1. 2.04.2019
पिछले दिनों इलाहबाद में राजेंद्र कुमार जी के 75 वें वर्ष पर आयोजित कार्यक्रम में इलाहाबाद विवि में उर्दू विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो अली अहमद फातमी जी ने बेहद हल्के रूप में महिला विरोधी टिप्पणी की जिसके बाद.पूरा हाल ठहाको से भर गया. इसी टिप्पणी पर दस्तक़ की संपादक और सामाजिक कार्यकर्ता सीमा आज़ाद ने पूरी संजीदगी से अपना न केवल विरोध प्रगट किया और एक गंभीर आपत्ति अपनी फेसबुक पर पोस्ट कि ,साथ में यह आग्रह भी किया कृपया मेरे इस विरोध को अली अहमद फातमी के विरोधी अपने पक्ष में इस्तेमाल न करें, क्योंकि खुद उनकी मानसिकता भी कमाबेश ऐसी ही है.
दो दिन बाद ही फातमी जी ने फोन करके न केवल माफी मांगी वरन् भविष्य म़े एसा न करने का वायदा भी किया.
वैसे तो इस चर्चा और सही समय पर प्रतिरोध से पटाक्षेप भी हो गया .
इस पर उनकी वाल पर राष्ट्रव्यापी बहस हुई . हमें लगा कि इस बहस को और साहित्यगामी लोग जाने इसलिए सीमा जी से आग्रह किया और परिणामस्वरूप चर्चा के चुने हुये अंश यहाँ प्रस्तुत है.
मैं उस हंसी में शामिल नहीं थी. – सीमा आज़ाद .
आज इलाहाबाद में हम सबके प्यारे राजेन्द्र कुमार जी के 75 वर्ष पार करने का जश्न मनाया गया। वे इतने प्यारे इंसान हैं कि हम सबके पास उन पर कहने के लिए बहुत सारी बातें हैं। लेकिन आज के जश्न में कुछ ऐसी बातें भी कहीं गयीं, जिसकी उम्मीद मैंने नहीं की थी और जो नहीं होनी चाहिए थी। राजेन्द्र कुमार जी की सादगी पर बात रखते हुए इलाहाबाद विवि में उर्दू विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो अली अहमद फातमी ने मज़ा लेते हुए कहा कि राजेन्द्र जी के पास एक ही सदरी है, जिससे वे सालों से काम चला रहे हैं, और तो और वे सालों से एक ही बीबी से काम चला रहे हैं।’’
इस बेहद अभद्र, अश्लील और पितृसत्तात्मक बात पर पूरे हॉल में हंसी के ठहाके फूट पड़े, लोगों ने तालियों से फातमी साब की बात का स्वागत किया। मैं गुस्से से भर उठी। इससे आगे भी वे बिना रूके अपनी अभद्र और महिला विरोधी बातें बोलते रहे और लोग हंसते रहे। उनका यह लिखित भाषण खत्म होने पर लोगों ने वाह-वाह किया और मेरे पीछे बैठी महिला ने कहा कि ‘फातमी साब हमेशा अच्छा बोलते हैं।’ जबकि मेरा मानना है कि वे अपनी बहुत ही खूबसूरत और कलात्मक भाषा में हमेशा महिला विरोधी बात ही बोलते हैं। मुझे लगा कि संचालक साथी और आयोजकों में से कोई उनकी बात पर अपनी टिप्पणी रखेेगा या मंच पर बैठी एक महिला वक्ता इस पर आपत्ति दर्ज करायेंगी, लेकिन इसमें से कुछ भी नहीं हुआ।
मैं बहुत आहत महसूस कर रही थी, पर सोच रही थी कि मेरा बीच में आपत्ति दर्ज कराना कार्यक्रम में अनावश्यक दखल माना जायेगा, इसलिए चुप रही। बाहर खड़े कुछ लोगों से मैंने अपनी बात कहकर आपत्ति दर्ज कराई पर ये पर्याप्त नहीं था। क्योंकि फातमी साब ने ऐसा पहली बार नहीं किया था, वे अक्सर अपने वक्तव्यों में ऐसे महिला विरोधी और फूहड़ किस्म में मजाक करते रहते हैं। वे हमसे काफी सीनियर है करीबी परिचय भी नहीं, इसलिए बहुत खुलकर तो नहीं, पर काफी हल्के से मैंने आपत्ति भी जताई है, मेरे सामने ही और लोगों ने भी जताई है, लेकिन उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वो इसलिए क्योंकि उन्हें सार्वजनिक मंच पर जहां वे ऐसी बातें बोल जाते हैं, किसी ने नहीं टोका। और तो और उन्होंने बताया कि उनका आज का वक्तव्य ‘समकालीन जनमत’ में प्रकाशित होने जा रहा है। यह और भी खीझ और चिन्ता का विषय है।
यह सब सोचते हुए भी चुप रहकर घर आयी तो देखा कि फोन पर एक छात्र का सन्देश था-‘‘ आपको नहीं लगता दीदी कि फातमी सर की बात बहुत पितृसत्तात्मक थी, वह किसी साहित्यकार की भाषा तो थी ही नहीं…..और बाकी साहित्यकार उनकी बात पर ताली पीट रहे थे ठहाके लगा रहे थे……क्या ऐसे ही होते हैं ये लोग?’’
इसे पढ़कर मुझे लगा कि चुप रहकर मैंने गलती की, और मुझे जरूरी लगा कि कम से यहां इस सार्वजनिक मंच से विरोध दर्ज कराकर बता सकूं कि मैं उस ठहाके मंे शामिल नहीं थी। यह विरोध केवल फातमी साब के लिए नहीं है बल्कि उस पूरे माहौल के लिए है, जो महिलाओं को सदरी से ज्यादा कुछ नहीं समझता, जहां महिलाओं का मजाक उड़ाने वाले चुटकुले ग्राह्य होते हैं।

सीमा आज़ाद की इस फेसबुक टिप्पणी पर करीब 150 मित्रों ने टिप्पणी की ,सामान्यतः. सभी ने इसे महिला विरोधी माना और इसकी भत्सर्ना की .

उस चर्चा में से कुछ चुनीं हुई टिप्पणीयां.

मैं आपसे सहमत हूं। मंच पर हमने और अखिलेश ने भी आपस में तुरंत ही यह बात की कि फातमी साहब का वक्तव्य स्त्री विरोधी है। इसका सार्वजनिक प्रतिरोध यदि मंच से होता तो उचित ही होता। संभवतः अली अहमद फातमी को भी अपनी चूक या इस सोच का अहसास होता।
वीरेन्द्र यादव
Zarur virodh karna chahiye tha. Umr, seniority isi sab ja lihaaz ham kar jaate hain jiski vajah se ye log rukte nahi.
नूर ज़हीर
बड़ी बात यह कि “समकालीन जनमत” छाप रहा है । छिः कितने दोगले फूहड और हिंसक लोग हैं ।समकालीन जनमत यदि छापता है तो आपसे विनम्र अनुरोध है एक कापी मुझे भी भेजिएगा ।
उमाशंकर सिंह
आपने अच्छा किया जो लिख दिया। वहीं कह देतीं तो और अच्छा होता।
अब इसे फ़ौरन जनमत में छपने भेज दीजिये।
चाहें तो प्रेषक में मेरा नाम डाल दें। हालांकि प्रतिक्रिया तो आपके नाम से ही देनी होगी क्योकि मैं कार्यक्रम में मौजूद नहीं था।
नरेश सक्सेना
Fatami Sahab ke vaktavya ka vah hissa mujhe bhi khataka. Achchha nahi laga. Is tarah ki baaten kisi manch se nahi honi chahiye !
सूर्या नारायण
सही बात लिखी आपने। तुरंत ही आपत्ति करना और भी अच्छा होता। दो दिन पहले भगत सिंह और साथियों की शहादत के याद में हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की सभा मे मुख्य अतिथि बुजुर्ग सीनियर पितामह …. वक्ता घोर साम्प्रदायिक जहर उगल रहे थे हम लोगों ने खड़े होकर आपत्ति दर्ज की बहस हुई और उनका भाषण समाप्त हो गया।
राजवेन्द्र सिंह
शर्मनाक। ऐसे कथन की घोर भर्त्सना करती हूँ । यह एक स्त्री के साथ उस पुरुष का भी अपमान है।
रूपा सिंह
सीमा जी,आप क्यों लेहाज़ में पड़ गयीं,ये बात समझ में नहीं आ रही ! ऐसे लंपटों को सबक सिखाने में चूक नहीं होनी चाहिए। फातमी के बड़बोलेपन- लंपटपन को हम लोग पहले से जानतें हैं ! अदब की दुनिया का वो एक दुखी और भटकती आत्मा हैं!
मदन मोहन

मैं कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकी लेकिन मैं वहां होती तो मेरी भी यही प्रतिक्रिया होती‌। मैं सीनियर या अज़ीज़ होने को महिला विरोधी या पितृसत्तात्मक विचार व्यक्त करने का लाइसेंस नहीं मानती ना मेरे लिए कभी साथ में इन बातों पर हंसना या तारीफ करना संभव है।

लेफ्ट सिर्फ इस मुगालते में जीता नहीं रह सकता कि वह अपनी विचारधारा के चलते औरों (दक्षिण पंथी) से कम महिला विरोधी है। विचारधारा को व्यहवार में ना लाएं तो फिर फायदा क्या?
निधि मिश्रा
सीनियर बुजुर्गवार तथाकथित बड़े लेखक( सभी के लिये नहीं) अक्सर ही मंचों से ऐसी बातें करते हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही भोपाल में सम्मान समारोह के मंच पर कमल किशोर गोयनका ने ऐसी ही बात कहीकि किसी विदेशी स्त्री को झेलना कितना मुश्किल काम होता है और मेरे दोस्त इस काम को कर रहे हैं , यह साहस का काम है। और अधिकांश लोग हँसे भी। इस तरह का बेबुनियाद , बेजरूरत वाक्यांश उन्होंने सम्मान समारोह की महिला आयोजक के लिए कहा। अक्सर हम आपस में बातें करके चुप हो जाते हैं। या अपने गुस्सा को शांत कर देते हैं। जबकि हमें सार्वजनिक रूप से यह विरोध करना चाहिए । अक्सर होता यह है वह मंच जैसा कि आपने यहाँ भी सम्मान समारोह का मंच था, ऐसा करने की इजाजत नहीं देता। हमें ल
गता है कि इससे कार्यक्रम भंग हो सकता है।
आरती आरती
Not new! Very old habit of AA Faatmiji. I have also objected way back in the 80s but it seems things have not changed at all
Kumadni pati
उर्दु हो या हिंदी- इनकी ज़्यादातर लेखक/लेखिका बिरादरी बग़ैर मंच की गरिमा देखे अपने भीतर छुपी जातिगत श्रेष्ठता, मेहनतकश और औरत विरोधी कुंठा का प्रदर्शन करते रहते हैं. उपस्थित श्रोतागणों की भक्तई की नज़रों में ये कोई बुरी बात नहीं मानी जाती- आपत्ति दर्ज करने/कराने वाले/वालियों को ये ख़ेमाबंदी के दायरे में ढ़केल देने से बाज़ नहीं आते. हमारे ख़ुद के पास ऐसे तजुर्बों की भरमार है. पिछले कई बरसों से लेखकीय प्रजाति की अध्यक्षता/ पेनल (वक्ता) वाले प्रोग्रामोंं का हमने बायकाट कर रखा है, कितना ही बड़ा कोई “तोप” हो ग़ैर इंसानी, अशालीन ज़ुबान/भाषा वालों का लेहाज़ हमसे नहीं हो सकता, इसलिए ऐसी जगह हम जाते ही नहीं.
अगर समकालीन जनमत में उनका ये भाषण बग़ैर “एडिट” किए छपता है तो पत्रिका का बायकाट भी किया जाना चाहिए.
जुलैख़ा जबीं
मामला बहुत संजीदा है. इसे किसी एक व्यक्ति विशेष (मुआफ़ी मांग कर गंगा नहाने जैसा) से ही जुड़ा हुआ नहीं माना जाना चाहिए. ये एक ज़हनियत (प्रवृत्ति) है जो (कम ज़्यादा) हर दो को छोड़कर, लगभग (हर तबकों में) ज़्यादातर में पाई जाती है. (ख़ासकर) उच्च वर्णीय मर्दों को तो ऐसी किसी घटना के बाद मंचस्थ (गोष्ठीयों/सम्मेलनों में बतौर अध्यक्षता/प्रमुख वक्ता) करने की होड़ लग जाती है. कुछ बरस पहले लेखकों के एक राष्ट्रीय समारोह (जिसमें बतौर वक्ता हम भी आमंत्रित थे) के आख़िरी दिन “छोटे से” महिला सेशन में प्रख्यात, “विदुषी”, लेखिकाओं के मुखारबिंद से “घर से भागी लड़कियां” (कविता) के लेखक की प्रशंसनीय, गर्वित टिप्पणियों से आजिज़ आकर हमने उनके महिला विरोधी और (स्वयं की) कलाकार पत्नी को प्रताड़ित, शोषित और उत्पीड़ित करने वाले उस कवि के लिए मंचों से सम्मानित न करने की गुज़ारिश करना इतना बड़ा जुर्म माना गया, के उसी सेशन के दौरान (सिर्फ़) लेखक मर्दों ही ने नहीं बल्कि (मंच सहित) हाल में मौजूद लगभग सभी जनानियों ने हमें दुरुस्त करने के लिए उन लेखक महाशय की अच्छाईयों का जैसे पिटारा खोल दिया था.
एक लेखिका विशेष को “छिनाल” कहने वाले “सर्वप्रिय” महाशय से कौन ना वाक़िफ़ होगा? “छपास” को लालायित औरतों की बड़ी तादाद ने उनके पक्ष में उन दिनों बाक़ायदा मोर्चा खोल रखा था.
सवाल लाज़िम है के तमाम हाशिये के तबक़ों (जिनमें औरतें, दलित, आदिवासी, मुसलमान, ट्रांसजेंडर, मेहनतकश शामिल हैं) के बारे में सार्वजनिक तौर पर मंचों से उनकी मौजूदगी/ग़ैर मौजूदगी में उनकी अस्मिता को मजरूह करने की हिम्मत इन श्रेष्ठी प्राणियों में आती कहांसे है? उससे भी बड़ा सवाल- वहां पे मौजूद सरों (एकाध को छोड़कर) ज़्यादातर के लिए “जाने भी दो यारो” जैसा चालु नज़रिया “वापरने” का “ग़ैर संवैधानिक” हौसला कहां से आ टपकता है?
उनके भीतर डर, झिझक, शर्म क्यूं नहीं पैदा होती? मौजूदा “भीड़” को किसी भी तरह का लेहाज़ छोड़कर, कहने वाले की ग़लत बयानी पर टोक देने/बात वापिस लेने के लिए दबाव बनाने की ज़िम्मेदारी का एहसास क्यूं नहीं जागता? सवाल ज़रूरी है. अगर आप जवाब देने से बचना चाहते हैं…. बेशक…. ये आपका हक़ है…
जुलैख़ा जबीं
सीमा जी, जिसे आप बार-बार महिला विरोधी कह रही हैं दरअसल वह स्त्री की उपस्थिति में मजे लेने के लिए अश्लील और भौंडा मजाक है। ऐसी टिप्पणियां सिर्फ टिप्पणियां नहीं, उनके सरोकारों को भी प्रकट करते हैं। यह भी उनका कमिटमेंट ही है।
उमानाथ लाल दास
मैं भी उस हंसी में शामिल नहीं था और हाल के बाहर रामचंद्र,मैं और अनन्या ने इस पर चर्चा कर आपस में विरोध भी दर्ज कराया था।
रीतेश विद्यार्थी
दर्शकों के बीच से उठकर ऐसे वक्तव्य के ख़िलाफ़ असहमति दर्ज कराना अभद्रता अवश्य होती लेकिन उतनी नही होती जितनी कि मंच से व्यक्त की जा रही थी ।
उनके बाद मंच से बोलने वाले किसी व्यक्ति ने भी यदि ऑब्जेक्शन नहीं लिया इसका अर्थ यह कि वे भी इसके पक्ष में हैं ।
अच्छा बोलने , व्यंग्यात्मक बोलने , मनोरंजक या रोचक बोलने के नाम पर स्त्री के विरुद्ध बोलने की छूट किसी को नहीं होनी चाहिए ।
हम लोग तो कविता के मंच पर इस तरह की टिप्पणी करने वालों , चुटकुला सुनाने वालों और कविता पढ़ने वालों को आड़े हाथों लेते हैं ।
पत्रिका में छपने की बात सिर्फ शगूफा थी । जनमत ऐसे फूहड़ वक्तव्य नहीं छापता किसी विधा के अंतर्गत भी नहीं ।
और यदि छापता है तो हम उसे भी नही बख्शने वाले .
शरद कोकास
प्रो फातमी का हिन्दी साहित्य मे दख़ल मामूली है ।परन्तु ‘ एक बीवी ‘ वाला मसला मात्र व्यंग्यात्मक था स्त्री विरोधी नहीं । हाँ राजेंद्र कुमार जी जैसे वरिष्ठ साहित्यकार जो निश्चित रूप से अपनी सज्जनता , सादगी और वैदुष्य के मामले मे सिंगल पीस हैं , उनके बारे मे बात करते करते फातमी साहब हलकी बातें बोल गये । ये सारी बातें आपस मे बैठकर तो की जा सकती हैं परन्तु जितना गंभीर तथा उच्चकोटि के विमर्श का यह मंच और अवसर था उस पर यह बातें बहुतों को अखरी ।
अविनाश मिश्रा
Avinash Mishra जी, किस पर व्यंग्य था ? राजेन्द्र जी पर? एक ही बीबी के साथ उम्र गुज़ारना व्यंग्य का विषय क्यों लगता है आपको?
निधि मिश्रा
Avinash Mishra jiव्यंग क्या अमूर्त होता है? आपस में बात कर चुकी हूं, लेकिन आपकी तरह यह कईयो को सिर्फ उनकी मज़ाकिया शैली ही लगती है।
सीमा आज़ाद
Nidhi Mishra जी मैं फातमी साहब का बचाव नही कर रहा हूँ । उनकी बातें बहुत हलकी थी । व्यंग्य लिखना कितना कठिन होता है शायद इसका अहसास उनको अब हो गया होगा । रही बात ‘ एक बीवी ‘ वाला तो मैंने एक व्यंगकार का यह भी लिखा पढ़ा है कि ‘ ‘ वह एक बटा बारह दर्ज़न बीवियों का पति तथा तीन बटा बारह दर्ज़न बच्चों का बाप है । ‘ ‘ इसमें एक सीमा से ज़्यादा स्त्री अस्मिता पर विमर्श हो गया । ख़ैर विचार अपना , सोशियल मीडिया अपनी , ख़ूब खुली बहस होनी चाहिए ।
अविनाश मिश्रा
Seema Azad जी मैं तो अब भी मानता हूँ कि यह बयान फातमी साहब का स्थायी भाव नहीं है । यह मात्र भाषायी चूक है ।
सीमा
Avinash Mishra मै आपसे सहमत नहीं, उन्होंने कई मौकों पर ऐसी बातें कही हैं, और पितृसत्तात्म से मुक्त व्यक्ति से ऐसी भाषाई चूकें नहीं होती, बहरहाल क्योंकि उन्होंने माफी मांग ली है, अब आप उनके किए को सही मत ठहराइए।
सीमा
अधिकांश पुरुषों की मानसिकता स्त्री विरोधी होती है।मुझे याद है, वे दिन ,जब मै गांधी भवन जाया करती थी, वहां के डाइरेक्टर , बनवारीलाल शर्मा जी ,जिन्हें बहुत बडा क्रांतिकारी कहा जाता है, कहा करते थे कि मै पैसे के लिए गांधी भवन मे सब कुछ बनवाऊँगा मगर पापड़ नही बनवाऊँगा क्योंकि मुझे बेलन से बहुत डर लगता है। क्या यह स्त्री विरोधी नही है?मैंने इसका जवाब दिया था कि लगता है, आपको बेलन का बहुत अनुभव है। एक दिन कहा कि हमलोग पैसे के लिए रिक्शा चलाएंगे, पर मैं मोटी मोटी महिलाओं को अपने रिक्शे पर नही बैठाउंगा। यह स्त्रियों की खिल्ली उड़ाना नही है क्या?ए
ऐसी बातों के कारन वे मेरे विरोधी हो गए थे।अधिकांश पुरुषों का यही हाल है।
उर्मिला जैन.
सीमा, मैं आपसे सहमत हूं | फातमी साहब ने मजे लेकर जिस तरह स्त्री विरोधी बात की और एक स्त्री की तुलना सदरी से की, वह उनके स्त्री विरोधी दृष्टिकोण को दरशाता है | मेरे बगल में एक महिला साथी बैंठी थीं, वह आनन्द ले रही थी, मैंने अपनी तत्काल प्रतिक्रिया उनसे व्यक्त की| मेरी बातों पर वे गंभीर हो गयी | अभी हाल में लखनऊ के साहित्य समाज पर उषा राय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मर्दवादी समाज है | इसी मर्दवादी समाज व दृष्टिकोण का नमूना देखने को मिला फातमी साहब के वक्तव्य में |
कौशल किशौर
मुझे लगता है वहाँ आपत्ति दर्ज की जानी चाहिए थी। सार्वजनिक रूप से टोके बिना यह प्रवृत्ति नहीं बदलेगी।
सुजाता
आपकी बात पूरी तरह वाजिब है। हां, ऐसे मौके पर खुल कर बोलने का जोखिम उठाना चाहिए। कई दफा उम्र, पद या दीगर बातों का लिहाज कर हम चुप रह जाते हैं, जिससे ऐसे लोगों का मन बढ़ जाता है।
जलेश्वर उपाध्याय
ये सच में बहुत ही ज़्यादा महिलाविरोधी है। ये तो बड़ा soft सा तरीका होता है महिला के दोयम दर्जे को acceptance देने का। अगर मैं भी होती तो वहां पर एक छात्रा होने के नाते विरोध ज़रूर दर्ज कराती।
समय सहर
Abhi pichhle dino Lal Bahadur ji ki Autobiography Ka dusra volume aaya hai. Us me unho ne Fatmi Ka woh Gun Gaan kiya hai ki bas na poochho.
Seema ji ab Fatmi ke baare me aap Ka kya khayal hai?
असरार गांधी
सीमा जी,आपकी बातों से पूर्णतः सहमत हूँ।आपने जिन बातों पर आपत्ति की है,वे आपकी निजी नहीं,सार्वजनिक हित की हैं।हिन्दी पट्टी के बौद्धिक वर्ग को सभ्य होने का अभ्यास सीखना होगा।जरूरी नहीं कि हर ऐसी तमीज पर छडी ही चलायी जाए।छडी के बिना ही हम सभ्य होना सीख लें तो बुरा क्या है।आपके प्रतिवाद का समर्थन के साथ सलाम।
पुष्पराज शांत शास्त्री
सीमा ने जिस तरह मुद्दा उठाया है और साथियों ने जिस संवेदना से इसकी गंभीरता को महसूस करते हुए कमेंट किये हैं वह बहुत सकारात्मक है।
फातमी जी ने यह पहली बार नहीं किया है, वे लगभग अपने हर मंचीय उदबोधन में स्त्री विरोधी बातें कर जाते हैं। उनका विरोध भी पहली बार नहीं हो रहा। हर वक्तव्य के बाद उनके ऐसे विचारों की भर्त्सना भी होती रही है।
लेकिन ऐसे ‘बड़ों’ को सार्वजनिक मंच से आईना दिखाने का काम कम ही हुआ है। अब इस मोड़ पर आकर फातमी जी के विचारों और आदतों में तो बदलाव आने से रहा इसलिए इस तरह के लोगों को सार्वजनिक मंच पर आसीन कराने वालों को ज़रूर सचेत रहना चाहिए। इस तरह के पिछड़े और गलत विचारों का विरोध हर तरह से होना ही चाहिए।
लेफ्ट का एकमात्र आधार समानता का विचार ही तो है, उस को भी हम न बचा पाए तो हमारी क्रेडिबिलिटी फिर क्या है??
संध्या नवोदिता
यह सही है कि आपत्ति वहीं करनी चाहिए थी, लेकिन कुछ महीने पहले मैंने समानांतर के एक नाटक के बाद मंच पर जाकर आपत्ति जताई कि यह नाटक सांप्रदायिक है तो वहां मौजूद नाटक के आयोजकों ने मेरी बात से ज्यादा इस बात का विरोध किया कि ये बात मैंने यही पर क्यों कह दी, इससे नाटक का असर कम हो गया। मैंने कहा मैंने इसीलिए तो यह बात कही है लेकिन वे लोग मुझसे नाराज़ हो गए भौमिक दादा ने कुछ भी नहीं कहकर अपनी बात कह दी जबकि इसके बाद मैंने इस मसले पर उनसे उनकी राय जाननी चाही। उसके बाद बहुत से लोगो के मेरे पास फोन आए कि आपने सही आपत्ति की, लेकिन किसी ने सामने आकर यह बात नहीं कही। उस घटना के कारण इस बार मैं वहीं आपत्ति दर्ज कराने में झिझक गई। वैसे यह काम मुख्य रूप से संचालक और आयोजकों का होता है। इन कारणों से मैंने ये मंच चुना, यहां इस महिला विरोधी वक्तव्य और माहौल की मुखालफत को समर्थन करने के लिए आप सब का शुक्रिया। माहौल ऐसे ही बदलेगा। हम जहां भी बोल सकते हैं बोलेंगे।
सीमा
असहमति, विरोध, आपत्ति तक सीमित न रहकर इस पर ठोस कदम उठाये जाने चाहिये | यदि फातमी साहब में लगातार स्त्री विरोध व मर्दवाद देखा गया है और उसने प्रवृति का रूप ले लिया है तो प्रगतिशील व जनवादी संगठनों को उनके सामाजिक बहिष्कार का निर्णय लेना चाहिये | उन्हें अपने कार्यक्रमों में मंच देना बन्द कर देना चाहिये, एक साल के लिये | यह मर्दवाद पर चोट के साथ यह संदेश भी देगा कि संगठन इस मुद्दे पर सजग व सचेत हैं | दो साल पहले ऐसा कदम लखनऊ में यहां के संगठनों ने संयुक्त रूप से उठाया और जाने माने लेखक का एक साल तक सामाजिक बहिष्कार किया | मैं समझता हूं कि इलाहाबाद के साथियों को इस दिशा में पहल जरूर लेनी चाहिये |
कोशल किशोर
सो-कॉल्ड प्रोग्रेसिव। जरा कुरेद के देखिये बड़े ही कुंठित, जातिवादी, स्त्रीविरोधी और सांप्रदायिक नज़र आएंगे.
महेश दोनियां
लेकिन मजा तो मंच पर बैठे लोगों ने लिया ही … कौन वीरेंद्र यादव …कौन राजेन्द्र कुमार सभी तो उस हंसी में शामिल थे …नहीं होते तो उसी समय वक्ता को बयान वापस के लिए बाध्य किया जाता …और यह पोस्ट न आती तो अभी तक बात आयी गयी हो जाती …. ये हिन्दी के मजाखोर …यही इनके चेहरे हैं …
निर्भय दिव्यांश
मैं समझता हूँ कि उस आयोजन में इलाहाबाद की लगभग साहित्यिक बुद्धिजीवी जमात मौजूद रही होगी। किसी ने वहाँ इस बात पर आपत्ति नहीं जताई यह बेहद चिंतनीय है।
सुनीत मिश्रा.
कोई नही अब तो विरोध जताया ही जा सकता है और आगे से ऐसा कुछ भी करने पर सार्वजनिक तौर पर ही विरोध किया जाना चाहिए।
किशोर सिंह मोर
इस बीच फातमी साहब ने सीमा को फोन करके क्षमा मांगी , वह कमेंट आगे  है.  सीमा के नोट के बाद लिखा …
आपकी आलोचना ने सही भूमिका निभाई – उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ, उन्होंने माफी मांग ली और सभी विवादास्पद बातें हटाने का आग्रह किया ।
सूर्य नारायण
चलिये फातमी साहब को अपनी गलती का अहसास हुआ और अपनी आत्मालोचना की, यह आपकी ओर से फेसबुक पर विरोध की वजह से संभव हुआ | फिर भी मेरा मत है कि समस्या गंभीर है और वह सिर्फ माफी मांगने से हल होने वाला नहीं है | विचारों में हम प्रगतिशील हो जाते हैं पर जीवन व्यवहार में ऐसा कम ही होता है क्योंकि डीकास्ट व डीक्लास का जो आत्म संघर्ष है, वह इन दिनों कमजोर हुआ है | सभागार में जिस विषय का विरोध किया जाना चाहिये, वहां लोग मजे ले रहे थे, ठहाके गूंज रहे थे, तालियां बज रही थी | हम जैसे भी चुप ही रहे इसलिये मूल कार्यक्र में व्यवधान नहो | आपकी पहल से इसकी गूंज दूर तक गयी | यह संघर्ष जारी रहे, इसी कामना के साथ आपकी पहल को सलाम |
कौशल किशौर
चेताना जरूरी था , अच्छा हुआ समकालीन जनमत ने बात रखी । पर मुझे जितना मालूम है इसे जनमत कभी नही छापती , वे जरुर संशोधित अंश ही रखते ।
मीता दास
इस लड़ाई के लिए बधाई!
स्त्रीद्वेष, यौन कुंठा, शोहदापन, कूपमण्डूकता, सामंती तेवर, ज्ञानविमुखता, सहज प्रतिगामिता और नैतिक कायरता हमारे हिन्दी, संस्कृत और उर्दू विभागों की “डिफ़ॉल्ट सेटिंग” (यानी घुट्टी में शामिल) है। औरतें इस बात को ज़्यादा अच्छी तरह जानती हैं। बिना निजी और सामूहिक दोनों स्तरों पर प्रतिरोध के मामूली सुधार भी नहीं होगा। यह एक स्थायी मोर्चा है।
अस़द जैदी
अच्छा हुआ लेकिन लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। यह प्रक्रिया जारी रखनी पड़ेगी।
जलेश्वर उपाध्याय
यह बहुत अच्छा रहा। किसी को अपनी ग़लती का एहसास हो जाये और वह आगे से ऐसा न करने को बोले तो इससे बढ़िया बात क्या होगी। इस घटना और इस पर आपके प्रतिरोध से एक बात और ज़्यादा स्पष्ट हो गई कि किसी ग़लत बात का विरोध ज़रूर करना चाहिए चाहे वह करने/कहने वाला कोई भी हो।
सयैद अयूब
फातमी जी को भी सलाम ,गलती मानने वाला भ बड़ा होता है गलती का एहसास दिलाने वाला तो बड़ा है ही । सीमाजी बधाई आपको ।
बलीसिंह चीमा
अन्त भला सो सब भला।
फ़ातमी जी की ख़ुद की स्वीकारोक्ति और क्षमा प्रार्थना से इस दुःखद प्रकरण का अब समापन हो गया है।
व्यक्तिगत कारणों से मैं पहले सत्र के कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो पाया था।
संतोष चतुर्वेदी
और अंत में सीमा आज़ाद ने फातमी जी ने फोन का जिक्र करके लिखा .
दोस्तों,
थोड़ी देर पहले मेरे पास अली अहमद फातमी जी का फोन आया कि वे अपने कल के वक्तव्य पर माफी चाहते हैं और ये गलती उनसे अनजाने में हुई है। मैंने उनसे कहा कि हो सकता है कि समाज में महिला विरोधी माहौल होने के नाते आप ये गलती अनजाने में करते हों, लेकिन टोकने के बाद किसी गलती को सोचें समझे तरीके से सुधारा जाता है, पर आपने टोकने के बाद भी नहीं सुधारा। दूसरे, माफी केवल मुझसे नहीं सबसे मांगनी चाहिए, सार्वजनिक रूप से।
इस पर उन्होंने कहा कि मैं माफी मांगने के साथ ये वादा करता हूं कि आइंदा ऐसी गलती नहीं करूंगा, लेकिन क्योंकि मैं फेसबुक पर नहीं हूं मेरी माफी मांगने की बात आप ही सबसे बता दीजिए।
उन्होंने यह भी कहा कि जनमत कि मीना राय को फोन कर उन्होंने कह दिया है कि लेख से महिला विरोधी सारे वक्तव्यों को हटा दिया जाए, तब प्रकाशित किया जाय।,
सीमा आज़ाद
सीमा जी ने इस चर्चा का पटाक्षेप निम्न वक्तव्य के साथ किया ..

क्योंकि अली अहमद फातमी जी ने अपने वक्तव्य के लिए माफी मांग ली है, आइंदा ऐसी बातें न बोलने का वादा कर चुके हैं, जनमत को फोन कर लेख के महिला विरोधी और फूहड़ अंश हटा लेने को कह चुके हैं, और अब ये भी कह चुके हैं कि शहर में 7 अप्रैल को होने वाले कार्यक्रम में भी वे सार्वजनिक तौर पर सबसे माफी मांगने को तैयार हैं, तो मेरी ओर से यह झगड़ा फिलहाल खत्म है। (फिलहाल इसलिए कि वे या कोई और भी फिर से ऐसे वक्तव्य देगा तो फिर यह शुरू हो जाएगा)।
कृपया अब इस मामले को आगे कर लोग फातमी जी से अपनी पुरानी दुश्मनी निभा डालने की कोशिश न करें, और मुझे फोन कर यह समझने की कोशिश न करें कि ‘आप को ये नहीं ये’ या ‘ऐसे नहीं वैसे’ करना चाहिए था।

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