बांगलादेश गतिशील लेखक संघ के ढाका में हुए तृतीय राष्ट्रीय सम्मेलन में उद्घाटन सत्र में दिया गया वक्तव्य.

  • बांगलादेश गतिशील लेखक संघ के ढाका में हुए  तृतीय राष्ट्रीय सम्मेलन में उद्घाटन सत्र में दिया गया वक्तव्य :  श्री नथमल शर्मा .

स्थान- ढाका विश्वविद्यालय का सभागार । दिनांक 15 मार्च 2019 

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सबसे पहले आप सबको प्रगतिशील लेखक संघ भारत की तरफ़ से मुबारकबाद और शुभकामनाएं । अपनी बात शुरू करने के पहले कहना चाहता हूँ यह महीना आप सबके लिए बेहद खास है । सिर्फ़ दस दिन बाद इसी महीने की 26 तारीख को आपका स्वतंत्रता दिवस है । जश्न ए आज़ादी की अग्रिम बधाई और शुभकामनाएं स्वीकार करें । 

  गंगा, जमुना पद्मा और मेघना नदियों की धारा एक होती है यहाँ। हिंदुस्तान की गंगा की धारा यहां आते ही पद्मा हो जाती है और जमुना की धारा बन जाती है मेघना । यानी भारत और बांग्लादेश की मिट्टी एक है ।पानी एक है । इसीलिए तो हम दोनों मुल्कों की मोहब्बत, दोस्ती बेमिसाल है । दोस्तों यूं तो पूरी दुनिया की मिट्टी में एक सी सोंधी खुशबू है । दुनिया की सारी नदियां मिलकर इस धरती को जीवन देती है । हम ही है जो लगातार मिट्टी से दूर हुए जा रहे हैं । अपनी जड़ों से दूर हुए जा रहे हैं । याद तो करें कि कितने दिनों या बरसों से हमने अपनी मिट्टी को नहीँ छुआ । जरा याद कीजिये कि पिछली बार कब आपने मिट्टी अपने हाथ में ली थी ।

       यही तो याद दिलाना चाहता है साहित्य । लेखक वही जो मनुष्य को मनुष्य बने रहने देने की ताकत दे । पूरी दुनिया में शांति हो ।एक शोषण रहित समाज कैसे बने ? समाज में सद्भाव और भाईचारा कैसे कायम हो? साहित्यकार की यह पहली जिम्मेदारी है ।इंसान और इंसानियत को बनाए और बचाए रखना ही तो आज की सबसे बड़ी चुनौती है । और यह सिर्फ भारत या बांगलादेश के सामने ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सामने यही चुनौती है । कार्पोरेट कल्चर से उपजी आवारा पूंजी और क्रोनी कैपेटिलिज्म ने इस चुनौती को और बढाया ही है । नाम चोमस्की जब इस आवारा पूंजी के खतरे की तरफ़ इशारा करते हैं तो कार्पोरेट अमरीका की नज़र मे वे सबसे खतरनाक लगते हैं । यह चुनौति है । साहित्यिक बिरादरी के सामने आज गंभीर सांस्कृतिक चुनौतियां हैं । हमारा लोक जीवन कहाँ हैं ? हम सब देख ही रहे हैं कि पिछले कुछ बरसों में समाज में भारी असमानता बढ़ी है ।हम सिर्फ गरीब या ग़रीबी को ही नहीं देखें बल्कि अमीरतम लोंगो को भी तो देखें ।और देख कर थोड़ा गुस्सा करना, थोड़ा बोलना भी तो सीखें । “मुझे क्या करना है ” वाला भाव लिए पिछले कुछ बरसों में एक चुप समाज की ही निर्मिति हुई है । 

 

     सज्जाद  जहीर और महान लेखक प्रेमचंद को आप जानते ही हैं । इन्हे याद करने की जरूरत है जिन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की । प्रेमचंद ने कहा कि साहित्य कोई मनोरंजन का साधन नहीं । सोद्देश्य साहित्य वही है जो समाज की पीड़ा, आम आदमी का दर्द व्यक्त करे । सवालों से जूझते हुए संघर्ष का रास्ता तैयार करे । न केवल रास्ता तैयार करे बल्कि उस पर चलने के लिए प्रेरित भी करे । गांधी की अहिंसा और बंग बंधु मुजीब साहब की हक की लड़ाई के रास्ते की भी जरूरत है ।

     तो दोस्तों चुनौतियां बहुत गंभीर है, ऐसे भयावह समय में साहित्यकार की रचनात्मकता से ही समाज को शक्ति मिलेगी , रास्ता मिलेगा ।

 शायर निदा फाजली की बात याद आती है –

  *जिन चिरागों को*
*हवाओं का कोई खौफ नहीं* 

*उन चिरागों को*
*हवाओं से बचाया जाए*

      दोस्तों इस गंभीर और खतरनाक समय में जब पीने का साफ पानी,  शिक्षा और स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे सवाल हाशिए पर कर दिए गए हैं । सारी ताकत और उम्मीद युवाओं से होने के बावजूद उन्हें एक मशीन में बदला जा रहा है । कम्प्यूटर लेबर बनाया जा रहा है । षडयंत्र के तहत विचारों और किताबों की दुनिया से इन्हें दूर किया जा रहा है ।  क्रूर कार्पोरेट कल्चर ने पूरी दुनिया को जैसे बाजार में बदल दिया है ।और बाज़ार का तो एक ही उसूल होता है सिर्फ मुनाफा कमाना । वहां संवेदनाओं की कद्र नहीं होती । उसकी निर्ममता में प्रेम के लिए कोई स्थान नहीं । वहां चिड़िया की चहचहाट या झरनों का शोर कोई नहीं सुनना चाहता । ऊगते सूरज की पहली किरण से कोई नहीं मिलना चाहता ।  लेखकों, साहित्यकारों को इन सवालों से टकराना है ताकि हाशिए के समाज की आवाज़ बन सके । इस खतरे की तरफ़ इशारा करते हुए महान् कवि काजी नजरुल इस्लाम ने एक कविता में कहा था —

*सुनो मूर्खों* 
*मनुष्य से घृणा करके कौन लोग* 
*कुरान, वेद,बाइबिल को चूम रहे हैं बेतहाशा* 
*किताब और ग्रंथ छीन लो जबरन उनसे*
*मनुष्य को मारकर*
*ग्रंथ पूज रहा है ढोंगियों का दल*
*सुनो मूर्खों*
*मनुष्य ही लाया है ग्रंथ*
*ग्रंथ नहीं लाया किसी मनुष्य को* 

         दोस्तों बातें बहुत है । बहुत कुछ कहा जा सकता है पर वक्त की पाबंदी भी है । बहुत वक्त ले लिया आपका । एक बार फिर आप सबको प्रगतिशील लेखक संघ भारत की तरफ़ से शुभकामनाएं और बधाई और प्रगतिशील लेखक संघ बांगला देश के प्रति विनम्र आभार कि आपने हमें इस अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सम्मेलन में आमंत्रित किया । भारत से हम दो लेखक साथी मैं और संगीता देवानजी आए हैं । ढाका के इस सम्मेलन में शामिल होना हमारे लिए गर्व की बात है । उम्मीद है कि यह हमारी दोस्ती को और मज़बूत करेगा । 

      आइये साथियों इस चुनौतीपूर्ण समय से निपटने के लिए, लड़ने की तैयारी के साथ संकल्प लें और अपनी रचनाधर्मिता को धार दें ।
महान शायर साहिर लुधियानवी की बात याद आती हैं  –
*आओ कि ख्वाब बुनें कल के वास्ते*
*वरना यह हंसी रात गुजर न जाए कहीं* ।

जय भारत-जय बांगलादेश । 

 नथमल शर्मा
महासचिव   

  प्रगतिशील लेखक संघ भारत 
  छतीसगढ इकाई

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