29.03.2019

नदी के चुआन जैसी एक धारा
दुबली पतली
दिप दिप करता गोरा अंग
कोई छूने से डरे इतनी नाजुक
छोटी मड़िया के पुजारी की बहू कहो
या अरपा नदिया कहो
एकई जैसे – जुड़वां .
*
इतना उजास कि रद्दा दिखता रहे , इतना अंधियार कि गीले लुगरा से शरीर न झलके ; तब आती थीं – नदी नहाने ,
काम बूता से वापस घर लौटती ,
छोटी मड़िया की आड़ में , पहने लुगरे को आधा लपेटती आधा निचोड़ती
शंकर जी को दूर से पा लगी करतीं ,
एक लाईन से निकल जाती थीं ऊपर बस्ती की तरफ़ – बनिहारिन औरतें .
*
शाम की आरती बाद – पूजा की थाली लोटा बरतन मांजने नदी तक आती , मुरझाए बासी फूल , फूटे नारियल की बूच फेंक जाती मड़िया के पीछे , घिरते अंधेरे में पल भर कौंधती और गुम हो जाती थी – पुजारी की बहुरिया ।
जो देख पाया सिसिया के रह गया जो चूक गया तो कल तक चुरमुराते रहो ।

सूने घाट पर सजती रसिक लौंडों की धूनी ।
नारियल की बूच के गोले से सुलगता गुल बनाया जाता , गांजे को अरपा के पानी से भिंगो कर निथारा जाता उसमें नापतौल कर मिलायी जाती सूखी बिड़ी पत्ती तमाखू , गुलाब की सूखी पांखुरियां , साफ़ धुली बीते भर की चिलम पर लपेटी जाती गीली चिंदी यानी चिलम लंगोट , लाल डूबते सूरज सा सुलगता गुल – चिलम के माथे पर रखा जाता .

हर हर , बम बम के जयकारे के साथ , चिलम चकरी में घूमने लगती .
बाम्हन – अबाम्हन सबके हाथ लगती , चकरी भर के होठों को बारी बारी चूमती चिलम – काहे की छुआ किसकी झूठन । अबाम्हन के मुंह से निकला गाढ़े धुवें का लच्छा टुन्न बाम्हन के गाल सहलाता , मड़िया पर अटके झंडे तक तो दिखता – फिर कहां जाता – का पता ।

महराज गुजर गये । बेजा कब्जा में आगयी – मड़िया । कलेक्टर ने खड़े खड़े तोड़वा दी , आड़ क्या टूटी – गरीब गुरबा की औरतों का घाट ही उजड़ गया । बहुरिया कहां गयी – दुलौरी केवटिन भी नहीं बता पाती ।

शंकर जी कहां जा बिराजे – वो जानें ।
अरपा को सामने वाले सेठ ने ऐसा धकेला कि सौ हाथ पीछे जा कर औंधी गिरी । कहते हैं तब की औंधी पड़ी अरपा फिर न उठ सकी , देह सूख कर माटी भई – लोग माटी डुहार डुहार ले गये ।

*
आज भी रोज शाम का सूरज – गुल सा दहकता है . गाढ़े धुंवें का लच्छा आज भी शाम कभी कभी अरपा की कब्र पर तैरता दिखता है ।
वो लौंडे अब नहीं जुड़ते ; तन्वंगी दिपदिप बहुरिया और अरपा की धार के दीवाने अब कहां बचे .
कहीं से टूट गया वो जुड़वांपन ——-

 

 

नवल शर्मा ,कला मर्मज्ञ ,बिलासपुर