एक पुराना व्यंग : बाँह के कुर्ते और गांधी : अरूण कांत शुक्ला

आधी बाँह के कुर्ते और गांधी

{ 2015 में अरूण कांत शुक्ला जी का लिखा  व्यंग आज भी उतना ही सार्थक है .}

(मोदी जी की बातों में उसका अभाव है और यह अभाव इनकी राजनीति में भी दिखता है| धो न सको तो बांह काट देने की राजनीति में, गलतियों को महिमामंडित करने तथा अपराधों और भूलों के लिए प्रायश्चित न करने की राजनीति में|)

(जब एक बार मोदी जी से उनके स्टाइलिश कुर्ते के बारे में पूछा गया तो प्रधानमंत्री ने बताया: ‘आरएसएस और भाजपा में काम का मतलब सिर्फ लगातार यात्राएं ही नहीं, बल्कि अनिश्चित और दुश्कर कार्यक्रम भी हैं. और मैं तो अपने कपड़े हमेशा खुद ही धोता था, मैं सोचा कि पूरी बांह का कुर्ता धोना अधिक कठिन था और ज्यादा समय लेता था तो मैंने अपने कुर्ते को काटकर आधी बांह का कर देने का फैसला किया.’उनका यह बयान गूगल में सर्च करने से मिल जाएगा|)

(उसी पर यह व्यंग्य है)

मुझे नहीं लगता कि राजनीति में जनता के किसी भी तबके से संवाद स्थापित करते समय कुछ भी अतिशयोक्तिपूर्ण कथन करने की कोई आवश्यकता पड़ती है| धोने में आलस्य आने या कठनाई होने पर कोई कुर्ते की बाँह काट दे और फिर कहे कि वह केवल 4 घंटे सोता है और दिन रात काम में भिड़ा रहता है, मुझे बात जमी नहीं| इसमें कहीं न कहीं अतिश्योक्ति है| फिर यह कहना कि फिर यह फैशन में आ गया, यह दिखाता है कि आप के अंतर्मन में फैशन आईकॉन बनने की इच्छा है| मीडिया ने और स्वयं उनके प्रचारतंत्र ने चुनावों के दौरान एक फैशन आईकॉन के रूप में भी उनकी छवि को पेश किया था| यहाँ तक कि उनकी अमेरिका की यात्रा के दौरान भी उनके कुछ पिठ्ठू चैनलों और अखबारों ने इस प्रचार को चलाया था और मेडिसन स्क्वायर पर उनकी सभा को भी उसी रूप में पेश किया था क्योंकि मेडिसन में अक्सर फ़िल्मी सितारों के और मनोरंजन के कार्यक्रम ही होते हैं और साधारणत: गंभीर राजनीतिज्ञों को वहां सभा करने से परहेज होता है|

लोग स्वयं होकर आपका अनुकरण करें यह और बात है, पर आप स्वयं जब किसी फैशन को शुरू करने वाले के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करें और वह भी बच्चों के सामने तो फिर आपकी राजनीतिक गंभीरता पर सवाल उठना लाजिमी है| यह भी पूछा जा सकता है कि कुछ संगठनों का गणवेश क्या इसी आलस्य के कारण आधा पतलून है? फिर कुर्ते की लंबाई कम क्यों नहीं की? अनेकों सवाल हैं, जो पूछे जा सकते हैं| पर नहीं पूछूंगा|

भारत में फेंकने की विधा के वे माननीय एक ही पारंगत हैं| मैंने 1966 में आधी बांह का कुर्ता और वह भी शार्ट अपने एक मित्र से भोपाल में सिलवाया और पहना था| यही नहीं मैं उसे पेंट पर जूते मोज़े के साथ पहना करता था| लोग और मित्र हंसते भी थे| यह अलग बात है कि उस समय दरजी ऐसे कुरते सिलते नहीं थे क्योंकि वे प्रचलन में नहीं थे और उन्हें ऐसे कपडे सिलना अटपटा लगता था| मेरे मित्र के पालकों का व्यवसाय ही टेलरिंग था और वह 10 वर्ष की आयु से उस काम में पढ़ाई के अलावा रुची लेता था या उसके पिता चाचा आदि उसे प्रेरित करते थे| इसे आप आज की कौशल शिक्षा कह सकते हैं| मेरे घर में भी दो गज कपड़ा खराब कर दोगे कहकर बहुत नाराजी थी, पर अंतत: मैं कामयाब हुआ| मैं उस समय 16 वर्ष का था और 11वीं की परिक्षा दे रहा था| पर, सचाई यह है कि मुझे भी उस तरह का कुर्ता सिलवाने का आईडिया शम्मी कपूर की किसी फिल्म से आया था, जिसमें शम्मी कपूर ने कोहनी से थोड़ी नीचे वाली टीशर्ट पहनी थी और जैसी की उनकी अदा थी, उसका कॉलर खड़ा रखा था| मैंने बस दोस्त के पिता से कॉलर को आधा करने और बांह की लंबाई कोहनी से उपर करके नीचे दो जेब लगाने कहा था| गाँव-देहात में लोग दशकों से ऐसे कुर्ते, उससे भी शार्ट, जैसे आज बनते हैं, पहनते आ रहे हैं| पर, वे कभी फैशन आईकॉन नहीं बने|

मैं आपको बताऊँ, बहुत बाद में उस डिजाईन का कुरता राजेश खन्ना ने फिल्म सच्चा झूठा में पहना था| यह तब भी सामान्य रूप से फैशन में नहीं आया| इसका कारण देश का अविकसित और पिछड़ा रेडीमेड गारमेंट उद्योग था| अब कारपोरेट प्रबल है और वह पहले आईकान बनाता है और फिर मार्केट में सामग्री| आधी बांह का कुरता मैं 1998 से लगभग लगातार पहन रहा हूँ और वह भी सिलवाकर, यहीं रायपुर में| कुर्ता टी शर्ट भी मैं लगभग 1982 से पहन रहा हूँ| आज का आधी बांह का कुर्ता उसी का रूप है| इसकी शुरुवात बंगाल से हुई है|

वे फेंकने की कला के माहिर हैं, उन्हें फेंकने दीजिये | दो तीन पीढियां गुजरने के बाद , विशेषकर राजनीति में ऐसे लोग आ ही जाते हैं, मानो उन अकेले ने सब त्रासदियाँ भोगी हैं| लेम्प/दिए की रोशनी, स्ट्रीट लाईट में पढाई , यह भारत की अधिकाँश जनता ने की है और यहाँ तक की मध्यम वर्ग ने भी की है, उस समय देश का विकास, संसाधनों का विकास उतना ही हुआ था| वह देश पर कोई अहसान नहीं है| पर, बिजली युग में पैदा हुई पीढ़ी को ऐसा लगता है, मानो इन नेताओं ने कोई बड़ी कुरबानी की है|

अभी के राष्ट्रपति ने, अभी, और जब वह वित्तमंत्री थे तब भी, ऐसा ही सब कहा था| अब माननीय प्रधानमंत्री कह रहे हैं| दोनों ने कहा कि वे शुरू में तीन चार साल स्कूल ही नहीं गए| यदि उनके कहने का तात्पर्य यह है कि वे स्कूल जाने योग्य आयु होने के बाद स्कूल नहीं गए, तब भी यह गलत सन्देश है और यदि वे यह कह रहे हैं कि स्कूल में प्रवेश के बाद वे स्कूल बंक करते थे तो वे राष्ट्र के बच्चों के सामने बहुत ही गलत उदाहरण पेश कर रहे हैं|

इसी तरह बच्चों से यह कहना कि वे बहुत शरारती थे, एक गलत संवाद है| आप सरल दिखने के लिए, जोकि माननीय प्रधानमंत्री की आदत है, गलत उदाहरण बनाकर प्रस्तुत न हों, बेहतर यही होगा| पिछली बार उन्होंने अपनी शरारती स्वभाव का उदाहरण देते हुए कहा था कि वे किसी भी शादी के पंडाल में घुसकर खाना खाकर आ जाते थे और दोनों पक्ष समझते थे कि यह उनका आदमी है| यह एक गलत सन्देश है और आपराधिक कृत्य को बढ़ावा देना है| इसी तरह शादी में शहनाई बजाने वाले के सामने इमली या आचार का टुकड़ा हिलाना ताकि उसके मुंह में पानी आये और वह शहनाई न बजा पाये, एक गलत शरारत है और ऐसे बच्चों की ढूंढकर बेतहाशा पिटाई की जाती थी|

ऐसा नहीं है कि इतिहास में कभी महापुरुषों ने बचपन की अपनी शरारतों, गलतियों और भूलों को स्वीकार नहीं किया है| गांधी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं| उन्होंने बीड़ी पीने से लेकर पैसा चुराने और कस्तूरबा को मारने जैसी सभी बातों को स्वीकार किया पर उन्हें महिमामंडित नहीं किया| उनकी स्वीकारोक्ति से अपराध करने, शरारत करने की प्रेरणा नहीं मिलती बल्कि ऐसा न किया जाए कि भावना प्रगट होती है क्योंकि हर घटना के साथ उन्होंने बताया कि उन्हें अपराध बोध हुआ और उन्होंने पश्चाताप किया तथा वैसे कृत्य पुन: न करने का संकल्प लिया| मोदी जी की बातों में उसका अभाव है और यह अभाव इनकी राजनीति में भी दिखता है| धो न सको तो बांह काट देने की राजनीति में, गलतियों को महिमामंडित करने तथा अपराधों और भूलों के लिए प्रायश्चित न करने की राजनीति में|

अरुण कान्त शुक्ला

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