चर्चित कथाकार कृष्ण बिहारी का कहानी संग्रह,  ” ब-बॉय  “. मूल्यों के द्वंद्व की कहानियां.  :  अजय चंन्द्रवंशी.

 12..04.2019 

कहानी अपने यथार्थवादी चित्रण की संभावना और क्षमता के लिए चर्चित रही है.कथाकार को इसमे अपने इच्छित ‘कथ्य’ को समग्रता से व्यक्त करने का बेहतर अवसर प्राप्त होता है. यों कहानी भी यथार्थ का पुनः सृजन है और इसमे भी कल्पना का समावेश होता है,फिर भी कथाकार को अपने परिवेश को चित्रित करने का अधिक स्पेस मिलता है.देशकाल-परिस्थिति के अनुसार कहानी में बदलाव होता रहा है.कथाकार के अनुभव क्षेत्र, सम्वेदना और दृष्टि के अनुसार भी कहानी का कथ्य और मिज़ाज़ तय होता है.

चर्चित कथाकार कृष्ण बिहारी का कहानी संग्रह ‘ब-बॉय’ इस दृष्टि से उनके अनुभव क्षेत्र के आसपास के परिवेश को लिए हुए है.संग्रह में आठ कहानी है.जिसमे से चार का परिवेश सऊदी अरब है; ‘पूरी हकीकत पूरा फसाना’ भी विदेश में घटित कहानी है.तीन कहानियों का परिवेश अपने देश का है.
कथाकार के पास अप्रवासी जीवन के अनुभव हैं;जो उसके कहानियों में स्वतः प्रकट हो रहे हैं. अधिकांश कहानियों के कथावाचक या पात्र अरब में नौकरी कर रहे हैं; चूंकि अरब अपने प्राकृतिक सम्पदा ‘तेल’ के कारण सम्पन्न है, दुनियाभर के लोग वहां बेहतर आय के लिए आकर्षित होते हैं. इनमे मजदूर से लेकर इंजीनियर तक हर प्रकार के लोग हैं. सब के सपने अलग-अलग होते हैं.

निम्न मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग के लोग अधिकतर अपने पारिवारिक जीवन के आर्थिक समस्याओं से मुक्ति के सपने लेकर वहां जााते हैंं, तो सम्पन्न वर्ग अत्याधुनिक जीवन के चकाचौन्ध से प्रभावित होकर.कथाकार की दृष्टि दोनों वर्गों पर जाती है.

‘नातूर’ का बादशाह खान मजदूर वर्ग का व्यक्ति है, जो अपने साथ अपने वर्ग का जीवन मूल्य भी साथ ले गया है. लेकिन उसके मूल्य बाजार के ‘मूल्य’ के विपरीत पड़ते हैं, इसलिए उसके ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा के महत्व के ‘भ्रम’ को टूटना ही था. ‘मकड़जाल’ का कथानायक भी मध्यमवर्गीय परिवार का का ‘बड़ा’ बेेटा है.संयुक्त परिवार के दायित्वों को निभाते-निभाते वह मकड़जाल में फंस गया है; उसकी जैसे अपनी कोई जिंदगी नही रह गई है.वह सब की अपेक्षाओं को पूरा करने वाला ‘मशीन’ हो गया है.विदेश में नौकरी करना मानो खजाना मिल जाना हो गया है.वह सबके जायज-नाजायज मांग को पूरा करते -करते जैसे खुद से विस्मृत हो गया है.यह संग्रह की सशक्त कहानी है.

‘इंतज़ार’ संग्रह की महत्वपूर्ण कहानी है.इसमे एक स्त्री के त्रासद जीवन,जो लगातर संंघर्ष करते हुुुए भी जीवन के सुुुख प्राप्त नही कर पाती, सार्थक ढंग सेे व्यक्त हुआ है. ‘चाची’अपने पति के जीवन को संवारने के लिए हर प्रयत्न करती है,बेवजह मार तक खाती है;लेकिन सब व्यर्थ. ‘चाचा’ छोड़कर कर चले जाते हैं. बच्चों के लालन-पालन के लिए संघर्ष, वहां भी लगभग उपेक्षा, फिर बच्चों का असामयिक निधन,कुल मिलाकर उनकी जिंदगी में दुख ही दिखाई देती है.कथाकार ने उनके पति (चाचा) का चरित्र ऐसे गढ़ा है कि उसकी ‘उदासीनता’ असहज नही लगती.अपने आप मे खोये, आत्मविश्वास की कमी, जीवन से लगभग उदासीन, कहानी में उनके जन्मजात ‘कमी’ लगती है. मगर इससे ‘चाची’ के जीवन की क्षति का जिम्मेदार फिर किसे कहे? यह ग्रामीण पारिवारिक जीवन की ‘मर्याया’ या ‘संस्कार’ ही है कि चाची इसे नियति मान लेती है, और उनके जीवन मे सुख का फ़क़त इंतज़ार ही रह जााता है.जरूर कुछ दुर्घटनाएं भी घटित होती हैं, जिस पर आदमी का बस नही होता, लेकिन स्नेह, सामीप्य इंसान की जरूरत है,जो सत्तर साल की चाची में जिंदा है.

‘पूरी हकीकत पूरा फसाना’ में देेेशभक्ति और ‘हिंदी सेवा’ के नाम पर किये जा रहे पाखण्ड पर अच्छा व्यंग्य हैै. ‘देेेश के प्रतिनिधि’, देेेश के नाम पर पाखण्ड रचने वााले ‘साहब बहादुर’ को ‘कथानायक’ अंत मे सही जवाब देता है.

‘ब-बॉय’, ‘आंसुओं में लड़की’, ‘दो औरतें’, ‘संगात जायते कामः’मुख्यतः स्त्री पात्र को लेकर लिखी गई कहानियां हैं. ये स्त्रियां आधुनिक शहरों में रहने वाली,शिक्षित, अमूमन स्वतंत्रचेता की हैं. सभी युवा हैं, सपने हैं, पारिवारिक जीवन भी है.कथाकार का इनके ‘शारीरिक सौंदर्य’ पर विशेष ध्यान जाता है.यों कुछ कहानी की मांग भी है, जैसे ‘दो औरतें’ में दोनों कॉलगर्ल हैं. अन्य पात्र भी युवा हैं,फिर कथाकार का ध्येेेय ‘काम कुंठा’ मुक्त दिखाना भी प्रतीत हो रहा है.मगर एक सीमा के बाद कथावाचक जैसे इसमे ‘रस’ लेने लगता हैै. ‘संगात जायते कामः’ की सुदक्षिणा आत्मसम्मान से भरी हुई है .वह जिससे प्रेम करती है उसका इंतज़ार करती है,मगर वहां से ‘असफल’ होने पर ‘कथानायक’ के सााथ, उसको सहयोग करते, उससे सहयोग लेेते, काफी समय गुजारती है.स्ववाभाविक है दोनों के मध्य शारीरिक और मानसिक आकर्षण पैदा होता है;यहां तक कि प्रेम में बदल जााता है.लेकिन ‘कथानायक’ एक बार प्रेम मेंं असफल हो चुुका है और उसके छाया से मुक्त नही हो पाता. उसके इस स्वीकार बोध के बाद भी कि ‘लंंगड़ी नैतिकता उसकी लाचारी नही है’ वह नैतिकता के द्वंद्व से मुक्त नही हो पाता.इस मामले में सुदक्षिणा उससे सशक्त नज़र आती है.

‘ब-बॉय’ और ‘आँसुओ में लड़की’ के कथानक कुछ खास प्रभाव नही छोड़तें.कामकाजी ‘जवान’ लड़कियां हैं; उनकी समस्याएं हैं; कथावाचक सहयोग करता है,लड़कियां उससे प्रेम करने लगती हैं. ‘ब-बॉय’ में तो यह इतनी जल्दी होता है कि पाठक आश्चर्य में पड़ जाता है. ‘आँसुओ में लड़की’ में बॉस से ‘प्रेम’ धीरे-धीरे होता हैै.यहां कथानक का थोड़ा आधार है, साथ उठते-बैैैठते स्त्री-पुरुष में प्रेम पनप सकता है, खासकर सामने वाला जब दूसरे की भावनाओं का कद्र करे. ‘दो औरतें’ में दो कॉलगर्ल हैं, दोनों का स्वभाव भिन्न है.एक आधुनिक बिना किसी मजबूरी के अपनी इच्छा से देेेह का व्यापार करती है.वह ‘ग्राहक’ को लूूटती नही.दूसरी लगभग अनपढ़, अधिक उम्र की,चौकन्नी,असुरक्षाबोध से ग्रसित,व्यावहार भी ‘रूढ़’ मगर काम मेे ईमानदारी.दोनों के प्रेमी भी हैं. पहले का किशोर वय का ‘मासूम’ जो एकनिष्ठ प्रेम करता है;प्रेमिका की हकीकत जानकर भी.दूसरी का पति है,जो उस पर आश्रित लग रहा है; बच्चें हैं, उनकी पढ़ाई का खर्च, घर का किराया, यह मजबूर सी लगती है. कारण नही बताया गया है.सम्भव है मजदूरी की अपर्ययाप्तता उसे इस ‘आसान’ काम की तरफ खींच लिया हो.दोनों की ‘हकीकत’ जानकर कथावाचक असहज हो जाता है.कहानी जिस ‘नैतिक मूल्य’ को तोड़ती दिखती है, कथावाचक उसी ‘नैतिक मूल्य’ द्वंद्व से मुक्त नही हो पाता.

इन कहानियों में कथाकार समाज के बदलते मूल्यों, खासकर स्त्री सम्बन्धी, देह की शुचिता-अशुचिता, स्त्री के आत्मनिर्णय को रेखांकित करते हैं. आज स्त्री-पुरुष का सानिध्य असहज या छुपाने की चीज नही रह गया है,कोई किसी से मजबूरी में संबंंध नही रखता या दूसरे से ‘अतिरिक्त’ अपेक्षा नही रखता, सब अपना हित-अहित समझतेे हैैं, जो सही है.लेकिन यह सब सहज ढंग से कहानी में आना चाहिए.इस संग्रह में ऐसा हुआ भी है;मगर हमारी समझ मे कुुुछ जगह यह स्वभाविक नही हो पाया है.

 

 

#अजय चन्द्रवंशी
कवर्धा (छ. ग.)
मो. 9893728320

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