लाल गलियारे से… विमोचन में जनसमुदाय की जबरदस्त मौजूदगी .

17.03.2019 , रायपुर 

रायपुर / छत्तीसगढ़ के पत्रकार राजकुमार सोनी की नई किताब लाल गलियारे का विमोचन 15 मार्च को सिविल लाइन रायपुर के वृंदावन हाल में संपन्न हुआ। इस मौके पर सामाजिक- मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, आदिवासी इलाकों के प्रबुद्धजनों के अलावा जनसमुदाय की जबरदस्त मौजूदगी ने सबको हैरत में डाल दिया। हालांकि उनकी पिछली दो किताबों बदनाम गली, भेड़िए और जंगल की बेटियां के विमोचन के दौरान भी हतप्रभ कर देने वाली उपस्थिति थीं, लेकिन इस बार पिछला रिकार्ड भी टूट गया. जितनी बड़ी संख्या में दर्शक- श्रोता हाल के भीतर थे उससे कई गुना ज्यादा हाल के बाहर थे।

किसी भी हिंदी पट्टी में किताब के विमोचन अवसर पर लोगों की मौजूदगी और किताब की बिक्री का जो रिकार्ड बना है वह अपने आपमें अनूठा है।

विमोचन अवसर पर देश के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता-गांधीवादी चिंतक हिमांशु कुमार, आलोचक प्रणय कृष्ण, बसंत त्रिपाठी, पत्रकार कमल शुक्ला और प्रोफेसर सियाराम शर्मा, अरुण पन्नालाल खास तौर पर मौजूद थे। सभी वक्ताओं ने यह माना कि कार्पोरेट जगत की लूट को संरक्षण देने के लिए भाजपा की सरकार ने सलवा-जूडूम जैसी स्थितियां पैदा की थीं और आदिवासियों को उनके ही अपने घर से बेदखल कर दिया था। माओवादियों के खात्मे के नाम पर आदिवासी राहत शिविरों तक लाए गए और फिर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया गया। सभी प्रमुख वक्ताओं ने किताब को खौफनाक समय और परिस्थितियों का दस्तावेज बताया।

इस मौके पर किताब के लेखक राजकुमार सोनी ने बताया कि उनकी किताब में बस्तर से लेकर नेपाल के माओवादी इलाकों तक की गई चुनिन्दा रपटें हैं, जिससे गुजरकर पाठक यह अंदाजा तो लगा ही सकते हैं कि माओवाद आड़ में भाजपा की सरकार कैसा कुछ भयावह खेल खेलने में लगी हुई थीं। सोनी ने कहा कि उनकी यह किताब पिछले साल ही प्रकाशित हो जानी थीं लेकिन तब अधिकांश प्रकाशकों ने इसे छापने से इंकार कर दिया था। प्रकाशक भी यह मान बैठे थे कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार जन सुरक्षा अधिनियम का इस्तेमाल करते हुए उन्हें जेल में ठूंस सकती हैं।

 

बहरहाल माओवाद के नाम पर आदिवासियों के खात्मे के खिलाफ कई सवाल उठाने वाली किताब लाल गलियारे से… की भूमिका आलोचक प्रणय कृष्ण ने लिखी है। उनकी भूमिका का एक अंश ही यह बताने के लिए काफी है कि इस किताब का जनसामान्य के बीच क्यों आना जरूरी था?

प्रणय कृष्ण लिखते हैं- बस्तर युद्ध से आक्रांत है। हम और आप ( यानी वे सब जो बस्तर कभी गए नहीं या ऐसी ही दूसरी समरभूमियों के साक्षी नहीं रहे ) आखिर सच को कहां से पाएं? सरकारी रिपोर्टों में? नेताओं के बयानों में? भूमिगत युद्धरत संगठनों के दस्तावेजों में? बिके हुए इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के गला फाड़, कानफोडू कौआ-रोर में? या वहां जहां परसेप्शन ही सब कुछ है, रियल्टी कुछ भी नहीं, आखिरकार सच का संधान कैसे होगा? तथ्यों, आकंडों, भंगिमाओं और बयानों पर परजीवियों की तरह पलती पत्रकारिता से अलग क्या जनता को सच जानने का हक नहीं है? किताब में वहीं सब कुछ है जो पत्रकार ने माओवाद प्रभावित इलाकों में अपनी आंखों से देखा है।

किताब का आवरण पृष्ठ अशोक नगर गुना के चित्रकार पकंज दीक्षित ने बनाया है। कार्यक्रम का संचालन भुवाल सिंह ठाकुर ने किया। उनके कुशल संचालन को भी लोगों ने खूब सराहा।

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