(अंग्रेजी मूल से राजेन्द्र सायल द्वारा अनुवादित)
rajendrasail@gmail.com

An Open Letter
From Indira Jaising to the Chief Justice of India on Women’s Day)

“न्यायपालिका को हमारी भाषा में (बोली और न्यायिक दोनों में) महिलाओं के प्रति अपमानजनक प्रवृत्तियों को विवेकपूर्ण तरीके से ख़त्म करना चाहिए.”

“The judiciary must consciously eliminate derogatory tendencies towards women in our (spoken and judicial) language.”

प्रति,
भारत के मुख्य न्यायाधीश
मार्च 8, 2019

प्रिय महोदय,

वकालत का पेशा उसकी भाषा, उसकी विवेचना और उसके सामाजिक-राजनितिक माल-असबाब की ताकत पर काफी निर्भर करता है. भाषा ही हमारा हथियार और ढाल है, हम अपने शब्दों के इस्तमाल से उद्देलित होते हैं, और हम अपने गारंटीकृत अधिकारों में सुरक्षा की तलाश करते हैं.

जैसा कि डेबोरा कैमेरून (Deborah Cameron) ने कहा,

“सेक्सिस्ट भाषा हमें वही सिखाती है जो उसका इस्तमाल करते और उसे प्रसारित करते हैं कि महिलाओं की जगह क्या होनी चाहिए: दूजे-दर्जे की नागरिक, जिन्हें न देखा व् सुना जाए, अनंत-यौन-भोग-वस्तु और बुराई की अवतार.”

“Sexist language teaches us what those who use it and disseminate it think women’s place ought to be: second-class citizens, neither seen nor heard, eternal sex-objects and personifications of evil.”

इस नज़रिए से देखा जाए तो सेक्सिस्ट भाषा ही हिंसक है.
हमारे पेशे में सबको यह याद दिलाने की ज़रुरत है कि अदालत के कमरों के भीतर और बाहर जिस ताकत का इस्तमाल जिन शब्दों के बल-बूते पर हम करते हैं उन्हें हिंसा को प्रकट न करने के लिए लुप्त कर देना चाहिए.

भाषा, महज़ एक प्रसार माध्यम नहीं है, इससे भी बढ़कर है. यह सहज ज्ञान-युक्त सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनितिक सूचक है, जो किसी भी समाज के प्रचलित दृष्टिकोण और लोकाचार को दर्शाता है. तो, जब भी भाषा में “लिंग आधारित पक्षपात” (“gender bias”) की हम बात करते हैं, तो हम निश्चित ही श्रेष्ठ-हीन प्रतिमान (superior-inferior paradigm) की ओर इंगित करते हैं, जो लिंग-भेद के कारण पनपा है.

जेंडर एक सामाजिक संरचना है, जो रूढ़िबद्ध धारणा/स्टीरियोटाइप (stereotypes), लेबल और नैतिक चरित्र विशेषताओं (moral character attributes) की भारी गठरी के बोझ तले दबा हुआ है. हमारे देश का संविधान “लिंग” आधारित भेद-भाव (discrimination based on “sex”) से हम सभों की रक्षा करता है, और इस माननीय न्यायालय ने यह मान लिया है कि लैंगिक रूढ़िवाद (gender stereotypes) को बनाए रखना इसी तरह का भेदभाव है.

मेरी कई वर्षों की वकालत के दौरान तमाम ऐसी घटनाएं घटित हुई हैं जब जजों ने वकीलों द्वारा सेक्सिस्ट टिपण्णी को नज़रंदाज़ किया है. अदालत में इस तरह सेक्सिस्ट भाषा की मौन स्वीकृति और उसे यह कहकर नज़रंदाज़ कर देना कि “इसमें किसी को चोट पहुँचाने का इरादा नहीं था” (“didn’t mean any harm”), इन गैर-कानूनी बातों को एक हद तक बैधता प्रदान करती हैं, और ऐसा करके एक जज अनुच्छेद 15 के तहत सुनिश्चित मौलिक अधिकार की रक्षा करने के अपने कर्तव्य में असफल साबित होते हैं, अगर वे अपने कोर्ट रूम में सेक्सिस्ट भाषा, टीका-टिपण्णी के उपयोग पर न तो असहमति जताते हैं और न ही उसे निष्कासित करते हैं.

अभी हाल ही में, कोर्ट रूम में एक वरिष्ट पुरुष वकील ने मुझे एक “पत्नी” (“wife” ) के रूप में सम्बोधित किया; न तो मेरे नाम से और न ही एक अधिवक्ता के रूप में, हालांकि मेरे विरोध करने पर उन्होंने अपनी गलती तुरंत सुधार ली. और वह भी जब मेरे अधिवक्ता ने आपत्ति दर्शाई कि “यह एक सेक्सिस्ट टीका है”. न्यायाधीश ने इस पर कतई कोई आपत्ति नहीं उठाई. एक अन्य घटना का ज़िक्र करना चाहूंगी जब एक राष्ट्रीय टेलीविज़न में बहज़ के दौरान एक वकील ने एक साथी पेनेलिस्ट पर तंज़ कसते हुए कहा कि “अगर तुम इतने डरपोक हो, तो जा कर पेटीकोट और चूड़ियाँ पहन लो”. (“if you are afraid, go wear petticoats and bangles.”)

एक अन्य घटना है, जब मैं सुप्रीम कोर्ट में बहस कर रही थी, तो एक वरिष्ट पुरुष वकील ने मुझे “वो औरत” (“that woman”) कह कर संबोधित किया जब कि वे अपने सभी पुरुष साथियों को “मेरे विद्वान मित्र” (“my learned friend”) कह कर संबोधित कर रहे थे. और यह वाक्या उस समय हुआ जब मैं अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल (Additional Solicitor General) के पद पर थी, और सी.बी.आई. का प्रतिनिधित्व कर रही थी. मैं उम्मीद कर रही थी कि न्यायाधीश उन्हें इसके लिये फटकारेंगे. इसके बजाय जज मुस्कराते हुए इस पूरे हादसे का मज़ा ले रहे थे. जब मैंने ऐसी अपमानजनक भाषा से सुरक्षा की मांग की जो जज ने कहा “मैडम, आपको कोई भी सुरक्षा की ज़रुरत नहीं है, आप तो अति-संरक्षित हैं”. (“Madam, you don’t need any protection, you are overprotected”.)
यदि आप अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े होते हैं, आप समानता की मांग करते हैं, तो बेहतरी इसी में है कि आप मुस्कारिये और अपमान को सहन कीजिये.
अन्य मौकों पर, मुझे “उकतानेवाली” (Shrill) कहा गया, जब कि मेरे पुरुष सहकर्मी अदालत में पूरी तरह से आक्रामक होने के लिए ‘वीरता’ का प्रतीक (are valorized) माने जाते हैं. ऐसी बातें अन्दर-ही-अन्दर गहरी चोट पहुंचाती हैं. मैंने कई बार यह बात कही है और जो रिकॉर्ड में भी है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय में मुझे यौन उत्पीड़न (sexually harassment) का सामना करना पड़ा है, इसके बावजूद कि मेरे बाल सफ़ेद हैं, और बावजूद इसके कि कोर्ट के गलियारों में सी.सी.टी.व्ही. कैमरों की निगरानी है.

महिलाएं अपनी गरिमा के लिए सब से ज़्यादा कार्यस्थल पर सम्मान पाने की लालसा रखती हैं. पचास वर्षों से भी अधिक वकालत के दौरान मैंने अदालतों की संस्कृति में कोई भी सुधार नहीं पाया है, जो मुख्य रूप से पुरुष-प्रधान है. हालांकि इसमें महिलाएं बड़ी संख्या में मौजूद हैं, फिर भी सार्वजनिक प्रवचन में प्राय: अदृश्य हैं, जब तक कि वे किसी की पत्नी, घरेलु, बेटी या राजनैतिक रूप से उन ताकतों से न जुडी हों, जो सत्ताधारी हैं.

एक “जेंडर आधारित न्यायोचित” (“gender just”) और “समान” समाज की खोज में, राजनीतिक, सामाजिक या कानूनी बोल-चाल में पक्षपाती और गलत शब्दावली (misogynistic phraseology) का इस्तमाल करने, मनोरंजन के लिए या उसको पोसने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

देश भर की अदालतों के फैसले कानून-विधि (the law of the land) होने का दर्जा अख्तियार करते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से न्यायिक भाषा में ऐसे शब्दों और जुमलों का लगातार इस्तमाल होता है जो पितृसत्ता को अभी भी पालते-पोसते हैं, महिलाओं की कथित भूमिकाओं और व्यवहार के रूढ़िवादिता का समर्थन करते हैं, और ऐसे पूर्वाग्रहों को सुरक्षित रखते हैं जो हमारे समाज में महिलाओं की प्रतिष्ठा के लिए हानिकारक हैं.

इस शीर्ष अदालत के जजों ने एक फैसले में एक महिला को “रखेल” (“keep”). के रूप में संबोधित किया जो एक “लिव-इन सम्बन्ध” (live-in relationship) में थी. मैंने अपने लेखन में कई बार इस ओर इशारा किया है कि केवल गुलाम और सम्पति को ही “रखा” जा सकता (can be “kept”) है. अदालती फैसलों में ऐसे शब्दों और जुमलों की न केवल निंदा करनी चाहिए और उन्हें निष्कासित किया जाना चाहिए, लेकिन उनके उपयोग पर भी पाबन्दी लगाई जानी चाहिए. यही एकमात्र तरीका है जिससे ‘बार’ और ‘बेंच’ को जेंडर के मामले में संवेदनशील (a gender sensitive bar and bench) बनाया जा सकता है.
कानूनी भाषा या कानून की भाषा, न्यायपलिका जिसकी संरक्षक और अभिभावक है, एक राष्ट्र में स्वीकार्य कानूनी प्रवचन में समानता की भाषा का आदर्श स्थापित करने वाली होना चाहिए. एक लोकतंत्र में, कानूनी भाषा को इस बात से आंकना चाहिए कि यह लैंगिक न्याय के अधिकार सहित संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों और दायित्वों को कितनी स्पष्ट और प्रभावी ढंग से संप्रेषित करती है.
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मैं गुज़ारिश करती हूं और आपसे सक्रिय उपाय करने की याचना करती हूं ताकि आप यह सुनिश्चित करें कि कोर्ट रूम के अन्दर और बाहर देश भर के वकील और जज अपनी भाषा की लैंगिक संवेदनशीलता के प्रति ध्यान दें, और इसके लिए उन्हें चेताया जाये. याद रहे, आज कोई ७० वर्ष पूरे हो गए हैं जब संविधान के अनुच्छेद १५ के तहत देश में सभी लिंग के लोगों को बराबरी का दर्जा प्रदान किया गया है.

किसी भी सेक्सिस्ट रूढ़िवादिता को पनपाने के लिए कभी भी किसी को मुआफ नहीं करना चाहिए जो किसी भी सेक्स के व्यक्ति को नीचा दिखाती या बदनाम करती है, ख़ास कर अदालतों में, जो न्याय पाने के स्थान हैं.

न्यायमूर्ति डी.वाय. चंद्रचूड़ (Justice D.Y. Chandrachud) ने इस माननीय न्यायालय में नवतेज जोहर बनाम भारत संघ (2018) 10 1 एससीसी (Navtej Johar v. Union of India (2018) 10 SCC 1), के फैसले में अपना मिलता-जुलता मत प्रगट करते हुए लिखा है कि अनुच्छेद 15 (1) के तहत एक वर्ग विशेष के बारे में रूढ़ियों को बनाये रखना उस मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. इस फैसले के प्रासंगिक उद्धरण निम्नलिखित हैं:

“संवैधानिक मूल्यों के अंतर्गत एक भेदभावपूर्ण अधिनियम का परीक्षण किया जाएगा. एक भेदभाव संवैधानिक परीक्षण से नहीं बचेगा यदि वह किसी एक वर्ग के बारे में रूदिवादिता पर आधारित है और उसको पनपाता है, ऐसे आधारों पर जो अनुच्छेद १५ (१) में निषिद्ध है. यदि भेदभाव का कोई भी आधार, चाहें वह परोक्ष या अपरोक्ष हो, लिंग की भूमिका के बारे में रूडिवादी समझ पर आधारित हो, वह केवल लिंग के आधार पर अनुच्छेद 15 द्वारा निषिद्ध भेदभाव से अलग नहीं होगा. यदि कुछ विशेषताएं रूढ़िवादिता में जमीं हैं, और वे अनुच्छेद 15 (1) में निषिद्ध किसी भी आधार द्वारा समूहों के रूप में गठित लोगों के पूरे वर्गों के साथ जुडी हैं, जो भेदभाव करने के लिए एक स्वीकार्य कारण को स्थापित नहीं कर सकती हैं.”

सबरीमला मंदिर में प्रवेश के प्रकरण में भी न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इसी सिद्धांत को आगे भी बरक़रार रखा है, जो इंडियन यंग लाव्येर्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2018 SCC Online 1690) में निम्नलिखित है:

“यह सुझाना कि महिलाएं व्रतम नहीं रख सकतीं, उन्हें कलंकित करने और उन्हें कमज़ोर और कमतर इंसान होने के नाते स्टीरियोटाइप करना है. इस तरह के एक संवैधानिक न्यायालय को ऐसे दावों को मान्यता देने से इनकार करना चाहिए. ”

“To suggest that women cannot keep the Vratham is to stigmatize them and stereotype them as being weak and lesser human beings. A constitutional court such as this one, must refuse to recognise such claims.”

मैंने कुछ सुझाव देने की गुस्ताखी की है, और मुझे उम्मीद है कि आप उन पर विचार करेंगे.

• भारत के मुख्य न्यायाधीश के मार्गदर्शन में न्यायपालिका इस दिशा में पहल करते हुए एक जांच आयोग का गठन करे जो कोर्ट रूम की संस्कृति, भेदभावपूर्ण व्यवहार, क्रेच (crèche) और शौचालय जैसी सुविधाओं से लैस आधारिक संरचना की उपलब्धता का जेंडर ऑडिट करे, ताकि वकालत से जुडी महिलाओं की गरिमा, बचाव और सुरक्षा के साथ काम के अधिकार को सुनिश्चित किया जा सके.
• एक तथ्य-जांच समिति का गठन किया जाए जो फैसलों और नयायिक दस्तावेजों में पाए जाने वाली सेक्सिस्ट टिप्पणियों को चिन्हित कर सूचीबद्ध करे, और यह सुनिश्चित करे कि जजों और वकीलों द्वारा न्यायिक भाषा में ऐसे शब्दों और जुमलों के उपयोग वर्जित हों.

• यह जानने का सक्रिय प्रयास किया जाए कि क्या एक वकील ने जिसे वरिष्ट नेतृत्व के पद पर नियुक्त किया जा रहा है, या एक जज को पदोन्नत किया जा रहा है, ने अदालतों के अन्दर या सार्वजनिक जीवन में सेक्सिस्ट व्यवहार को मुआफ किया हो, या वह स्वम इसमें शामिल रहा है. ऐसे व्यक्ति को रोल मॉडल बनने का अवसर या एक अगुवा का पद नहीं दिया जाना चाहिए.

• देश भर के जजों को एक परिपत्र या अभ्यास के लिए दिशा-निर्देशों को जारी करें कि अदालतों के अन्दर वकील, वादीगण और अन्य कोई के भी द्वारा सेक्सिस्ट भाषा का उपयोग करने पर लगाम लगाई जा सके.

महोदय,

न्यायपालिका न केवल ऐसी शब्दावली को नकारने के लिए ज़िम्मेदार है लेकिन कानून के पढ़े जाने में, इसकी व्याख्या और स्पष्टीकरण में भी इसके उन्मूलन को सुनिश्चित करने के लिए ज़िम्मेदार है.
जैसा कि भाषा ही एक दौर में समय और संस्कृति की प्रतिध्वनि है, इसमें एक राष्ट्र के सोच-विचार को प्रभावित करने की और एक समाज की संस्कृति को ढालने की भी शक्ति है. न्यायपालिका को हमारी भाषा में (बोली और न्यायिक दोनों में) महिलाओं के प्रति अपमानजनक प्रवृत्तियों को विवेकपूर्ण तरीके से ख़त्म करना चाहिए.

प्रतीकात्मक तौर पर न्याय की देवी भले ही आँख पर पट्टी बांधे हो, लेकिन हममें से कोई भी टोकनवाद या प्रतीकों से समझौता नहीं करेगा।

आपको अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई के साथ!
शुभकामनाओं सहित,

इंदिरा जयसिंह 
(अंग्रेजी मूल से राजेन्द्र सायल द्वारा अनुवादित)
rajendrasail@gmail.com

Mobile: 98268-04519

यह ख़त सबसे पहले द लीफलेट में प्रकाशित हुआ था, जो Lawyer’s Collective का एक प्रकाशन हैं.
अंग्रेजी के मूल तो पढने के लिए देखें: https://theleaflet.in
C-68, II Floor, HARSHA ROAD, NIZAMUDDIN EAST, NEW DELHI – 110013 E-mail: theleaflet.in@gmail.com

इंदिरा जयसिंग
एक परिचय

सामाजिक आंदोलनों, खास कर नारी विमुक्ति आन्दोलनों में, इंदिरा जयसिंग एक जानी-पहचानी शक्सियत हैं. पेशे से वकील होने के नाते भोपाल गैस त्रसिदी के पीड़ितों की तरफ से इंदिरा जयसिंग ने अमरीका की बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड के खिलाफ उनके मुआवज़े के दावे के मुक़दमे में पैरवी की, मुंबई के फुटपाथ पर रहने वाले आवासहीनो का मुकदमा लड़ा जिन्हें शहर से उजाड़ देने का सरकारी कदम उठाया जा रहा था. एक पर्यावरणवादी होने के नाते इंदिरा जयसिंग ने सुप्रीम कोर्ट में तमाम मुख्य मुकदमों में पैरवी की है. पंजाब में हिंसा पर जन-पंचाटों से इंदिरा जयसिंग जुडी रहीं, जिनके ज़रिये सन 1979 से सन 1990 के बीच मुठभेड़ों में मारे गए लोगों, गायब किये गए लोगों के बारे में, और सामूहिक दाह संस्कार की जांच की गई. यूनाइटेड नेशन्स United Nations ने इंदिरा जयसिंग को दो अन्य विशेषज्ञों के साथ म्यांमार (Myanmar) के राखिने राज्य (Rakhine state) में रोहिंग्या मुसलामानों (Rohingya Muslims) के खिलाफ सुरक्षा बालों द्वारा कथित तौर पर की गई हत्याओं, बलात्कार और यातना की जांच के लिए तथ्यान्वेषी मिशन (fact-finding mission) पर नियुक्त किया था

सन 2018 में फार्च्यून पत्रिका (Fortune magazine) ने इंदिरा जयसिंग को दुनिया के 50 महानतम नेताओं में से 20 वें स्थान पर चुना था. सन 2009 में वे भारत की पहली महिला अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल के पद पर नियुक्त की गयीं. लाव्येर्स कलेक्टिव नामक एक गैर-सरकारी संगठन की संस्थापक हैं, जिसे भारत के गृह मंत्रालय का कोप का सामना करना पड़ा. वे भारत में एक शीर्ष सम्मान “पद्मश्री” (Padma Shri) से नवाज़ी गयीं, और उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं, जैसे कि “काम के स्थान पर लैंगिक उत्पीड़न” (Sexual Harassment at Workplace).

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