डॉ आम्बेडकर : एक बहुआयामी व्यक्तित्व : प्रोफेसर हेमलता महिश्वर 

13.04.5019

हिंदी विभाग,
जामिया मिल्लिया इस्लामिया
नई दिल्ली.

“डॉ अम्बेडकर सिर्फ दलितों के थोड़े ही हैं, वे तो हम सबके हैं। मैं भी उनके जयंती समारोह में जो राशि इकट्ठा की जा रही है, उसमें सहयोग देना चाहूँगा।” मेरे साथी डॉ विवेक दुबे ने यह कहा तो मुझे यकीन करने में थोड़ा समय लगा। हालाँकि यह कुछ पलों का ही मसला था पर मुझे जैसे उससे निकलने में समय लगा। और प्रत्यक्षत: मैंने जवाब दिया-“क्यों नहीं, बिल्कुल स्वागत है।” डॉ विवेक दुबे ने आगे बात बढ़ाते हुए कहा-” मैं जाति व्यवस्था के एकदम ख़िलाफ़ हूँ। इसे ख़त्म होना ही चाहिए। यह एकदम अमानवीय है। और डॉ अम्बेडकर ने इस देश के मानव मात्र के लिये जो कुछ किया है, वह प्रत्येक भारतीय के लिए है। वे सिर्फ दलितों के कैसे हो सकते हैं?”

मैं भावुक हो उठी। मारे ख़ुशी के मुझे रोना आ रहा था। ख़ुशी सँभाली नहीं जा रही थी। मुझे याद आया लातूर, महाराष्ट्र के डॉ सूर्य नारायण रणसुभे ने भी कहा था कि डॉ अम्बेडकर को महाराष्ट्र में महामानव कहा जाता है। कुछ छ:-सात साल पहले महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में साथ चलते-चलते उन्होंने भी यही बात कही थी कि डॉ अम्बेडकर दलितों के ही नहीं, समूची मानवता के प्रतीक हैं, इसलिए महामानव हैं।

ऐसा क्या है डॉ अम्बेडकर में कि वे न केवल भारतीयों को अपितु विश्व जन को भी महत्वपूर्ण लग रहे हैं। न केवल महत्वपूर्ण बल्कि इतने महत्वपूर्ण कि विश्व में ज्ञान का प्रतीक घोषित किए गए और कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनकी मूर्ति की स्थापना की गई। मराठी में तो जाने कितनी ही रचनाएँ उनके नाम पर हुईं। स्वतंत्रता आंदोलन कालखंड के वे ऐसे महानायक हैं कि उन पर केंद्रित जितना साहित्य लिखा गया, वह किसी और राजनेता के लिए नहीं लिखा गया। उनकी जीवन पर आधारित जीवनी, नाटक तो लिखे ही गए और कविताएँ, हज़ारों कविताएँ उन पर लिखी गईं। भारत की हर भाषा में डॉ अम्बेडकर पर गीत गाए जा रहे हैं। मराठी में तो लोरियाँ तक बाबा साहेब पर लिखी गई हैं। इन लारियों में माएँ अपने बच्चों से बाबा साहेब के संघर्षों को बताती हुईं, उनके जैसे आदर्श को अपनाने के लिए कहती हैं। वे जीवन-काल को नहीं, जीवन को बड़ा करने का संदेश देती हैं। लोक-गायकों ने तो बाबा साहेब को अपने गीतों का केंद्र बना रखा है। अण्णा भाऊ साठे से लेकर आज संभाजी भगत तक, सारे लोग अपने गीतों में बाबा साहेब को केंद्र में रखे हुए हैं। मराठी से प्रेरणा लेकर आज हिंदी, हरियाणवी, पंजाबी, गुजराती, राजस्थानी, तेलुगू, तमिल, कन्नड़, मलयालम, कोंकणी, भोजपुरी, मैथिली, बांगला, ओड़िया आदि सारी भाषाओं में पारम्परिक ही नहीं, वर्तमान संगीत धारा में भी भीम-गीतों की अजस्र धारा प्रवाहित हो रही है।

बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर विश्व के ज्ञान-पटल पर ही नहीं लोक मन पर भी अपनी स्पष्ट छाप छोड़ चुके हैं। ऐसा क्यों?

जब हम ऐसा क्यों? प्रश्न की तलाश में निकलते हैं तो पता चलता है कि बाबा साहेब ने अपने चिंतन में हर एक उस प्रश्न का समाधान देने का प्रयास किया है जिससे मानवता की अस्मिता खंडित होती है। अस्मिता का तार-तार होना बाबा साहेब भली भाँति अनुभव कर चुके थे। उन्होंने ऐसी जाति में जन्म लिया था, जो अस्पृश्य कहलाती थी। ज्ञान की चरमावस्था को छू लेने के बावजूद जातिगत अपमान के नश्तर उन्हें चुभाए जाते थे। एक ऐसी पीड़ा उनके हिस्से आई थी, जिसके लिए वे स्वयं ज़िम्मेदार नहीं थे। किसी भी बच्चे को कब, कहॉं, कैसे जन्म लेना है, यह बच्चे पर निर्भर नहीं करता। बच्चा अपना लिंग, अपने माता-पिता, अपना जन्म स्थान, अपना वर्ग, अपना धर्म, अपनी जाति तय करके जन्म नहीं लेता। बच्चा जब जन्म ले लेता है तब उसका धर्म, जाति, स्थान, वर्ग आदि उसके मॉं-बाप अपना सामाजिक स्थिति के साथ बताते हैं। और इसी श्रुति के साथ वह बड़ा होता है।

डॉ भीमराव अम्बेडकर के पिता का नाम रामजी सकपाल और माता का नाम भीमा बाई था। ये रत्नागिरी के मंड़नगढ़ से पॉंच मील दूर आंबवडे गाँव कि निवासी थे। डॉ आम्बेडकर के दादा मालोजी सकपाल फ़ौजी सिपाही थे। उनके पिता राम जी सकपाल भी सेना में भर्ती हो गए और ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के नियमानुसार फ़ौजी छावनी के स्कूल में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। उनकी लगन और कर्तव्यपरायणता से प्रभावित एक अंग्रेज़ अधिकारी ने उनका प्रवेश पूना के पंतोजी स्कूल में करवा दिया। वहॉं सफलता अर्जितकर रामजी सकपाल अध्यापक हुए और फिर फ़ौजी छावनी स्कूल के प्रधान अध्यापक बने। इस सेवा से खुश होकर अंग्रेज़ों की सेना में सुबेदार – मेजर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। वे बालक भीवा के अध्ययन को लेकर बहुत अनुशासित थे। भीवा के माध्यमिक स्कूल के एक अध्यापक आंबेडकर गुरुजी ने भीवा के कुलनाम आंबावडेकर को ध्यान में रखते हुए उनका उपनाम आंबेडकर कर दिया और स्कूल के अभिलेख में दर्ज कर दिया। यही बालक आगे चलकर डॉ भीमराव आम्बेडकर के नाम से मशहूर हुआ और लोक मानस में बाबा साहेब के नाम से।

भीमराव ने अस्पृश्यता अपने शालेय जीवन से महसूस करना आरंभ कर दिया था। अध्ययन कक्ष में दरवाज़े के बाहर बैठकर पढ़ाई करना, श्यामपट्ट पर गुरूजी द्वार लिखा गया कुछ भी न दिखाई देना, पानी पीने के लिए अँजुरी बनाकर खड़े रहना उन्हें पीड़ा देता था। एक बार किसी सवाल का हल कोई बच्चा नहीं कर पा रहा था तो बालक भीमराव ने उसे हल करने के लिए अपना हाथ उठाया। गुरुजी के बुलाने पर वह श्यामपट्ट के पास जैसे ही पहुँचने लगा, सारे बच्चों ने श्यामपट्ट के पास रखे अपने-अपने खाने के डिब्बे उठा लिए ताकि छूत न हो जाए। बालक भीमराव ने बहुत अपमान महसूस किया। यह अपमान नहीं नहीं रुका। वे जब विदेश से शिक्षा प्राप्तकर जब बड़ौदा नरेश के पास नौकरी करने पहुँचे तो चपरासी कोई भी नस्ती उन्हें दरवाज़े से ही फेंककर देता। छुआछूत के डर से अपनी पहचान छुपाकर एक पारसी के यहॉं रहने लगे। जब लोगों को यह पता चला तो उस पारसी ने आधी रात को उनसे कमरा ख़ाली करवाया। बाबा साहेब एक पेड़ के नीचे बैठकर फफक-फफककर रो पड़े। उन्होंने संकल्प लिया कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था को वे तोड़कर ही रहेंगे।

उन्होंने इस दिशा में अपना चिंतन मनन आरंभ किया। अपने अध्ययन के दौरान भारत की विभिन्न अवस्थाओं पर वे लिख ही रहे थे। भारतीय समाज की विडम्बना को देखते हुए उन्होंने दलित समाज में अस्तित्व बोध के लिए नारा दिया -‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।’ उन्होंने इस कार्य के प्रचार-प्रसार के लिए एक पाक्षिक ‘मूकनायक’ आरंभ किया। इसके पहले ही अंक में उन्होंने लिखा -“हिंदुस्तान एक ऐसा देश है, जो विषमता का मायका है। हिंदू समाज एक मीनार है और एक-एक जाति एक-एक मंज़िल। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि मीनार की कोई सीढ़ी नहीं है। एक मंज़िल से दूसरी मंज़िल जाने के लिए कोई मार्ग नहीं है। जिस मंज़िल पर जो पैदा हो, वह उसी मंज़िल पर मरे। तल मंज़िल का व्यक्ति, चाहे कितना भी लायक क्यों न हो,उसे ऊपर की मंज़िल पर प्रवेश नहीं मिलता और ऊपर की मंज़िल पर पैदा हुए व्यक्ति को, चाहे वह कितना भी नालायक क्यों न हो, नीचे ढकेलने की किसी की हिम्मत नहीं होती।” डॉ आम्बेडकर के यह साफ समझ में आ गया था कि भारत की सामाजिक व्यवस्था जो संस्कृति के नाम पर जिस धार्मिक बेड़ियों से संचालित होती है वह किस-किस को अपना सहज शिकार बनाए हुए है। शुद्रों और स्त्रियों को अध्ययन से विमुख करने का मनुस्मृति के तहत किया गया षडयंत्र समाज के विकास को अवरुद्ध ही करेगा। इसलिए शिक्षा का विस्तार उनकी पहली चिंता रही।

डॉ आम्बेडकर स्वयं एक ज़हीन विद्यार्थी थे। उन्होंने भरसक विश्व साहित्य का अध्ययन किया था। उन्होंने अपने तीन गुरुओं से शिक्षा ली थी और विकास का मार्ग चिन्हित किया था। यह भी सोचने वाली बीत है कि जिस व्यक्ति को सारी दुनिया के दर्शन, राजनीति, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि आदि का ज्ञान था, उसे उसके सारे गुरु भारत में ही मिले। उनके गुरु थे- गौतम बुद्ध, सामाजिक क्रांति के कवि कबीर और उन्नीसवीं सदी के क्रांतिपुंज जोतिबा फुले। इन तीनों ने ही अपने समय के कर्मकांडों से सीधा लोहा लिया था।

डॉ आम्बेडर जिन समस्याओं से रूबरू हो रहे थे, वे समस्याएँ पूर्णत: हिंदू समाज की समस्याएँ थीं। उनका हल कोई विदेशी विद्वान कैसे दे सकता था, जो भारत को गहराई से जानता ही न हो। इसलिए अपनी समस्याओं के समाधान के लिए जो सूत्र बाबा साहेब डॉ भीमराव आम्बेडकर को जिनसे मिले, वे भारत मूल में पैदा हुए विद्वान चिंतक थे। बुद्ध के आर्य सत्य से लेकर सम्यक मार्ग, अनित्यता का सिद्धांत, प्रतीत्य समुत्पाद का सिद्धांत, थेर और थेरियों को विहार में स्थान, राजपरिवार की स्त्री हो या चांडाल कन्या या वेश्या, सभी समान भाव से भिक्षुणी बन सकीं- समता का यह सिद्धांत बाबा साहेब ने उठाया। कबीर के समय तक इन सबके साथ संप्रदाय भी शामिल हो गया। कबीर की सीधी साफ बानी और मनुष्यता की पहचान और पेशवाकालीन जोतिबा फुले के योगदान अछूत के प्रति संवेदना, शिक्षण क्रांति और स्त्रियों के सम्मान को डॉ आम्बेडकर ने चिन्हित किया। डॉ आम्बेडकर का सारा चिंतन अपना खाद-पानी इन्हीं तीनों से ग्रहण करता है।


अस्पृश्यों को मानवाधिकार दिलाने के लिए पूना पैक्ट का संघर्ष कोई नहीं भूल सकता। दलितों के द्वैत मताधिकार के ख़िलाफ़ महात्मा गांधी अनशन पर बैठ गए। गांधी जी हरिजन के साथ सहभोज तो कर सकते थे पर पैतृक व्यवसाय और वर्ण व्यवस्था के ख़िलाफ़ नहीं। गांधी जी के साथ समझौता करते हुए बाबा साहेब बहुत दुखी हुए थे।

डॉ आम्बेडकर स्त्री शिक्षा के प्रबल पैरोकार थे। उनकी यह स्थापना थी कि किसी भी समाज की प्रगति का पैमाना उस समाज की स्त्रियों की स्थिति पर निर्भर करता है। यदि समाज में स्त्री चिंतनशील है तो समाज सर्वांगीण विकास करेगा। इसलिए वे स्त्री शिक्षा को महत्व देते थे। पर भारतीय समाज में आज भी किसी स्त्री का बुद्धिमान होना सारहीन है। यह समाज स्त्री के गुण पर नहीं, चरित्र पर बात करता हुआ, स्त्री की बुद्धिमत्ता पर मठा डालने का कुत्सित प्रयास करता है। सामान्य स्त्रियॉं चिंतन की ओर उन्मुख नहीं होती हैं। चिंतन से स्त्रियों को दूर रखने का षडयंत्र तमाम धर्म परम्पराएँ करती हैं। वे स्त्री से ‘कोरी आज्ञाकारिता’ की अपेक्षा रखती हैं और स्त्रियॉं भी अनजाने में परम्परा का पालन करती हैं। इसलिए बाबा साहेब ने हिंदू कोड बिल लिखा। यह भी जानना कम आश्चर्यजनक नहीं है कि डॉ आम्बेडकर को हिंदू कोड बिल पर कितना विरोध झेलना पड़ा। जिस तरह से डॉ आम्बेडकर ने एक स्त्री को सारे अधिकार दिए, उससे पारम्परिक लोगों में विरोध की लहर उठ गई। पैतृक संपत्ति में दिया जाने वाला अधिकार पारम्परिक लोगों के गले में अटक गया था।

डॉ आम्बेडकर ने स्वंतंत्र भारत का संविधान तैयार करने में अपनी सारी शक्ति लगा दी। संविधान की प्रस्तावना ही संविधान का मूल सार है। जब वे लिखते हैं-हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार,अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में 26 नवम्बर 1949 ईश्वी को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत,अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं’ तो वे भारत में रहनेवाले प्रत्येक नागरिक का घोषणा पत्र तैयार कर देते हैं कि भारत को भारत बनाने के लिए किन अधिकारों और कर्तव्यों की आवश्यकता होगी।

भारत का नागरिक होने की अपनी शर्तें होंगी। अब कोई भी किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग का हो, वह अप्रभावी होगा और समता, बंधुता, स्वतंत्रता की रक्षा होगी। हर किसी को अपनी परिस्थिति के अनुसार सरकार से अपने कल्याण के लिए बेहतर परिस्थिति और अनुकूल वातावरण के निर्माण की मॉंग करने का अधिकार होगा। जातीय और संप्रदाय के दंभ के लिए कोई जगह नहीं होगी।

आजकल कोई भी किसी भी तरह की असहमति होने पर पाकिस्तान जाने की सलाह देने लगा है- यह संकुचित सोच के लोग कर रहे हैं। इसलिए डॉ आम्बेडकर ने बुद्धिजीवी की स्पष्ट पहचान की है। वे लिखते हैं -बुद्धिजीवी वर्ग वह है, जो दूरदर्शी होता है, सलाह दे सकता है और नेतृत्व प्रदान कर सकता है। किसी भी देश की अधिकांश जनता विचारशील एवं क्रियाशील जीवन व्यतीत नहीं करती। ऐसे लोग प्राय: बुद्धिजीवी वर्ग का अनुकरण और अनुगमन करते हैं। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि किसी देश का संपूर्ण भविष्य उसके बुद्धिजीवी वर्ग पर निर्भर होता है। यदि बुद्धिजीवी वर्ग ईमानदार, स्वतंत्र, और निष्पक्ष है तो उस पर यह भरोसा किया जा सकता है कि संकट की घड़ी में वह पहल करेगा और उचित नेतृत्व प्रदान करेगा। यह ठीक है कि प्रज्ञा अपने आप में कोई गुण नहीं है। यह केवल साधन है और साधन का प्रयोग उस लक्ष्य पर निर्भर है, जिसे एक बुद्धिमान व्यक्ति प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। बुद्धिमान व्यक्ति भला हो सकता है, लेकिन साथ ही वह दुष्ट भी हो सकता है। उसी प्रकार बुद्धिजीवी वर्ग उच्च विचारों वाले व्यक्तियों का एक दल हो सकता है, जो सहायता करने के लिए तैयार रहता है और पथभ्रष्ट लोगों को सही रास्ते पर लाने के लिए तैयार रहता है।”

बुद्धिजीवी की ऐसी खरी पड़ताल वही कर सकता है जो सम्यक मार्ग का राही हो। यह मार्ग उन्होंने विपुल अध्ययन करके निर्मित किया। वे हमारे सामने अपना लिखित विशाल साहित्य छोड़ गए हैं। इस देश को सचमुच मानवीय बनाने के लिए वे अपने परिवार का भी उचित ध्यान न रख सके। एक एक कर उनकी संतान अकाल काल कवलित होती गई। उनकी पत्नी रमा बाई की मृत्यु पर वे रो उठे क्योंकि वे अपनी पत्नी को कोई सुख नहीं दे सके थे। वे भारत की आनेवाली संतानों की ही चिंता करते रहे। उन्होंने भी शिक्षण संस्थान खोले, छात्रावास बनाए। डॉ आम्बेडकर के स्वतंत्र भारत के निर्माण हेतु किए गए कार्यों की सूची बहुत विस्तृत है। यह अब इंटरनेट पर सहज उपलब्ध है।

अपने जीवन के अंतिम काल में उन्होंने एक ऐतिहासिक कार्य किया था। 14 अक्टूबर 1056 विजयदशमी के दिन उन्होंने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली। उनके द्वारा किया गया यह कार्य आज भी भारतीयों को किसी जाति या धर्म की पहचान से मुक्त कर रहा है। बौद्ध होने के बाद किसी और पहचान की कोई आवश्यकता का नहीं होना, नए भारत का निर्माण है। इसलिए डॉ विवेक दुबे जैसे प्रज्ञावान जब कहते हैं कि डॉ आम्बेडकर हम सबके हैं तो यह सहज ही विश्वास होता है कि ‘प्रज्ञा, शील, करूणा’ से संपृक्त भारत बन रहा है, जिसका सपना भारत रत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव आम्बेडकर ने देखा था।

 


प्रो हेमलता महिश्वर
हिंदी विभाग,
जामिया मिल्लिया इस्लामिया
नई दिल्ली

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