30.03.2019

जंगल – जमीन पर ग्रामीण आदिवासियों की आजीविका, पहचान और संस्कृति जुडी हैं यदि उसे छीन लेंगे तो एक तरह से उनका अस्तित्व ही ख़त्म करने जैसा हैं l

मुझे लगता हैं कि प्रदेश में अब यह बहस शुरू होनी चाहिए कि आखिर हम कितना खनन करेंगे l क्या 50 हजार मिलियन टन कोयला का भंडार निकालने उत्तर छत्तीसगढ़ के सभी जंगलो का विनाश कर देंगे l लोहा निकालने के लिए बस्तर के सभी पहाड़ो को ही ख़तम कर देंगे l

और यदि ऐसा होगा तो खनन परियोजनाओ से प्रभावित हजारो लोग कहाँ जायेंगे ? जंगल पहाड़ो के विनाश से हमारी नदियों के अस्तित्व का क्या होगा ? वन्य प्राणियों के लिए कोई जगह होगी या सभी जंगल सफारी में रहेंगे ? पुरे प्रदेश पर्यावरण का क्या होगा ?
मुझे लगता हैं कि खनन प्रभावित लोग सिर्फ अपने गाँव को बचने के लिए नहीं लड़ रहे हैं बल्कि इन सभी सवालों के लिए संघर्ष कर रहे हैं l इसीलिए ए सिर्फ एक गोंव नही बल्कि संपूर्णम हसदेव अरण्य क्षेत्र को बचामे की बात करते हैं l शहरो में बेठे हम लोग इन संघर्षो में कहाँ हैं ?

आलोक शुक्ला की टिप्पणी