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सुजोय मंडल , एक्स कोबरा जवान 

12.04.2019

नितिन सिन्हा 

कोलकाता / आमतौर पर हर व्यक्ति के जीवन काल मे कुछ अच्छी-बुरी ऐसी घटनाएं घटती है,जिसकी कसक उसे ता-उम्र बनी रहती है। वह इन घटनाओं को चाह कर भी भुला नही पाता है। ऐसी ही एक घटना को याद करते हुए पूर्व कोबरा कमांडो सुजोय मंडल आज भी सिहर उठते हैं। वे तब सुकमा चिन्तागु कैम्प में पदस्थापित थे।

9 अप्रैल 2014 के दिन छत्तीसगढ़ के दुर्दांत नक्सल हिंसा से प्रभावित सुकमा जिले के चिंतागुफा crpf 206 bn कैम्प में उनके सांथ घटी घटना का जिक्र करते हुए कहते है कि देश में पांच साल बाद फिर से लोकसभा चुनाव का दौर आ गया है। यह दुखद है कि तब से लेकर अब तक के हालातों में कोई बदलाव नही आया। जबकि प्रदेश की तत्कालीन नव निर्वाचित भाजपा(रमन) सरकार मिशन 2016 तक नक्सल क्लीन स्वीप अभियान के प्रचार-प्रसार में लगी हुई थी। जिसकी कागजी रूप-रेखा तो आप सबको दिखती रही होगी,परन्तु हकीकत में यहाँ कुछ नया नही हो रहा था। इधर सामान्य दिन की तरह 9 अप्रैल 2014 के दिन भी कुछ आज जैसा ही माहौल था। देश के बाकी हिस्सों में लोकसभा चुनांव को लेकर भले ही उत्साह बना रहा होगा परन्तु बस्तर के सुकमा जिले में चुनांव की तारीखें हमेसा से जानलेवा परिणाम ले कर आती रहीं हैं। विशेष कर नक्सल हिंसा के विरुद्ध तैनात सुरक्षा बल के जवानों के लिए यह समय काफी तनाव भरा होता है।

सामान्य काल मे भी अधिकांश बड़े माओवादी हमले मार्च महीने से जून के बीच ही किये गए है।इस समय मे इस क्षेत्र में चुनांव करवाना सुरक्षा बलों के लिए दोहरी बड़ी चुनौती हो जाती है। फिर भी एक जवान अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिहाज से अपने जान की परवाह किये बगैर ऐसी किसी चुनौतियों से पीछे नही हटता है। उसे भली भांति पता होता है,इस जिम्मेदारी के निर्वहन में हो सकता है उसकी जान भी चली जायेगी। परन्तु वह निर्भय हो कर अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित भाव से अपनी जिम्दारियों को निभाता है। इस दौरान उसके मार्ग में आने वाली तमाम बाधाएं भी उसे भले ही न तोड़े परन्तु महीनों अपने घर-परिवार से दूर कैम्प में उसके अपने ही अधिकारियों के द्वारा किये गए रूखे,भेदभाव पूर्ण व्यवहार से वह पूरी तरह टूट जाता है। 

सुजॉय मंडल के बताए अनुसार आज 9 अप्रैल 2014 के दिन सुकमा जिले के चिंतागुफा crpf 206 bn में सब कुछ सामान्य चल रहा था। तभी उन्हें आर्डर मिला कि चुनांव पार्टी को अंदर गांव बुर्कापाल एक पोलिंग बूथ में छोड़ कर आना है। सारी आवश्यक तैयारियों के बाद वे लोग 96 की संख्या में पोलिंग पार्टी के सांथ निकल पड़े। हम जब पोलिंग टीम को सुरिक्षत जगह पर छोड़कर वापस आने लगे तो कम्पनी डी सी रमेश सिंह ने उसी रास्ते पर चलने को कहा जिस पर हम आये थे। *ऐसा करना पेट्रोलिंग फोर्स खास कर कोबरा के बनाये नियमों की अनदेखी या बड़ी भूल थी* हमने सी ओ महेश कुमार को टोका भी कि जिस रास्ते से हम आये है उस पर वापस जाना कतई ठीक नही है। उसने मेरी बात को नकारते हुए कहा एक सिपाही सी ओ को सिखाएगा कि उसे किस रास्ते से जाना और किससे वापस आना है।

कोबरा कमांडो सुजोय कहते है कि उन्हें पता था कि उनकी टीम में नए और कम अनुभवी जवान भी शामिल है,उन्हें कोबरा की बेशिक ट्रेनिग भी नही मिली है। वहीं आनन-फानन आर्डर मिलने पर कुछ बीमार जवानों को भी सी ओ ने इस अभियान में अपने सांथ जबरदस्ती ले लिया था। उन्हें पूर्वानुमान हो गया था कि सी ओ का लिया हुआ यह निर्णय आत्मघाती होने वाला है। पोलिंग पार्टी को छोड़कर वापस आने के दौरान पहाड़ी से नीचे उतर रही 206 एलीट कोबरा टीम तीन भागो में बंट गई। सामने आ रही हमारी टीम ने नक्सली हरकत को ताड़ लिया उन्होंने डी सी को बताया परन्तु उसने आगे बढ़ने को कहा । तब तक करीब 200 की संख्या में एंबुश लगाए भारी हथियारों से लैश माओवादियों ने एकाएक हमला कर दिया। हमने तमाम विपरीत परिस्थियों के होते हुए भी माओवादियों का डटकर मुकाबला किया,यद्यपि उनकी संख्या हमसे कहीं अधिक थी और वे सुरक्षित जगहों से भारी गोली बारी कर रहे थे। हम जब तक सम्हल पाते तब तक बड़ा नुकसान हो चुका था। हमारे 3 साथी शहीद हो गए थे और मेरे सहित पांच जवान घायल हो गए थे। तब भी हम मोर्चे से नक्सलियों पर जवाबी हमले कर रहे थे। मैंने अपने सांथ रखे यूबीजीएल से आठ फायर किये जिसमे से 5 गोले फ़टे और 3 बेअसर रहे। फिर भी जितने गोले फ़टे उसकी चपेट में आये कुछ नक्सली मारे भी गए खुद कोबरा कमांडो सुजॉय मंडल ने जवाबी हमले में कई माओवादियों को गोली लगने के बाद गिरते हुए देखा।

अंततः नक्सली बैकफुट पर आए और वापस भागने लगे। लेकिन उनके प्रारम्भिक हमले में ही हमारी क्षति बड़ी हो चुकी थी। जिसका सीधे तौर पर जिम्मेदार डी सी रमेश कुमार सिंह था।जो खुद भी कमांडों ट्रेंनिग नही हुआ था। फिर भी बल के नेतृत्व करने की जिम्मेदारी उसे क्यों दो गई यह समझ से बाहर था। हमारे तीन शहीद हुए साथियों में कोबरा कमांडो चंद्रकांत घोष जो कि मेरा मौसेरा भाई था व अन्य दो साथी नरसिम्हा व रणबीर शामिल थे।घटना स्थल पर उनकी नाहक सहादत ने मुझे तोड़ दिया था।

ब्रस्ट फायरिंग की वजह से मुझे गहरी चोट लगी थी तब भी मैं मोर्चा सम्हाले हुए सी ओ और अन्य जीवित साथियों से फायरिंग बन्द होने के बाद घटना स्थल की तलाशी के लिए बोल रहा था। मुझे यकीन था अगर री-इंफोर्स में आये साथी सर्च करते तो पांच से सात माओवादियों के शव और उनके छोड़े गए हथियार बल को मिल जाते। लेकिन ऐसा किया नही गया। माओवादियों के पहली फायरिंग में ही बल में शामिल नए अप्रशिक्षित जवान इधर उधर भागने लगे। खुद सी ओ और डी सी के होश उड़ गए थे। डी सी रमेश को भी नक्सलियों की गोली छू कर निकल गई थी। यद्यपि पीछे भटक गए हमारी टीम की तरफ़ से जवाबी कार्रवाही सही समय पर नही की गई।

हमारे सांथ प्रथम पंक्ति में चल रहे कमांडो चंद्रकांत व साथी सीधे नक्सलियों के निशाने पर आ गए। शहीद चन्द्रकांत पिछले दो दिनों से बीमार था वह आपरेशन में जाने योग्य नही था फिर भी सी ओ ने जबरदस्ती उसे अपने सांथ ले लिया.

कैम्प पहुंचते ही मैंने सी ओ की गलतियां बताई,फिर शुरू हुआ मेरे सांथ अमानवीय अत्याचार का दौर.

आगे घटना का विस्तार से खुलासा करते हुए सुजॉय बताते है कि फोर्स में अधिकांस तानाशाह व्यवहार के अधिकारी किसी जल्लाद से कम नही होते है। उनका व्यवहार अपने ही जवानों के प्रति इतना रूखा और निर्दयी होता है कि उसका वर्णन नही किया जा सकता है। मेरे बुरी तरह से घायल होने के बाद भी जब मैंने डी सी रमेश सिंह के विरुद्ध सही बात को बोला तो हमारी कम्पनी के बड़े अधिकारी घटना में बरती गई लापरवाही में उसके प्रत्यक्ष दोष को नजर अंदाज करते हुए। उल्टे मेरे ही खिलाफ कार्यवाही प्रारंभ कर दी। मुझे न केवल महीनों उचित इलाज से वंचित रखा गया। बल्कि यातना के तौर पर 206 के दूसरे कैम्पों में भेजते रहे। लम्बे समय बाद मुझे छुट्टी पर छोड़ा गया। इस तरह दो साल बीत गए अब मैं अपने ही खर्च ओर अपना इलाज करवाता रहा।

इस क्रम में 2014 में ही मतगणना के बाद अच्छे दिन का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री चुने गए। मुझे लगा आज नही तो कल मेरे भी अच्छे दिन आएंगे। परन्तु धीरे-धीरे उम्मीद टूटती गई। अंततः 2 साल की प्रतीक्षा और यातनाओं के बाद मैं सुजॉय मंडल मीडिया के माध्यम से देशवासियों के सामने सच बोलने का फैसला किया।इसकी कीमत मुझे पहले निलंबन और अंततः सी आर पी एफ 206 से मुझे हमेसा के लिये हटा दिया गया।

आज भी मैं सिस्टम से लड़ रहा हूँ,निश्चित तौर यहां तंत्र पूरी तरह से सड़ चुका। आप कल्पना कीजिये 9 अप्रैल 2014 के मुठभेड़ के लिए कथित तौर पर उस कायर और लापरवाह अधिकारी का नाम तब मुठभेड़ में झूठी बहादुरी के लिए गैलेंट्री अवार्ड के लिए भेजा गया। जिसकी इतनी बड़ी गलती से हमारे 3 जवान शहीद हुए और मुठभेड़ में मेरे घायल होने के बाद दिखाई गई वीरता को सिरे से नजर अंदाज कर दिया गया। .

बस्तर और दूसरे नक्सल प्रभाव वाले कैम्पों में 5 साल बीत जाने के बाद भी हालात जस के तस बनी हुए है,न तो नई रणनीति बनाई गई न ही जवानों को संसाधन दिए गए*

 

..आज भले ही देश मे पांच साल बाद फिर से लोकसभा चुनाव का दौर आ गया है। पर बस्तर सहित देश के दूसरे आतंक एवं नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हालात जस के तस बने हुए है। चुनांव के पहले दौर में ही कांकेर में 4 bsf जवानों की हत्या और धमतरी में सी आर पी एफ टीम पर हमला इस बात का प्रमाण है। जबकी 9 अप्रैल 2014 की घटना के बाद 11 अप्रैल 2015 पोलमपल्ली हमले में 7 जवान शहीद हुए इसके बाद 15 सी आर पी एफ जवानों की सहादत, 31 मार्च 2016 मैलवाड़ा फिर 11 मई 2017 बुर्कापाल में 25 जवानों की नक्सल हत्या ने सिद्ध किया कि न तो सरकार कुछ करने वाली है न ही जिम्मेदारी अधिकारियों को जो ऐसी घटनाओं के सीधे तौर पर जिम्मेदार रहते है,उन्हें कभी जांच के दायरे में लाया जाएगा।

मतलब  साफ है कि सरकार किसी भी पार्टी की हो या प्रधानमंत्री पद में मोदी जी हो या कोई भी हो हम जवानों के अच्छे दिन कभी नही आने वाले हैं। सांथ ही बस्तर के तमाम बड़े नक्सल हमले की घटनाओं का अवलोकन करें तो पाएंगे कि अधिकांश घटनाओं के लिए अधिकारियों के द्वारा नियमों को अंदेखियाँ लापरवाही और गलत नीति ही दोषी रही है। फिर भी उन पर कार्रवाही की जगह प्रमोशन(पद लाभ) दिया गया। वही नक्सल मोर्चों में जवानों को आवश्यक संसाधनों के लिए आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है। ।

 

मैं सुजोय मंडल बोल रहा हूँ …

हालांकि 9 अप्रैल 2014 की घटना को बीते आज पूरे पांच साल हो गए,परन्तु उन्हें लगता है जैसे पूरी घटना बीते कल की बात हो.यद्यपि घटना के बाद उन्हें मिल रही विभागीय प्रताड़ना और मानसिक शोषण के बीच शारीरिक परेशानी को लेकर सर्वप्रथम “द-हिन्दू” फिर हरिभूमि व इसके बाद cnn ibn ने समाचार प्रकाशित किये। फिर उन्हें सेवा मुक्ति की सजा दे दी गई। इस बीच सुजोय मंडल की आवाज *मैं सुजोय बोल रहा हूँ देश के अधिकांस प्रमुख न्यूज चैनलों और अखबारों में गूंजने लगी। जिसमे वो अपनी आप बीती बता रहे हैं कि *कैसे सीआरपीएफ के जवान अफसरों की लापरवाहियों का शिकार हुए थे*

सुजोय के मुताबिक उनके सीनियर डिप्टी कमांडर रमेश कुमार सिंह ने ऑपरेशन के सामान्य नियम कायदों तक की अनदेखी की, पूरी यूनिट की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया। परिणाम यह हुआ कि 3 कमांडो घटना स्थल पर ही शहीद हो गए और पांच एमी घायल हुए। 200 की संख्या में हमलावर नक्सली शहीद नरसिम्हा और चन्द्रकांत घोष का हथियार लूटने में भी सफल रहे थे।

मगर सुजॉय अपने अंदर की आवाज दबा नही पा रहे थे। उनके मुताबिक अफसरों ने जवानों के सुझाव को क्यों अनुसना किया.? जिसकी वजह से नक्सलियों के हमले में उनकी यूनिट के निर्दोष जवान मारे गए। सुजॉय तब छुट्टी पर अपने घर मुर्शिदाबाद आये हुए थे । वो इस मामले में खुशकिस्मत थे,लेकिन उनके सांथ शहीद तीन जवान ऐसे थे, जिन्हें घर जाने का मौका ही नहीं मिला। सुजॉय आज भी चाहते हैं कि उनके शहीद साथियों की शहादत किसी कीमत पर बेकार ना जाए।

 

इसी फैसले की वजह से उन्होंने तब अफसरों का कच्चा चिट्ठा खोला था। ।। सुजोय आज भी प्रयास कर रहे है कि इस घटना के माध्यम से फोर्स में चल रही गड़बड़ियों को देश के सामने रखा का जाए । ताकि अधिकारियों की गलती और लापरवाही की कीमत भविष्य में जवानों को न चुकानी पड़े। जो जवान बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हुए है,उन्हें भी उचित सम्मान मिले। वो अपने शहीद साथी जवानों के सम्मान की लड़ाई तब तक लड़ेंगे जब तक वो सफल न हो जाये ।

उनकी व्यक्तिगत लड़ाई उच्च न्यायालय कोलकाता में पृथक रूप से चल रही है। सुजॉय ने 9 अप्रैल 2014 की घटना में जो छत्तीसगढ़ के चिंतागुफा इलाके में हुई थी,एक नक्सली हमले में अपने तीन साथियों को खोया था। इस नक्सली हमले के दौरान किस तरह की गड़बड़ियां की गई, उसका उल्लेख आज खुलकर किया जाना इसलिए जरूरी है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। उस दिन सामान्य नियमों की अंदेखियाँ करने की भूल तानाशाह अधिकारी नही करते तो उनके शहीद साथी न केवल सुरक्षित कैम्प आते उल्ट माओवादियों को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ता।

उनकी मानें तो सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट को बिना ट्रेनिंग के ही नक्सल इलाके में तैनात कर दिया गया था । जो जवान हमले के दौरान मौजूद थे उनसे पूछताछ तक नहीं की गई थी। हमले के बाद सही जानकारी देने की प्रक्रिया भी नहीं अपनाई गई। यही नहीं कमांडो पर दबाव बनाया गया कि वो अफसरों की कही बात को ही दूसरों को बताएं.

नक्सली हमले के दौरान जो तीन कमांडो शहीद हुए थे उनमें से एक थे कमांडो चंद्रकांत घोष। चंद्रकांत घोष के साथियों की मानें तो उन्हें नक्सलियों के खिलाफ ड्यूटी में शामिल ही नहीं किया जाना चाहिए था। क्योंकि वो उस वक्त मेडिकली अनफिट थे। चंद्रकांत परिवार में कमाने वाले इकलौते सदस्य थे अब इस दुनिया में नहीं है।

चंद्रकांत का परिवार सीआरपीएफ पर गंभीर आरोप लगा रहा है। लेकिन सुजॉय के मुताबिक जवानों की एक टुकड़ी पहाड़ी से नीचे उतरी जबकि दूसरी पीछे छूट गई थी। उस दौरान दूसरी टुकड़ी पहाड़ी की चोटी पर थी और उन्होंने नक्सली हरकत को ताड़ लिया था। उनके बताए जाने के बाद भी अफसर उन्हें जबरन आगे बढ़ने को कहा। तभी 2 सौ नक्सलियों ने हमला कर दिया था । जिसका परिणाम दुःखद रहा एक तो नाहक उनके साथी शहीद हुए दूसरा जवाबी कार्रवाही में मारे गए नक्सलियों की सर्चिंग नही की गई। अन्यथा घटना स्थल पर 6-7 माओवादियों के शव और उनके छोड़े हथियार मिल गए होते। लेकिन उनके सांथ चल रही टीम में अप्रशिक्षित जवानों की संख्या अधिक होने और अधिकारियों के असंवेदनशील होने के कारण ऐसा हुआ नही। यद्यपि घटना को घटे 5 साल हो चुके है,पर सुजोय मानते है कि आज भी घटना की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की गई तो भी सच सामने आ जाएगा।

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