कविता संग्रह  , अनवर सुहैल  ःः  उम्मीद बाकी है अभी  ःः अजय चंन्द्रवंशी ,कवर्धा  

3.04.2019

अनवर सुहैल जी चर्चित कथाकार हैं। लोक जीवन और खासकर मुस्लिम समाज के लोकजीवन की झलक और द्वंद्व उनकी कहानियों और उपन्यासों में दिखाई देता है। मगर कथाकार के साथ-साथ वे अच्छे कवि भी हैं। कथा के समानांतर वे कविताएं भी लिखते रहे हैं।कहानियों की तरह कविताओं में भी वे समकालीन जीवन और राजनीति के छल-छद्म, आमजन जीवन के संकट और दुखदर्द को अपनी कविताओं में दर्ज करते रहे हैं। चूंकि लेखक का संबंध मुस्लिम समाज से भी है, इसलिए उस पहलू से भी समकालीन राजनीति और समाज मे एक आम मुसलमान के जद्दोजहद, विडम्बना और दुखदर्द को भी अपनी कविताओं में दर्ज करते रहे हैं। प्रस्तुत संग्रह ‘उम्मीद बाकी है अभी’ तो मूलतः इसी संदर्भ में है, हालांकि यहां मजदूर-किसान, दलित, स्त्रियां भी उपस्थित हैं।

भारतीय समाज एक बहुलतावादी समाज है। इतिहास और भूगोल के विभिन्न कारणों से यहां बहुसांस्कृतिक और बहुभाषिक समूह के लोग रहते आये हैं। ये समूह परस्पर अन्तःक्रिया करते हुए एक सामंजस्य पूर्ण जीवन जीते रहे हैं। ऐसा नही कि इनमें कोई द्वंद्व न रहा हो मगर वे मुख्यतः सत्ता के संदर्भ में रहे हैं। भाषा, संस्कृति और धर्म के नाम पर द्वंद्व मुख्यतः पिछली शताब्दी की परिघटना है; उस पर भी हाल के दशकों में तीव्रता आयी है।जाहिर है इसमें सत्ता की अपनी भूमिका रही है।

पिछले कुछ दशकों में साम्राज्यवाद ने अपने हित के लिये ‘धार्मिक समूहों’ का भी उपयोग किया है। ये और बात है कि बाद में यह ‘गठजोड़’ उनके लिए ही घातक साबित हुआ। ईराक, ईरान, तालिबान संकट को इस संदर्भ में देखा जा सकता है। जिसकी चरम परिणीति 9/11 के घटना के रूप में हुई। इस घटना के बाद साम्राज्यवादी स्वार्थ के संघर्ष ने धार्मिक रूप भी लिया। तालिबान के बाद आई. एस. आई. जिसे उग्र इस्लामिक धार्मिक दक्षिणपंथी संगठन अस्त्तित्व में आया जिसने विभिन्न देशों में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया जिसमें खुद इस्लामिक मतावलंबी भी मारे गए।

हमारे देश मे ब्रिटिश साम्राज्यवाद जनित विभाजन और उससे उपजे कश्मीर समस्या ने हिन्दू-मुस्लिम समरसता को थोड़ा प्रभावित किया था; मगर समय के साथ-साथ सौहार्द बढ़ता गया था।लोग अपनी-अपनी दुनिया मे रम गए थे। मगर नब्बे के दशक में पुनः धर्म के नाम पर दक्षिणपंथी राजनीति का उभार हुआ। गोधरा कांड और फिर 26/11 के आतंकवादी हमले ने इसे और हवा दी। इस राजनीति ने बहुसंख्य जनमानस की चेतना को धार्मिकता का सहारा लेकर एक ‘खास’ दिशा में मोड़ने का प्रयास किया; और काफी हद तक सफल रहा।यहां तक की सत्ता में आने में भी सफल रहा। इस राजनीति ने देशभक्ति जो की एक व्यापक अवधारणा है, की संकुचित व्याख्या की और उसे एक खास संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया।जाहिर है ऐसे में भिन्न सांस्कृतिक समूह को उन्होंने ‘अन्य’ कहा।और एक तरह से बहिष्कृत करने का आंदोलन चलाया।

उनके इस ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के अभियान में ; सांस्कृतिक भिन्नता को सहज नही लिया जाता।इससे धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों को शक की दृष्टि से देखा जाता है, और उनकी राष्ट्र के प्रति ‘निष्ठा’ को प्रश्नांकित करने का प्रयास किया जाता है।उनके खान-पान, जीवन शैली को नकारात्मक ढंग से प्रचारित करने का प्रयास किया जाता है। हाल के दिनों में भीड़ द्वारा की गई हिंसा से इसे समझा जा सकता है। इससे इस समूह के आम जीवन जीने वाले व्यक्ति में मन मे भय, शंका, तनाव , परायापन के भाव पैदा हुए हैं। अनवर सुहैल जी के प्रस्तुत काव्य संग्रह की कविताओं में दर्ज मनः स्थिति को इस संदर्भ से समझा जा सकता है।

इन कविताओं में बढ़ते साम्प्रदायिक माहौल में कवि की बेचैनी साफ दिखाई देती हैं। धर्म निजी आस्था न रहकर सार्वजनिक घोषणा होता गया है। ऐसे में जो जहां धार्मिक अल्पसंख्यक हैं, विपरीत मनः स्थिति से गुजर रहे हैं। हर समय व्यंग्य, उलाहना, अभद्रता,अपमान व्यक्ति को हतोत्साहित करते हैं। इतिहास में हुई ‘गलतियों’ के लिए वर्तमान में दोषारोपण का राजीनीतिक निहितार्थ भी है। इतिहास लेखन एक गंभीर और जिम्मेदारी का कार्य है। इसके लिए गहन अध्ययन और शोध की आवश्यकता होती है; तब कहीं जाकर कुछ स्थितियां स्पष्ट होती हैं। वह भी कई बार इतनी धुंधली होती है कि स्पष्ट चित्र नही बनाया जा सकता।उस पर फिर अलग-अलग कोणों से असहमतियां बनी रहती हैं। लेकिन आज इतिहास से ‘खेलने’ की एक प्रवृत्ति उभर कर आयी है, और जगह-जगह बिना पढ़े- लिखे ‘नवइतिहासकार’ पैदा हो रहे हैं; जिनका एकमात्र उद्देश्य अपने ‘एजेंडा’ को लागू करना है।

कवि ने बार- बार इस बात को रेखांकित किया है कि युवाओं में यह प्रवृत्ति तेजी से फैल रही है और वे मेहनत न करके महज ‘प्रतिदिन एक जी.बी. डेटा’ के आकांक्षी हो रहे हैं।यह तात्कालिकता का जीवन समाज और स्वयं उनके भविष्य के लिए चिंतनीय है। जाहिर है ऐसे में ‘शॉर्टकट उपलब्धि’ की चाह पनपती है; और वे जाने-अनजाने भीड़ का हिस्सा होते चले जाते हैं, और बहुत बार असामाजिक और अमानवीय कार्य उनके लिये ‘वीरता’ का प्रतीक बन जाता है। हाल के दिनों में ‘मॉब लीचिंग’ की बढ़ती घटनाओं से इसे समझा जा सकता है।

इन तमाम आशंकाओं, चिंताओं के बावजूद कवि को मानवीयता और समरसता पर विश्वास है। लोग हैं जो चीजों को समझ रहे हैं, भले ही उनकी संख्या कम दिखाई देती हो, मगर वे संगठित होकर समाज को दिशा दे सकते हैं, दे रहे हैं।यह बताने की आवश्यकता नही कि कवि का सर्वधर्म समभाव और गंगा-जमुनी तहज़ीब पर विश्वास है, भले ही उसे खंडित करने के कितने ही प्रयास क्यों न किये जा रहे हों।इस तरह इस संग्रह की कविताएं पाठक को संवेदनशील बनाने के साथ-साथ जागरूक भी करती हैं।


कृति-उम्मीद बाकी है अभी(कविता संग्रह)
कवि- अनवर सुहैल
प्रकाशन-एक्सप्रेस पब्लिकेशन
मूल्य- 140 रुपये

अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा( छ. ग.)
मो. 9893728320

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