प्रसिद्ध उर्दू शायर ‘जोश’ मलीहाबादी : अनिल जनविजय

प्रसिद्ध उर्दू शायर ‘जोश’ मलीहाबादी को उनकी बग़ावत पसंद नज्मों के कारण अंग्रेजों के ज़माने में शायरे इन्कलाब की उपाधि दी गई और लोग उन्हें पढ़ते हुए जेल भेजे जाते थे। उनमें अभिव्यक्ति की उद्भुत शक्ति थी। वे अल्फाज़ में आग भर सकते थे और दिलों में आग लगा सकते थे। बाद में पाकिस्तान चले जाने के कारण उनका विरोध भी हुआ लेकिन उनकी रचनाएँ कभी नहीं भुलाई जा सकेंगी।
जोश मलीहाबादी : जीवनी
प्रकाशन विभाग, ओल्ड सेक्रेटेरियट, पुरानी दिल्ली के एक गोल कमरे में, जो मासिक पत्रिका ‘आजकल’ (उर्दू) के सम्पादक का कमरा है, दमकते चेहरे, चौड़े, माथे भारी भरकम देह और बड़े रौबीले व्यक्तित्व के एक व्यक्ति ने चाँदी की डिबिया से पान निकालकर मुँह में डाला, फिर रेशमी बटुए से छालियां निकालते हुए सामने कुर्सियों पर विराजमान आठ दस भद्र पुरुषों में से एक से पूछा।
‘‘कहिए, ख़ैरियत से तो हैं ?’’
‘‘जी नवाज़िश है’’, सम्बोधित सज्जन ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया। ‘‘आप फरमाइये, आपके मिज़ाज कैसे हैं ?’’
‘‘मेरे मिज़ाज !’’ क़िवाम की शीशी में से थोड़ा-सा किवाम मुँह में डालते हुए उस रौबीले व्यक्ति ने कहा, ‘‘मेरा तो एक ही मिज़ाज है साहब ! पोते अलबत्ता बहुत से हैं।’’
‘‘ओह ! मुआफ़ फरमाइयेगा।’’ सम्बोधित सज्जन ने बौखला कर अपनी एक-वचन और बहुवचन की गलती स्वीकार करते हुए कहा।
‘‘कैसे तशरीफ़ लाए ?’’ रौबीले व्यक्ति ने फिर से प्रश्न किया।
‘‘जी, बहुत अर्सा से नियाज़ हासिल नहीं हुआ था, सोचा ’’
लेकिन इससे पहले कि वे कुछ सोचते या सोची हुई बात कहते, उस रौबीले व्यक्ति ने उन्हें एक और पटख़नी दे डाली-
‘‘अच्छा, अच्छा, बहुत मैदान1 से नियाज़ हासिल नहीं हुआ था।’’
—————————————————-
1. अरबी शब्द अर्सा का शाब्दिक अर्थ ‘मैदान’ है।
—————————————————-
ओह ! मुआफ़ फरमाइयेगा, सम्बोधित सज्जन ने और भी बौखला कर अपने शब्द प्रयोग की अशुद्धि स्वीकार की और चुप हो गए।
उस रस रौबीले व्यक्ति ने, जो अपने हाव-भाव से बहुत भुलक्कड़ मालूम होता था, शायद किसी काम के याद आ जाने से हवा में एक प्रश्न उछाला :
‘‘आज क्या तारीख़ है ?’’
‘‘उन्नीस।’’ उत्तर देने वाले ने अपनी ओर से पूरे विश्वास के साथ उत्तर दिया।
‘‘शायद उन्नीस से आपकी मुराद उन्नीसवीं से है।
‘‘जी हां, जी हां।’’ फिर उसी पहले सज्जन की-सी बौखलाहट का प्रदर्शन हुआ।
‘‘हद है साहब।’’ रौबीले व्यक्ति ने कहना शुरू किया-‘‘यह नई नस्ल ज़बान का सत्यानास कर देगी। क्यों जनाब ! बीसवीं सदी को आप बीस सदी कहेंगे ?’’
‘‘जी, ग़लती हो गई।’’ गलती करने वाले ने और भी लज्जित होकर कहा और चुप हो गया। लेकिन थोड़ी देर के बाद किसी दूसरे सज्जन ने साहस से काम लेते हुए कहा, ‘‘लेकिन जोश साहब ! लोग तो उन्नीसवीं तारीख़ को उन्नीस तारीख़ ही कहते हैं।’’
उस भारी-भरकम देह और रौबीले व्यक्तित्व के मालिक जोश मलीहाबादी ने इस वाक्य पर व्यंग्यपूर्वक मुस्कराकर कहा, ‘‘लोग इस मुल्क के जाहिल हैं साहबज़ादे ! मैं आम लोगों से नहीं तुम लोगों से मुखातिब हूँ-तुम जो अपने आपको अदीब और शायर कहते हो। अगर तुम लोगों ने ही ज़बान की हिफ़ाजत करने की बजाय उसे बिगाड़ना शुरू कर दिया तो…’’ अब ‘जोश’ साहब बाक़ायदा भाषण दे रहे हैं। कुछ बातें वे ठीक कह रहे हैं और कुछ ऐसी भी कह रहे हैं जिन पर आपत्ति हो सकती है। ये बातें भाषा और साहित्य, धर्म तथा राजनीति, सामाजिक बंधनों तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मानव-विकास तथा समाज में स्त्री का स्थान, सामन्तशाही, पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, समाजवाद, साम्यवाद इत्यादि विभिन्न विषयों को छू रही हैं और इन पर वे लगातार बोल रहे हैं। श्रोतागण मौन हैं। ‘जोश’ साहब का साहित्यिक स्थान महत्ता और रौबीला व्यक्तित्व उनकी किसी ग़लत बात पर भी आपत्ति करने का साहस पैदा नहीं होने देता कि एकाएक स्वयं ‘जोश’ साहब अपनी पहले कही हुई किसी गलत बात का खण्डन करने लगते हैं एक ओर वे साम्यवाद को मानव-मुक्ति का एकमात्र साधन मानते हैं, तो दूसरी ओर यंत्र पर हल को और नागरिक जीवन पर ग्रामीण जीवन को प्रधानता देते हैं। ज्ञान को स्त्री के सौन्दर्य की मृत्यु और स्त्री को पुरुष की कामतृप्ति का एक साधन-मात्र सिद्ध करते हैं।
‘जोश’ साहब के विचारों का यह परस्पर विरोध उनकी पूरी शायरी में मौजूद है और इसकी गवाही देते हैं ‘अ़र्शोफ़र्श’ (धरती-आकाश) ‘शोला-ओ-शबनम (आग और ओस) संबलों-सलासिल (सुगन्धित घास और ज़ंजीरें) इत्यादि उनके कविता-संग्रहों के नाम। और उनकी निम्नलिखित रूबाई से तो उनकी पूरी शायरी के नैन-नक्श सामने आ जाते हैं;
झुकता हूँ कभी रेगे-रवाँ1 की जानिब,
उड़ता हूँ कभी कहकशाँ2 की जानिब,
मुझ में दो दिल हैं, इक मायल-ब-ज़मीं3,
और एक का रुख़ है आस्माँ की जानिब।
—————————————————-
1. बहती हुई रेत, 2. आकाश-गंगा, 3. धरती की ओर जिसका रुख़ है।
—————————————————-
‘जोश’ की इस परस्पर-विरोधी प्रवृत्ति को समझने के लिए आवश्यक है कि उस वातावरण को जिसमें उनका पालन-पोषण हुआ और उन सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों को जिनमें शायर ने अपनी आँख खोली, सामने रखा जाए, क्योंकि मनुष्य का सामाजिक बोध सदैव समाज की परिवर्तनशील भौतिक परिस्थितियों ही से रसपान करता है और वह चीज़ जिसका नाम घुट्टी है, मनुष्य के जीवन में बहुत महत्त्व रखती है।
शबीर हसन खां जोश का जन्म 5 दिसम्बर, 1894 ई. को मलीहाबाद (जिला लखनऊ) के एक जागीरदार घराने में हुआ। परदादा फ़कीर मोहम्मद ‘गोया’ अमीरुद्दौला की सेना में रिसालदार भी थे और साहित्यक्षेत्र के शहसवार भी। एक ‘दीवान’, (ग़ज़लों का संग्रह) और गद्य की एक प्रसिद्ध पुस्तक बस्ताने-हिकमत यादगार छोड़ी। दादा मोहम्द अहमद खाँ ‘अहमद’ और पिता बशीर अहमद ख़ाँ ‘बशीर’ भी अच्छे शायर थे। यों जोश ने उस सामन्ती वातावरण में पहला श्वास लिया जिसमें काव्यप्रवृत्ति के साथ साथ घमंड स्वेच्छाचार, अहं तथा आत्मश्लाघा अपने शिखर पर थी। गाँव का कोई व्यक्ति यदि तने हुए धनुष की तरह शरीर को दुहरा करके सलाम न करता था तो मारे कोडों के उसकी खाल उधेड़ दी जाती थी। (स्वयं जोश भी एक शरीर पर अपनी मज़बूत छड़ी आज़मा चुके हैं) ज़ाहिर है कि जन्म लेते ही ‘जोश’ इस वातावरण से अपना पिंड न छुड़ा सकते थे, अतएव उनमें भी वही ‘गुण’ उत्पन्न हो गए जो उनके पुरखों की विशेषता थी। अपने बाल्यकाल के सम्बन्ध में स्वयं उनका कहना है कि :
‘‘मैं लड़कपन में बहुत बदमिज़ाज था। गुस्से की हालत यह थी कि मिज़ाज के ख़िलाफ़ एक ज़रा बात हुई नहीं कि मेरे रोयें-रोयें से चिंगारियों निकलने लगती थीं। मेरा सबसे प्यारा शग़ल यह था कि एक ऊँची-सी मेज पर बैठकर अपने हम-उम्र बच्चों को जो जी में आता अनाप-शनाप दर्स (पाठ) दिया करता था दर्स देते वक़्त मेरी मेज़ पर एक पलती-सी छड़ी रखी रहती थी और जो बच्चा ध्यान से मेरा दर्स नहीं सुनता था, उसे मैं छड़ी से इस बुरी तरह पीटता था कि बेचारा चीख़े मार-मार कर रोने लगता था मादी हैसियत (आर्थिक रूप) से वह मेरी इन्तहाई फ़ारिग़ उल्बाली (सम्पन्नता) का ज़माना था। घर में दौलत पानी की तरह बहती थी। इस पर हाकिम होने का तनतना भी था।’’ इस वातावरण में पला हुआ रईसज़ादा जिसे नई शिक्षा से पूरी तरह लाभान्वित होने का बहुत कम अवसर मिला1 और जिसके स्वभाव में शुरू ही से उद्दण्डता थी, अत्यन्त भावुक और हठी बन गया। युवावस्था तक पहुँचते-पहुँचते उनके कथनानुसार वे बड़ी सख्ती से रोज़े-नमाज़ के पाबंद हो चुके थे। नमाज़ के समय सुगन्धित धूप जलाते और कमरा बन्द कर लेते थे। दाढ़ी रख ली और चारपाई पर लेटना और मांस खाना छोड़ दिया था और भावुकता इस सीमा पर पहुँच चुकी थी कि बात-बात पर उनके आँसू निकल आते थे। ऐसी अवस्था में एकाएक यह होता है कि :
‘‘मेरी नमाज़ें तर्क हो गईं2। दाढ़ी मुँढ़ गई, आँसू निकलना बन्द हो गए और अब मैं इस मंज़िल पर आ गया जहाँ हर पुराना एतिकाद (विश्वास) और हर पुरानी रिवायत (परम्परा) पर एतिराज़ करने को जी चाहता है और एतिराज़ भी अहानत-आमेज़ (अपमानजनक)।’’
इस मंजिल पर पहुँचकर उनकी भावुकता ने उनके सामाजिक सम्बन्धों पर कुठाराघात किया। उन्होंने अपने पिता से विद्रोह किया।3

1. जोश ने घर पर उर्दू फारसी की पाठ्य पुस्तकें पढ़ीं। फिर अंग्रेजी शिक्षा के लिए सीतापुर स्कूल, जुबली स्कूल लखनऊ और सेंट पीटर कॉलेज आगरा और अलीगढ़ में भी प्रविष्ट हुए, लेकिन पूरी तरह कहीं भी न पढ़ सके।
अपनी शायरी के लटके बारे में वे कहते हैं कि मैंने नौ बरस की उम्र से शेर कहना शुरू कर दिया था। शेर कहना शुरू कर दिया था’-यह बात मैंने खिलाफ़े-वाक़ेआ और ग़लत कही है। क्योंकि यह किसी इन्सान की मज़ाल नहीं कि वह खुद से शेर कहे। शेर अस्ल में कहा नहीं जाता, वो तो अपने को कहलवाता है। इसलिए यही तर्ज़े-बयान अख़्तियार करके मुझे यह कहना चाहिए कि नौ बरस की उम्र से शेर ने मुझसे अपने को कहलावाना शुरू कर दिया था। जब मेरे दूसरे हम-सिन (समवयस्क) बच्चे पतंग उड़ाते और गोलियाँ खेलते थे, उस वक़्त किसी अलहदा गोशे (एकान्त स्थान) में शेर मुझसे अपने को कहलवाया करता था।’’
2. छूट गई
3. ‘‘मेरे पिता ने बड़ी नर्मी से मुझे समझाया, फिर धमकाया, मगर मुझ पर कोई असर न हुआ। मेरी बग़ावत बढ़ती ही चली गई। नतीजा यह हुआ कि मेरे बाप ने वसीयतनामा लिखकर मेरे पास भेज दिया कि अगर अब भी मैं अपनी जिद पर कायम रहूँगा तो सिर्फ 100 रुपये माहवार वज़ीफ़े के अलावा कुल ज़ायदाद से महरूम कर दिया जाऊँगा लेकिन मुझ पर इसका कोई असर न हुआ’’।
पूरे परिवार से विद्रोह किया। धर्म, नैतिकता, राज्य, समाज, भगवान् अर्थात् हर उस चीज़ से विद्रोह किया जो उन्हें अपनी प्रकृति के प्रतिकूल प्रतीत हुई; और विद्रोह का यह प्रसंग इतनी कटुता धारण कर गया कि कई अवसरों पर उन्होंने केवल विद्रोह के लिए विद्रोह किया और स्वयं को सर्वोच्च समझकर :
दूसरे आलम1 में हूँ, दुनिया से मेरी जंग है।
ऐसा दो टूक फ़ैसला दिया और आत्मगौरव को इस सीमा तक ले गए :
हश्र2 में भी ख़ुसरवाना शान से3 जायेंगे हम
और अगर पुरसिश4 न होगी तो पलट आयेंगे हम
——————————————
1. संसार 2. प्रलय के समय भगवान के सामने 3. बादशाही शान से 4. आव-भगत।
——————————————
उस समय उनकी आयु 23-24 वर्ष की थी जब उन्होंने पहले ‘उमर ख़य्याम’ और फिर ‘हाफ़िज़’ की शायरी का अध्ययन किया। फ़ारसी भाषा के ये दोनों महान कवि अपने काल के विद्रोही कवि थे। थोड़े से भेद के साथ दोनों अपने समय के नैतिक तथा धार्मिक सिद्धान्तों को ढकोसला समझते थे और मनुष्य को इस ढकोसलों से स्वतंत्र होकर समस्त सांसारिक आनन्दों से आनन्दित होने का उपदेश देते थे (मादिरापान को उन्होंने विशेष महत्त्व दिया)। उनके विचार में जीवन के जो क्षण मनुष्य को प्राप्त हैं, वही उसके अपने हैं और उसे चाहिए कि उन क्षणों को अधिक-से-अधिक प्रसन्नतापूर्वक जिये। जोश को ये सिद्धान्त अपनी विद्रोही प्रकृति के ठीक अनुकूल जँचे और उन्होंने इन सिद्धान्तों को ज्यों-का-त्यों अपना लिया। उमर ख़य्याम और हाफ़िज़ के सिद्धान्तों ही को नहीं, जहाँ से और जब भी उन्हें अपनी प्रकृति के अनुकूल सिद्धान्त मिले वे उनके व्यक्तित्व और फिर उनकी शायरी का अंग बन गए। अध्ययन का अवसर मिला तो वे मिल्टन, शैले, बायरन और वर्डजवर्थ से भी प्रभावित हुए और आगे चलकर गेटे, दांते, शॉपिनहार, रूसों और नित्शे से भी। विशेषकर नित्शे से वे बुरी तरह प्रभावित हुए। नित्शे, गेटे के बाद वाली पीढ़ी का
दार्शनिक साहित्यकार था, जिसने जर्मनी में एक जबरदस्त राज्य और केन्द्रीय शक्ति का समर्थन किया और महामानव (Super Man) का ऐसा आदर्श चित्र खींचा जो शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, राजनैतिक, सामाजिक अर्थात समस्त प्रकार की महान् शक्तियों का संग्रह तथा प्रतिरूप हो; जो ऊपर के वर्ग का प्रतिनिधि हो और जन-साधारण के अधिकारों की उपेक्षा करके शक्ति को अपनी मंजिल बन सके।1 उसने हर प्रकार के नैतिक सिद्धान्त अहिंसा और समानता को अस्वीकार किया। ईश्वर की सत्ता से इन्कार किया। संसार में सबसे अधिक महत्त्व ‘मैं’ (अंह को दिया और स्त्री को पुरुष की सेवा और मनोविनोद का एक साधन सिद्ध किया। प्रत्यक्ष है कि ‘जोश’ की विद्रोही प्रकृति का इस प्रकार के सिद्धान्तों से कितना सीधा सम्बन्ध हो सकता था। उन्होंने नित्शे के हर विचार को अपनी नीति और नारा बना लिया और अपनी हर रचना पर बिस्मिल्लाह ख़ुदा के नाम से शुरू करता हूँ’) के स्थान पर ब-नामे कुब्वतों बयात (शक्ति तथा जीवन के नाम’) लिखना शुरू कर दिया।
उमर ख़य्याम हाफ़िज़ और नित्शे से प्रभावित होने के अतिरिक्त देश की राजनैतिक परिस्तिथियों ने भी उन पर सीधा प्रभाव डाला और उनकी विद्रोही प्रवृत्ति को बड़ी शक्ति मिली। अतएव जब उन्होंने :
अलअमानो-अलहज़र2 मेरी सड़क मेरा जलाल3
ख़ून, सफ़्फ़ाकी4 गरज, तूफ़ान, बरबादी, क़िताल5
बरछियाँ, भाले, कमानें, तीर, तलवारें, कटार
बरक़ी6 परचम,7 अलम,8 घोड़े, पियादे, शहसवार
आँधियों से मेरी उड़ जाता है दुनिया का निज़ाम9
रहम का एहसास है मेरी शरीअत10 में हराम
————————————–
1. शक्ति प्राप्त करो और प्रत्येक नैतिक सिद्धान्त को ठुकरा दो चाहे इसके लिए तुम्हें कितने ही दुर्बल व्यक्तियों को कुचलना पड़े…’’ (नित्शे)
2. ख़ुदा की पनाह
3. तेज़
4. हिंसा, मारकाट
5. युद्ध
6. बिजली की-सी शक्ति (तेज़ी) रखने वाले
7, 8.पताका,
9. व्यवस्था
10. धर्म
——————————————-
मौत है ख़ुराक मेरी, मौत पर जीती हूँ मैं
सेर होकर1 गोश्त खाती हूँ लहू पीती हूँ मैं (‘बग़ावत’)
ऐसी भयानक नज़्में लिखना शुरू की तो देश की जनता ने, जो अंग्रेजी राज्य में बुरी तरह पिस रही थी, देश की स्वतंत्रता के लिए मिट रही थी, मिटमिट कर उभर रही थी और परतंत्रता तथा अंग्रेजों के प्रति घृणा के हर बोल को छाती से लगा रही थी, ‘‘जोश के नारों को उठा लिया। वह बड़ा हंगामों भरा ज़माना था। इधर भारत अंग्रेजी साम्राज्य की जंजीरों में जकड़ा हुआ स्वतंत्रता के लिए प्रयत्नशील था। उधर रूस की क्रान्ति के बाद एक नया जीवन दर्शन पूरे संसार को अपनी ओर आकृष्ट कर रहा था। अंग्रेजों ने इस नये जीवन दर्शन का वास्तविक रूप रंग भारत तक नहीं पहुँचने दिया और न उस समय भारत में श्रमजीवियों की कोई ऐसी संगठित संस्था थी जो वर्गवाद के प्रकाश में उस स्वतंत्रता आन्दोलन और उस नये जीवन दर्शन का विश्लेषण करके क्रान्तिकारी नेतृत्व कर सकती।
अतएव इंक़िलाब को जिसके अर्थ सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तन के हैं, स्वतंत्रता के अर्थों में लिया गया और शायरे बगावत ‘जोश’ को शायरे इंकिलाब की उपाधि दे दी गई।
‘जोश’ के सही साहित्यिक स्थान को समझने में सरदार ज़ाफ़री (उर्दू के प्रसिद्ध शायर और आलोचक) के कथानुसार सबसे बड़ी भूल शायरे इंक़िलाब की उपाधि से होती है। इंक़िलाब का शब्द आज के आलोचकों की दृष्टि को गलत मार्ग पर डाल देता है और वे जोश से ऐसी आशाएँ बाँधने लगते हैं जो उनकी शायरी पूरी नहीं कर सकती। जोश की सीधी सादी ऐजीटेशनल नज़्मों को, जिन्होंने निःसन्देह अपने काल में बहुत बड़ी कार्यपूर्ति की है, भूल से क्रान्तिकारी नज़्मों का नाम दिया गया2। यह भूल केवल राष्ट्रीय और विद्रोही नज़्मों तक ही सीमित नहीं रही; ‘जोश’ की बहुत-सी
1. पेट भरकर,
2. ‘ईस्ट इण्टिया कम्पनी के फ़रज़न्दों के नाम’ ‘वफ़ादाराने-अज़ली का पयाम-शहनशाहे हिन्दोस्तान के नाम शिकस्ते जिन्दाँ का ख्वाब ऐसी नज़्मों की हज़ारों प्रतियाँ छापकर चोरी-छिपे बाँटी गईं, लाखों ज़बानों पर आईं और बहुत-से लोग स्टेज पर ये नज़्में पढ़ने के कारण गिरफ़्तार हुए। यहाँ यह चर्चा असंगत न होगी कि इस प्रकार की नज़्मों से जिन्हें कला की महान् कसौटी पर परखते समय भावी आलोचक शायद रद्द कर देगा) जोश ने उर्दू शायरी में एक नई प्रकार की लड़ाकू (Militant) शायरी की नींव डाली है ‘जोश’ से पहले स्वर कह यह घन-गरज, पहाड़ी-झरनों की-सी तीव्र गति उर्दू के किसी शायर को नसीब नहीं हुई
क्रान्तिवादी नज़्मों को समझने में भी भूल की गई है। क्रान्तिकारी शायरी में और क्रान्तिकारी शायरी में थोड़े-से हेर-फेर के साथ वही अन्तर है जो यथार्थवाद और रोमांसवाद में है। ‘जोश’ क्रान्तिकारी नहीं रोमांसवादी शायर हैं और उनकी क्रान्ति की सद्भावना भी शत प्रतिशत रोमांसवादी है। यह उद्भावना चूँकि देश-प्रेम तथा देश-स्वतन्त्रता की उत्कट भावना से उत्पन्न हुई, इसलिए जरा-सी चोट लगने पर भड़ककर वे आवेग में आ जाते हैं।
निर्माण पर विनाश को प्रधानता देते हैं। क्रान्ति को सुन्दर कम और भयंकर अधिक दर्शाते हैं। और यही कारण है कि उनकी इस प्रकार की शायरी में उबाल और गर्मी तो हैं, गंभीरता और प्रकाश नहीं। पूँजीपति, मज़दूर और किसान का नाम लेकर वे अपनी छाती कूटते हैं। अपनी घन-गरज से रास्ते के दर्शकों को एकत्र कर लेते हैं और एक ऊँचे स्थान पर खड़े होकर नारा लगाते हैं और इस प्रकार बेचैन होकर गाली देने की उनकी भावना शेर का रूप धारण कर लेती है। लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि आज यदि क्रान्ति की व्याख्या बहुत स्पष्ट हो चुकी है और हम अधिक विश्वास के साथ खरे और खोटे की पहचान कर सकते हैं तो लगभग आधी शताब्दी तक पूरी-की-पूरी पीढ़ी को प्रभावित करने वाले इस शायर की शायरी अपने स्थान से डिग गई है। क्योंकि यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है कि किसी काल की अराजकता तथा अव्यवस्था के विरुद्ध घृणा का नकारात्मक भाव ही, जिसमें, अनिवार्य रूप से संकीर्णता शामिल हो जाती है, आगे चलकर स्वीकारात्मक रूप धारण करता है; और वह घृणा आप-ही-आप वैज्ञानिक सिद्धान्तों में ढल जाती है।

 

लेनिन ने टाल्सटाय के सम्बन्ध में कहा था कि टाल्स्टाय रोमांसवादी है लेकिन उसने रूसी किसान के दुखों को बहुत निकट से देखा और समझा है अतएव उसके साहित्य से रूस की क्रान्ति को पूरी एकशताब्दी की मंज़िल तै करने में सहायता मिली है। ठीक यही बात ‘जोश’ की शायरी के बारे में कही जा सकती है। वास्तविक रूप से क्रान्तिकारी शायरी न होने पर भी ‘जोश’ की शायरी ने क्रान्ति के लिए न केवल मार्ग बनाया है बल्कि हज़ारों लाखों नौजवानों को क्रान्ति संग्राम के लिए तैयार किया है। अपनी शायरी द्वारा उन्होंने भारतीय राष्ट्र को अंग्रेज़ी राज्य तथा साम्राज्य के विरुद्ध उभारा, प्रतिक्रियावादी संस्थाओं का भंडाफोड़ किया। मूढ़ता, धर्मोन्माद अन्धविश्वास और परम्परागत नैतिकता की जंजीरें काटीं। अतएव उनकी इस प्रकार की नज्में आज भी हमारा लहू गरमा देती हैं और उनके अध्ययन से अपने देश, अपनी जाति, अपनी सभ्यता संस्कृति तथा अपने साहित्य से हमारा प्रेम दुगना हो जाता है।

***

अनिल जनविजय 

Be the first to comment

Leave a Reply