14 अप्रेल  2019 
भीमराव रामजी आंबेडकर ने अध्ययन के साथ सैकड़ों पुस्तकों की रचना की। उन्होंने एमए, पीएचडी, डीएससी, एलएलडी, डीलिट, बार-एट-लॉ की डिग्रिओं के साथ अपने लेखन कार्य को 22 खंडों व कई भाषणों में व अन्य विधाओं में संग्रहित किया है। उनका उद्देश्य हर वक्त लोगों के लिए नई ज्ञान की बातों की खोज से जुड़ा हुआ था। उनके ये प्रयास हमें ज्ञान के नई ऊंचाईयों की ओर ले जाता हैं। जाति का विनाश पुस्तक के बाद यह उनकी दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसमें डॉ. आम्बेडकर ने हिन्दुओं के मुक्ति के रास्ते सुझाए। मनुस्मृति जलाने के बाद सबसे ज्यादा उनका विरोध उनकी चर्चित पुस्तक ‘हिन्दू धर्म संबंधित पहेलियों’ के लिया किया गया।
मैं उन्हें पुरूष के अग्रभाग से उत्पन्न होने वाला तो नहीं कहूंगा लेकिन यह कहूंगा कि उनकी यह जटिल अध्ययन व विद्या उन्हें ऊंचाइयां दी। पहेलियां उनके द्वारा हिन्दू धर्मग्रंथों का गहनतम अध्ययन हैं। महाराष्ट्र सरकार ने इन ग्रंथों को 1987 में अविकल प्रकाशन किया हैं। पुस्तक में हिन्दू धर्म की पहेलियों में वे कहते है कि यह कहना कठिन हैं, कि हिंदू क्यों है? वे लिखते है, यहां पारसी, ईसाई, मुसलमान व हिंदू रहते है। मान्यताओं व सिद्धांतों के अत्यंत उलझे हुए संग्रह का नाम हिन्दू धर्म है। ब्राह्मणों ने किसी भी प्रकार के संदेह के लिए कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी। उन्होंने एक अत्यंत शरारतपूर्ण सिंद्धांत का प्रतिपादन किया है। उस सिद्धांत का उन्होंने सर्व सामान्य लोगों में प्रचार कर दिया है। वह सिद्धांत है वेदों के निभ्र्रांत होने का।

यदि हिंदुओं की बुद्धि को ताला नहीं लग गया है और यदि हिंदू सभ्यता और संस्कृति एक सड़ा हुआ तालाब नहीं बन गई है, और यदि भारत वर्ष को प्रगति करनी है तो इस सिद्धांत को जड़ मूल से उखाडऩा चाहिए। वेद बेकार की चार पुस्तकें मात्र हैं। न उन्हें पवित्र मानने की आवश्यकता है और न ही निभ्र्रांत। ब्राह्मणों ने वेदों को पवित्रता और निभ्र्रांतता प्रदान की है। क्योंकि पुरूष सूक्त नाम के एक बाद में डाले गए प्रक्षिप्त अंश ने उन्हें पृथ्वी का स्वामी बना दिया है। किसी में भी इतना साहस नहीं कि पूछे कि इन निकम्मी किताबों को, जिनमें अपने शत्रुओं को नष्ट करने के लिए देवताओं का आह्वान किया गया है, उनकी संपत्ति को लूटकर अपने लोगों में बांट देने के लिए कहा गया है, पवित्र और निभ्र्रांत क्यों बनाया गया है? इसलिए समय आ गया है जब उन मूर्खतापूर्ण मान्यताओं से, जिनका ब्राह्मणों ने प्रचार किया है हिंदू मस्तिष्क को मुक्त किया जाय। यदि मुक्ति प्राप्त नहीं हुई तो भारत का कोई भविष्य नहीं।

इस पुस्तक की दूसरी पहेली से नौंवी पहेली तक सभी पहेलियां वेद संबंधी है। वेदों के बारे में शास्त्रीय मत में लिखा है पुरूष नाम के एक मनगढंत जीव ने एक मनगढंत यज्ञ किया था। और इसी यज्ञ ने ऋग(अग्रि), यजु(वायु) व साम(सूर्य) नाम के तीनों वेदों को जन्म दिया। वेद के बारे में पढ़े लिखे ही नहीं प्रत्येक विद्वान की यह मान्यता है कि वे प्राचीन भारतीय समाज का अत्यंत ईमानदारी से किया गया सामाजिक चरित्र-चित्रण है। इसी दृष्टि से उनका अध्ययन उपस्थित किया है। अब यदि किसी की मान्यता हो वे मनुष्यकृत नहीं है, वे ईश्वरकृत हैं अथवा वे ईश्वरकृत भी नहीं है, क्योंकि वे कृत नहीं है, वे केवल श्रृत है तो इन स्थापनाओं को उपस्थित करना या सिद्ध करना उनका काम है, जिनकी वे स्थापनाएं है। उन्होंने उन सभी स्थापनाओं की शास्त्रोक्त विधि से शास्त्रीय चर्चा की है, स्वयं वेदों के उद्धरण दिए है, ब्राह्मण ग्रंथों के उद्धरण दिए है, उपनिषदों के उद्धरण दिए है, स्मृतियों के उद्धरण दिए हैं और पुराणों के उद्धरण दिए हैं।
उन्होंने अपने ग्रंथ में तत्संबंधी पहेलियों का संग्रह कर न जाने कितने विद्यार्थियों का ध्यान अपने प्राचीन वाड्.मय की ओर आकर्षित किया है। अन्यथा आजकल प्राचीन वाड्.मय को पढ़ता ही कौन है? अच्छे-अच्छे पढ़े लिखे लोग न चारों वेदों का नाम ले सकते हैं न त्रिपिटिक के तीनों पिटकों का और न आगमों के ग्रंथों का। प्रोफेसर म्यूर कहते है-इन रचनाओं का सारा रंग ढंग और भीतरी गवाही के अनुसार उनकी जो परिस्थिति है उससे यही मत प्रकट होता है कि वे सभी वेद उन लोगों की व्यक्तिगत आशाओं व आकांक्षाओं को प्रकट करने वाले गीतों के अतिरिक्त कुछ नहीं। …पापों को क्षमा कर देने की और स्वर्ग की खुशियों की। सबसे बदनाम मत चार्वाकों का है-यदि तुम कहते हो कि यदि किसी स्वर्ग में कोई सुखी जीवन नहीं है, तो ज्ञानी लोग इतना धन व्यय करके अतिग्रहोत्र और दूसरे यज्ञ क्यों करते है? तुम्हारी आपत्ति एक विरोधी प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं की जा सकती, क्योंकि वे अग्रिहोत्र आदि केवल जीविका के साधन हैं। जहां तक वेदों की बात है, वे असत्य से दूषित है, आत्म खंडन से दूषित हैं और पुनरूक्ति दोष से युक्त है। फिर अपने आपको जो लोग वैदिक पंडित कहते हैं, वे परस्पर के खंडन-मंडन में लगे रहते हैं।
ज्ञानकांडी लोग कर्मकांड को नहीं मानते, कर्मकांडी लोग ज्ञानकांड को नहीं मानते। तीनों वेद गुलामों के अंड-बंड चारण गीतों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। पूर्व मीमांसा के 28 वें व 32 वें सूत्र को स्पष्ट करते हुए जैमिनी कहता है, इस पर भी आपत्ति उठाई गई है कि वेद नित्य नहीं हो सकते। क्योंकि हम देखते हैं कि जो पैदा होने वाले और मरने वाले व्यक्ति हैं, जो स्वयं नित्य नहीं है, उनमें उनकी चर्चा है। अब वेदों में लिखा है कि बबर प्रवाहिनी ने इच्छा की या कुसुरविंद उद्दालकों ने इच्छा की। अब क्योंकि वेद के ये वाक्य उन लोगों के जन्म से पहले नहीं लिखे जा सकते, जिनकी इनमें चर्चा हुई है, इससे सिद्ध होता है कि ये वाक्य सादि हैं अर्थात इनका कभी न कभी आरंभ हुआ है। क्योंकि वे नित्य नहीं है, इसलिए उनका मानव-रचित होना सिद्ध है। 32 वें सूत्र में अंड-बंड वाक्य में लिखा है ‘कंबल ओढ़े और चप्पल पहने एक बूढ़ा बैल द्वार पर खड़ा है और आशीर्वाद दे रहा है।
सन्तानोतपत्ति की इच्छुक एक ब्राह्मणी कह रही है-‘राजन! कृपया बताएं कि नए चंद्रमा के दिन मैथुन धर्म सेवन करने से क्या होता है?’ जहां तक नैतिकता की बात है, ऋग्वेद में कुछ भी प्रेरणाप्रद नहीं है। यम और यमी की बातचीत दी जा रही है, जो भाई-बहन थे। यमी कहती है-क्या वह कोई भाई है जो अपनी बहन का पति नहीं बन सकता? जहां तक अथर्ववेद का मीमांसा है उसमें जंतर-मंतर, टोने-टोटके भरे पड़े है। तंत्रों के रचयिताओं का कहना है कि वेद, शास्त्र और पुराण एक सामान्य स्त्री के समान है और तंत्र एक उच्च कुलोत्पनन महिला के समान। ब्राह्मण जिन वेदों को धर्मग्रंथ मानते थे, उन्हीं वेदों स्मृतियों, पुराणों तथा तंत्रों से भी नीचे धकेल दिया। दसवीं से बारहवीं पहेली देवी-देवताओं संबंधी है। ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों ही उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय के प्रतीक माने जाते है। इनके बातों से इनमें एक सामंजस्य नजर आता है, साथ ही इनके बीच का द्वंद्व भी दिखता है।
भागवत पुराण में लिखा है ब्रह्मा ने अपने पुत्री से ही कुकर्म किया था। इतनी नीचता के साथ ब्रह्मा पर आक्रमण के बाद शिव और विष्णु में विरोध को लेकर पुराण भरे पड़े है। शैव लोगों का कहना है कि गंगा शिव जी की जटाओं से निकली है। यवन दार्शनिक जैनो फेन का मत है कि एक से अधिक देवताओं का होना या बहुदेववाद एक असंभव बात है। जहां समाज की रचना नाना प्रकार के वर्गों से हुई वहां अनेक देववाद ही स्वभाविक तथा अनिवार्य है। क्योंकि प्रत्येक समाज के अंतर्गत न केवल उस वर्ग के आदिमियों की गिनती होती थी, बल्कि साथ साथ उस वर्ग से संबंधित देवताओं की भी गिनती होती थी। हिन्दुओं में बहुत से देवताओं का होना समझ में आता हैं क्योंकि हिंदू समाज ऐसी बहुत सी नस्लों, ऐसे बहुत से वर्गों का समूह है, उन सभी के अपने अपने देवता रहे हैं।
निचोड़ यह कि हिंदू देवता आपस में इतने निम्र स्तर पर संघर्ष करते रहे है कि वैसी उठा-पटक सामान्यतया मरणशील मानवों के लिए भी लज्जाजनक है। सरस्वती, लक्ष्मी व पार्वती एक ही देवी के भिन्न भिन्न रूप है। सरस्वती ब्रह्मा की पत्नी, लक्ष्मी विष्णु की पत्नी थी और पार्वती शिव की पत्नी और ये तीनों देवता तो आपस में लड़ते-झगड़ते ही रहे। पार्वती व दुर्गा प्रधान देवी है। पार्वती शिव की पत्नी है। दुर्गा कृष्ण की बहन और शिव की पत्नी। लिंग पुराण में काली और है, दुर्गा और है। वैदिक वाड्.मय असुरों के विरूद्ध लड़े गए युद्धों के वर्णनों से भरा पड़ा है। ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार जितने भी युद्ध लड़े गए युद्धों के वर्णनों से भरा पड़ा है। सारे युद्ध वैदिक देवताओं द्वारा ही लड़े गए। वैदिक देवियों ने इन संग्रामों में कभी भी भाग नहीं लिया।
जबकि पौराणिक देवियों के युग में केवल देवियां ही लड़ाइयां लड़ती रही। राक्षसों का राजा महिश एक बार युद्ध में देवताओं को हरा सका। उसने उन देवताओं की ऐसी दुर्दशा कर दी कि वे समस्त पृथ्वी पर घूम घूम कर दर दर भीख मांगने लगे। इंद्र पहले उन्हें ब्रह्मा के पास लेकर गया और तब शिव के पास। लेकिन क्योंकि वे दोनों दूसरे देवताओं को कुछ भी सहायता न कर सके, तो वे विष्णु के पास पहुंचे। महामाया दुर्गा ने उन देवताओं का त्राण किया। इस तरह के डरपोक देवताओं के पास कुछ भी सामथ्र्य आ ही कहां से सकती थी? जब उन्हीं के पास नहीं थी, तो अपनी पत्नियों को ही वे कहां से दे सकते थे? यह कहना कि देवियों की पूजा इसलिए करनी चाहिए क्योंकि वे शक्तिशालिनी हैं एक पहेली ही नहीं है बल्कि एक बेसिर पैर का कथन है। तेरह से चौदहवें पहेली में हमारे धार्मिक संघर्षों में जो अहिंसा और हिंसा की अजीब खिचड़ी पकी है, इन पहेलियों के माध्यम से उसकी जानकारी हम तक डॉ. आम्बेडकर ने पहुंचाई है। आर्य और बाद के हिंदुओं में काफी अंतर है।
आर्यजन जुंआरियों की जाति थी। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग व कलियुग। वास्तव में ये उन अक्षों के नाम थे, जिनका आर्यजन जुए में प्रयोग किया करते थे। भाग्यवान पांसा कृत कहलाता था, जो सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण होता था, वह कलि कहलाता था। नल राजा ने अपना राज्य बाजी पर लगा दिया था। पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी को बाजी पर लगा दिया था। आर्यों में लैंगिक सदाचार अत्यंत ढीला ढाला था। भाइयों ने बहनों के साथ, पुत्रों ने माताओं के साथ, पिता ने पुत्री के साथ और दादा ने पोती के साथ संसर्ग किया। पांडु ने कुंती को दूसरे से संतानोत्पत्ति के लिए कहा। आर्यजन सोम यज्ञ किया करते थे। सोमरस का उपयोग ब्राह्मणों, क्षत्रिय व वैश्यों के लिए था। शुद्र सुरा पान करते थे। महाभारत के उद्योग पर्व में लिखा है-मधु से निर्मित शराब को पिए हुए अर्जुन और श्री कृष्ण एक स्वर्णिम सिंहासन पर विराजमान थे। उनके बदन सुवासित थे, वे हार पहने हुए थे। उनके वस्त्र और गहने शानदार थे। उनके सिंहासन में हीरे जड़े थे।
मैंने देखा कि श्री कृष्ण के पांव अर्जुन की गोद में है और अर्जुन के पांव द्रौपदी तथा सत्यभामा की गोद में। आजकल के हिंदुओं के पूर्वज प्राचीन आर्य न केवल मांसाहारी थे, बल्कि गोमांसाहारी भी थे। यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण, आचार्य, वर या खाविंद, राजा, गुरूकुल का स्नातक व मेजबान का कोई अपना प्रिय व्यक्ति को मधुपर्क दिया जाता था। जिसमें आदमी के हाथ में मधु डाला जाता है। जिसमें मांस अनिवार्य था। मातृक भेद तंत्र में शिव अपनी पत्नी पार्वती को कहते है- इस नशीली शराब के बिना पिए सत्यज्ञान प्राप्त हो ही नहीं सकता।पीना और मांस खाना आरंभ करने के बाद ब्राह्मणों को पशु बलि का प्रचार करने के लिए पुराण लिखने की जरूरत आन पड़ी। कहा गया है कि बलि देने से ही राजकुमारों को परमानंद, स्वर्ग व शस्त्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। बारहसिंगे का मांस देवी को पांच सौ वर्षों तक प्रसन्न चित्त बनाए रखता है। रोहित मछली की बलि काली को तीन सौ वर्षों तक प्रसन्न रखती है।
नर बलि एक लाख वर्ष तक देवी को प्रसन्न रखती है। ब्राह्मण, चंाडाल, राजकुमार, राजकुमार की संतान, ब्राह्मण या क्षत्रिय की संतति निस्संतान भाई, किसी पिता, किसी विद्वान, किसी अनिच्छुक का बलि नहीं देना चाहिए। यदि कहीं शेर, चीते या आदमी की बलि चढ़ाना अनिवार्य ही हो तो मक्खा आदि पदार्थों से स्थानापन्न बना लेना चाहिए। राजेंद्र लाल मित्र का कहना है-‘यह बात सर्वविदित है कि बहुत समय तक नर बलि की प्रथा सारे हिंदुस्तान में प्रचलित थी।’ और ऐसे लोगों की कमी नहीं जो यह विश्वास करते हैं कि अब भी भारत के किसी नुक्कड़ में, किसी न किसी कोने में, देवी को प्रसन्न करने के लिए नर बलि दी जाती है।शिवजी पशु बलि को स्वीकार नहीं करते। पहले हिंसक से अहिंसक बनकर ब्राह्मणों ने एक हिंसक देवता को अहिंसक देवता बना दिया।
शिव के एक अहिंसा देवता बन चुकने के बहुत समय बाद काली पूजा की संस्कृति अस्तित्व में आई। पहेली पंद्रह से सत्रह में आंबेडकर वर्ण धर्म और आश्रम धर्म पर दृष्टिकोण रखते हैं। प्रत्येक हिन्दू की यह मूलभूत धारणा है कि हिन्दुओं की समाज व्यवस्था ईश्वरीय रचना है। यह समाज चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शुद्र में विभक्त है। ब्राह्मण सर्वोपरि व शुद्र सबसे नीचे। ब्राह्मण का धंधा है ज्ञानार्जन करना व दूसरों को सिखाना-पढ़ाना। क्षत्रियों का धंधा है युद्ध करना।वैश्य का व्यापार करना व शुद्रों का अपने ऊपर के तीनों वर्णों की कमीनों की तरह सेवा सुश्रूषा करना। ऋग्वेद के पुरूष सूक्त में कहा गया है कि जब देवताओं ने पुरूष विभाजन किया तो ब्राह्मण उसके मुंह थे। क्षत्रियों को हाथ बनाया गया, वैश्य नाम का प्राणी उसकी जांघे बनी पांव में से शूद्र उत्पन्न हुआ। सामवेद ने पुरूष सूक्त का समावेश नहीं किया।
यजुर्वेद की दो शाखाए शुक्त व कृष्ण। कृष्ण यजुर्वेद की तीन शाखाएं कथक, मैत्रीयानी व तैतिरीय संहिता। शुक्ल यजुर्वेद की एक ही शाखा है, जो वाजसनेयी कहलाती है। तैतिरीय संहिता में मत है कि वह काम वासना से उत्तेजित हो उठा। उसी से राजन्य की उत्पत्ति हुई। ऋग्वेद व यजुर्वेद में किसी भी प्रकार का तालमेल नहीं है। जहां तक स्मृतियों का सवाल है ऋग्वेद मनु का समर्थन करता है लेकिन मनु का मत मौलिक नहीं है। वह तो केवल ऋग्वेद का तोता रटंत है।रामायण का कहना है कि दक्ष की पुत्री व कश्यप की पत्नी मनु ने चारों वर्णों को जन्म दिया। समाज को बांटने के लिए जिस प्रकार वर्ण धर्म एक सांगठिक सिद्धांत के रूप में उभर कर आती है, ठीक वैसे ही आश्रम धर्म एक व्यक्ति के जीवन को नियमबद्ध करती है। आश्रम धर्म व्यक्ति के जीवन को चार अवस्थाओं में विभाजित करती है।
ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ व संन्यास। धर्म शास्त्रों के मत से यह बात स्पष्ट है कि एक समय था कि जब वैवाहिक जीवन व्यतीत करना एक ऐच्छिक विषय था। एक संन्यासी पर यह प्रतिबंध लगा रहता है कि वह शास्त्रों की व्याख्या नहीं कर सकता। एक वानप्रस्थ पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगा रहता। उल्टे एक ब्रह्मचारी यदि वह संन्यासी बनना चाहता है तो उसे पहले वानप्रस्थ बनना चाहिए। यदि वह वानप्रस्थ बनना चाहता है, तो उसे गृहास्थाश्रम में प्रवेश पाना चाहिए। अर्थात अनिवार्य तौर पर शादी करनी चाहिए। मनु ने शादी से छुट्टी पा सकना असंभव ठहरा दिया।मनु ने सारी जातियों को पांच समूहों में विभक्त किया आर्य, अनार्य, व्रात्य, पतित व संकर। दस्यु को अनार्य कहा।
चातुवर्ण के विरोधियों को व्रात्य बताया गया। 18 व्रात्य जातियां गिनाई गई। 5 ब्राह्मण, 7 क्षत्रिय 6 वैश्य व्रात्य है। 11 पतित जातियां है जिनमें पौंडरक, चोल, द्रविड़, काम्भोज, यवन, शक, परद, पहलव, चीन किरात व दरद। जिनके माता-पिता एक ही जातियों के नहीं रहे वे संकर कहलाए। यूनानी राजदूत मैगस्थनीज का कहना है कि ‘अंबष्ट पंजाब में रहने वाली जातियों में से एक थे जिन्होंने सिकंदर के पंजाब पर हमला करने पर उसका मुकाबला किया।’ आम्बेडकर ने पहेली अट्ठारह में पितृत्व से मातृत्व की ओर तथा कलिवज्र्य में लिखा गया कि हिंदू कानून आठ प्रकार के शादी विवाहों को मान्यता देता है ब्राह्म, देव, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गंधर्व, राक्षस व पैशाच। एक शूद्र न एक ब्राह्मण बन सकता था न क्षत्रिय और न वैश्य, लेकिन यदि शूद्र स्त्री की शादी वैश्य से हो गई तो उसका पुत्र वैश्य बन सकता था।
आम्बेडकर मन्वन्तर क्या? में राजनीतिक व्यवस्था में वे भारतीय संविधान के शिल्पी के रूप में दिखाई पड़ते है, वे इस बहाने प्रजातंत्रात्मक समाज के बारीकियों को रखा है। वे हिन्दुओं को दार्शनिक चिंतन ब्रह्मवाद की ओर आगे बढ़ते हुए देखते है। वे कहते ब्रह्मवाद का सार यह है कि विश्व वास्तविक है और विश्व के पीछे भी वास्तविकता है वही ब्रह्म है।
ब्राह्मणों ने इसे अपना दर्शन कहा लेकिन यह प्रश्र कभी नहीं पूछा कि ब्राह्मण व शुद्र में, आदमी व औरत में, जाति के आदमी व जाति बहिष्कृत आदमी में जो भेद किए जाते है, वे उनका समर्थन कैसे कर सकते है? आम्बेडकर ने किसी की भी व्यक्तिगत आलोचना नहीं की। चाहे उपनिषद के ऋषि हो, चाहे स्मृतियों के मुनि हों और चाहे अर्वाचीन युग के आचार्य हो, सभी के ऐसे ही विचारों की टीका की हैं, जिन का समाज के हिताहित से संबंध रहा हैं।
कलियुग अनंत क्यों में आम्बेडकर स्पष्ट करते हैं कि चारों वेदों के नाम कोई हिंदू जाने या न जाने चारों युगों के नाम अवश्य जानता है। और यह मानता है कि सतयुग में धर्म अपने चारों पांवों पर टिका हुआ था। डॉ. शाम शास्त्री ने कहा है कि अनैतिकता की सर्वाधिक घृणित घटनाएं कृत युग में घटी। उन घटनाओं से कुछ कम बुरी त्रेता युग में और उनसे भी और अधिक कम बुरी द्वापर में व सबसे कम बुरी या सबसे अच्छी कलियुग है।हिंदू धर्म के दो बड़े पात्र राम व कृष्ण के संबंध में डॉ. आम्बेडकर ने व्यापक टीका किया है। राम के जन्म को लेकर यह कथा गढ़ी गई कि उनका जन्म ऋषि श्रृंग द्वारा दिए गए एक पिंड से हुआ था यह सच्चाई को ढंकने का एक रूपक मात्र था। उनका जन्म कौशलया व ऋषि श्रृंग के संपर्क से हुआ था। पेड़ की आड़ में छिपकर बालि का वध राम के भाई लक्ष्मण द्वारा शूर्पनखा के नाक काटना, दो-दो बार अग्रि परीक्षा के बाद सीता को त्याग देने वाले राम को वे आराध्य देव नहीं मानते थे।
तपस्या कर रहे शम्बूक का धड़ इसलिए गला से अलग कर दिया कि वह शूद्र था। उसी तरह कृष्ण कौरव-पांडव के समकालीन हुए ही नहीं। कृष्ण पांडवों का मित्र था। जिनका अपना साम्राज्य था।कृष्ण कंस का शत्रु था। कंस का भी अपना साम्राज्य था। यह संभव नहीं मालूम देता कि एक ही समय में ऐसे दो साम्राज्य एक दूसरे के पास-पास रहे हों। पूतना नाम की स्त्री को कृष्ण ने बचपन में ही मारा। स्नान कर रही गोपियों के कपड़े उठा ले जाने वाला और उन्हें नग्नावस्था में ही बाहर आने के लिए मजबूर करने वाला कृष्ण को वे अपना भगवान नहीं मानते। आम्बेडकर कहते हैं रूक्मणी का त्याग कर राधा के साथ रमण करने वाला कृष्ण हमारा कृष्ण कैसे हो सकता है? कृष्ण का यह कहना कि शादी, विवाह में, प्रेम प्रसंग में, जीवन पर खतरा आ जाने पर जब आदमी की सारी की सारी संपत्ति नष्ट होने जा रही हो और जब किसी ब्राह्मण के स्वार्थ को हानि पहुंचने जा रही हो, ऐसे पांच अवसरों पर झूठ बोलना पाप नहीं है। कहां तक न्यायसंगत है।
कृष्ण व यदुवंशियों का विनाश भी बड़ा हास्यास्पद है।
ऋषियों ने कृष्ण के बेटे के नाभि के नीचे लोहे का मूसल बांध दिया था। मूसल का चूर्ण सरकंडों का रूप लेकर पूरे यदुवंशियों को खत्म कर दिया था।जब कृष्ण छायादार वृक्ष के नीचे बैठे, उसकी शाखाओं ने उनके शरीर को ढंक लिया था। एक शिकारी ने गलती से हिरन समझ कर उन पर तीर चला दिया और कृष्ण स्वर्ग लोक सिधार गए। इसके साथ अर्जुन कुछ थोड़े से अवशिष्ट लोगों के साथ हस्तिनापुर जा पहुंचा। अर्जुन के विदा होने पर समुद्र ने द्वारका को निगल लिया। अब यादवों के यश, उनके घरेलू झगड़ों और उनके मनमौजी जीवन की कहानी सुनने के लिए कुछ भी अवशेष नहीं बचा। इन महत्वपूर्ण पुस्तक में पहेलियों के रूप में डॉ. आम्बेडकर कहते है, जिसे हम ब्राह्मणी देववाद कह सकते हैं उसके द्वारा जो विश्वास प्रतिपादित किए जाते है, यह पुस्तक उन मतों का पर्दाफाश करते है।
यह सर्वसामान्य हिंदुओं के लिए लिखी गई है ताकि वह जाग जाएं और देखे कि ब्राह्मणों ने उन्हें किस गोरखधंधे में फंसा रखा है। इस महान पुस्तक में दिखाने का प्रयास हुआ है कि हिंदुओं का सर्वसाधारण समाज है, वह इस बात को हृदयंगम कर ले कि हिंदू सनातन नहीं है। जो अपने आप को बौद्ध समझते हैं उन्हें इस पुस्तक को अवश्य पढऩी चाहिए। शायद उनके मन में नव बौद्ध समाज को लेकर भ्रांतियां थी इसलिए उन्होंने कहा था। बौद्ध धम्म में धर्मान्तर के लिए त्रिशरण-पंचशील के साथ 22 प्रतिज्ञाओं का पठन और व्यवहार अतिआवश्यक है।

उत्तम कुमार ,संपादक ,दक्षिण कोसल 
abhibilkulabhi007@gmail.com
dakshinkosal.mmagzine@gmail.com