शांतिनिकेतन के बसंतोत्सव में पानी का उपयोग सिर्फ पीने के लिए हुआ। फेंकने में बिल्कुल भी नहीं . 

22.03.2019 / शांति निकेतन से नंद कश्यप 

डेढ़ लाख से अधिक की उपस्थिति जिसमें गले में या जूड़े में पलाश के फूलों की माला अथवा वेंणी डाले साठ फीसदी युवतियां हों संकरी गलियों में आठ किलोमीटर पैदल चलते हुए मुख्य पांडाल तक जाना, सूखे प्राकृतिक गुलाल से सौम्यता पूर्वक होली की बधाईयां देते हुए।कोई नारेबाजी नहीं। परिवार के परिवार वहीं आसपास बैठ अपने साथ लाए पकवान अथवा रेहड़ी वालों से विभिन्न खाद्य सामग्री लेकर खाते हुए। परिचय अपरिचय जैसा कुछ नहीं।मिले गुलाल लगाया गले मिले मुस्काए क्योंकि भाषा अलग अलग।

सारी दुनिया से शांतिनिकेतन के बसंतोत्सव में शामिल होने लोग आए हैं।हम लोग भी सुबह पांच बजे शांतिनिकेतन के लिए निकले और वहां के सूर्योदय के साथ उत्सव में शामिल हुए। नृत्य संगीत के दल के दल अपनी प्रस्तुतियां देते आगे पीछे भीड़ में शामिल कोई विशिष्ट अतिथि संस्कृति नहीं। हुड़दंगी होली से एकदम अलग ।

मुझे एक छात्र ने गुलाल लगाया हिंदी में बधाई दिया तो मैंने कहा हम छत्तीसगढ़ से हैं तो वह गले लग कहा मैं झारखंड से हूं आपका पड़ोसी। लाखों की भीड़ कोई अप्रिय स्थिति नहीं और न ही कोई प्रशासनिक हस्तक्षेप कि चप्पे-चप्पे पर पुलिस हो ऐसा कुछ भी नहीं। छोटे से भौगोलिक क्षेत्रफल में 11 करोड़ की आबादी वाले बंगाल में रास्तों पर जाम लगना इतना सहज होता है कि कोई तू तू मैं मैं नहीं ।

यह है श्रमिक संस्कृति । मेरा अनुभव है कि जहां दलाली और ठेकेदारी से अथवा संपत्ति बेचकर धनवान लोग हैं वहां सबसे ज्यादा कुसंस्कार हैं अपराध हत्या बलात्कार हुड़दंग स्त्रियों का अपमान है।

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