति पैदा होती थी जो क्रांतिकारी आंदोलन की नीति थी इसलिए आंबेडकर और गांधी परस्पर पूरक ज्यादा हैं परस्पर विरोधी कम हैं ।

*शरद कोकास* : लेकिन उस दौर में तो अपनी प्राथमिकताओं की वजह से दोनों विरोधी दिखाई देते हैं । यदि हम दोनों के तत्कालीन स्वप्न के संदर्भ में बात करें कि गांधी का स्वप्न और आंबेडकर का स्वप्न यह दो भिन्न स्वप्न थे तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में किसके सपनों के अनुसार भारत होना चाहिए या इससे अलग भी कुछ सोच सकते हैं ?

*अजय तिवारी* : गांधी के स्वप्न की एक बड़ी भारी सीमा यह थी कि गांधीजी वर्ग विरोधों को समाप्त नहीं करना चाहते थे लेकिन जाति प्रथा के अभिशाप को दूर करना चाहते थे जबकि दोनों आपस में संबंधित हैं और जो आज अपने आप को आंबेडकरवादी कहते हैं वास्तव में वे गांधीवादी हैं नाम आंबेडकर का लेते हैं और हैं गांधीवादी । भारत की वर्गीय संरचना को यह लोग और स्वीकार करते हैं और केवल जाति बिरादरी के सवाल को यह लोग प्रमुख समझते हैं तो यह गांधीवादी दृष्टिकोण है यह आंबेडकर का दृष्टिकोण नहीं है । आंबेडकर एक ऐसा समाज चाहते थे जहां जातियों के बीच का अंतर्विरोध ना हो, सभी मनुष्य समान हो और उसके साथ साथ सभी मनुष्यों को जीवन के समान साधन मिले, समान सुविधाएं मिले और इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो आंबेडकर का स्वप्न समाजवाद के ज्यादा नजदीक पड़ता है और जाहिर है हमें आंबेडकर के सपनों के हिसाब से भारत बनाना चाहिए ⃓

*शरद कोकास* : आज हमारे यहां प्रचुर मात्रा में जो गांधीवादी साहित्य और आंबेडकर का साहित्य उपलब्ध है उन में से किसमें अधिक सामाजिक पहलू दिखाई देते हैं ?

*अजय तिवारी* : सामाजिक पहलू से आपका आशय मैं समझा नहीं ?

*शरद कोकास* : सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में आंबेडकर और गांधी के कार्यों को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया गया है ⃓आंबेडकर को संविधान निर्माता कहा गया है गांधी को राष्ट्रपिता ⃓ दोनों ने विभिन्न माध्यमों से अपने विचार प्रकट किए हैं, अलग-अलग साहित्य लिखा है, धर्म पर लिखा है, राजनीति पर लिखा है ⃓ लेकिन सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उनका चिंतन अलग प्रकार का है एक में थोड़ी रिजिडिटी है तो दुसरे में लचीलापन है ⃓ दोनों का अलग अलग धर्म भी इसमें एक प्रमुख भूमिका अदा करता है । आपके अनुसार दोनों के सामाजिक चिंतन की अलग-अलग क्या विशेषताएं हैं ?

*अजय तिवारी* : सार रूप में सामाजिक चिंतन के बारे में अभी मैंने बताया कि समाज के दो पक्ष होते हैं समाज का मतलब है मनुष्य और उसके संबंध ⃓ मानव संबंध के दो पक्ष हैं एक मनुष्य अपने जीवन निर्वाह के लिए कुछ प्रयत्न करता है उनमें संबंधों में बंधता है और दूसरा मनुष्य साथ रहता है तो बहुत से व्यक्तिगत संबंधों में बंधता है ⃓ दोनों संबंध एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं जैसे खेती-बाड़ी वाले समाज में संयुक्त परिवार पैदा होते हैं लेकिन जब आधुनिक समाज आता है और आदमी बहुत जगहों से एक केंद्र में इकठ्ठा होना शुरू करता है तो संयुक्त परिवार टूटते हैं और तब संबंधों की धारणा पहले जैसी नहीं रहती है ⃓ बड़े शहरों में भाई और बहन साथ रहते हैं तो किराया देते हैं मकान का ⃓ तो यह बदला हुआ संबंध है ⃓ पहले के संबंधों में इसकी कल्पना आप नहीं कर सकते थे ⃓ दोनों के चिंतन में बहुत आधुनिक समाज के मानव संबंधों की कल्पना नहीं है जिन संबंधों पर उनका ध्यान केंद्रित है वे संबंध जाति बिरादरी के और आर्थिक संबंध हैं ।

*प्रस्तुति: शरद कोकास*

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