16.03.2019

मन्नू भंडारी जी चर्चित लेखिका हैं। कहानी, उपन्यास, नाटक, पटकथा उनके लेखन के विविध आयाम हैं। ‘यही सच है’, ‘मैं हार गई’, ‘अकेली’ ‘एक प्लेट सैलाब’, ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर’, ‘त्रिशंकु’ जैसी कहानियां हो या ‘आपका बंटी’, ‘महाभोज’ जैसे उपन्यास या फिर उनका नाट्य रूपांतरण,काफी चर्चित हुए हैं और आज भी पाठकों के पसन्द बने हुए हैं। ‘नयी कहानी’ आंदोलन के दौर की विशिष्टताओं से संपृक्त होते हुए भी उनकी रचनाओं की अपनी अलग पहचान रही है जो मानवीय संवेदना, मध्यमवर्गीय स्त्री के जीवन और विडम्बना, राजनीति के छल-छद्म, पारिवारिक जीवन के प्रेम और टूटन के चित्रण के उनके अपने ‘ढंग’ के कारण रेखांकित होती रही हैं।
उन्होंने अपनी आत्मकथा का शीर्षक ‘एक कहानी यह भी’ दिया है।

वैसे इसे प्रचलित अर्थ में आत्मकथा न कहकर ‘आत्मकथ्यान्श’ कहना उचित होगा, क्योकि इसमें उन्होंने अपने जीवन के सिलसिलेवार ब्यौरे न देकर केवल उन पहलुओं और घटनाओं का ही उल्लेख किया है जो उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को अधिक प्रभावित किया है अथवा उनके संवेदनात्मक व्यक्तित्व को। ख़ुद लेखिका ने इसे स्वीकार भी किया है “यह भी मेरी जिंदगी का एक टुकड़ा मात्र ही है, जो मुख्यतः मेरे लेखकीय व्यक्तित्व और मेरी लेखन यात्रा पर केंद्रित है”।अवश्य इनमें कुछ प्रभाव सकारात्मक है तो कुछ नकारात्म भी।

‌ हम सब का जीवन एक कहानी भी तो है; फिर एक कथाकार का जीवन! जो दूसरों के जीवन को तटस्थता से देखता रहा है, उम्र के एक पड़ाव पर अपने जीवन को तटस्थता से देखना आसान नही होता होगा।मन्नू जी ने इस बात पर जोर दिया है कि उन्होंने तथ्यों को बिना किसी तोड़-मरोड़ के एक आवेगहीन तटस्थता से लिखा है।आत्मकथा को पढ़ने से इस बात का अहसास भी हो जाता है कि जहां वे ‘दूसरे पक्ष’ को पूर्णता से नही जान पाए लगते हैं वहां वे उसके लिए स्पेस छोड़ कर चलते हैं।

हम सब अपने परिवेश के भी उपज होते हैं।हमारा परिवेश, घर-परिवार, पास-पड़ोस का हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में अहम भूमिका होती है।इनसे सतत अन्तःक्रिया से अचेतन रूप से हमारे हमारे व्यक्तित्व का निर्माण होते रहता है।इस संदर्भ में लेखिका ने अपने पिता का विशेष उल्लेख किया है।उनके पिता ‘विरुद्धों के सामंजस्य’ थे। एक तरफ उनमें असीम महत्वाकांक्षा थी; समाज मे व्यक्ति के विशिष्टता पर बल देते थे तो दूसरी तरफ बेहद क्रोधी और अहंवादी भी थे।लेखिका के अनुसार इसका महत्वपूर्ण कारण निरन्तर गिरती आर्थिक स्थिति भी थी। पिता के विपरीत उनकी मां बेपढ़ी-लिखी ‘परम्परागत घरेलू स्त्री’ थी; जिनकी अपनी कोई इच्छा नही थी।जिनके लिए ‘घर’ ही सबकुछ था।

लेखिका के अनुसार माँ का निहायत असहाय मजबूरी में लिपटा त्याग कभी उनका आदर्श नही बन सका। इसे नये दौर के आहट के रूप में समझा जा सकता है जहाँ स्त्री अपने अस्मिता के प्रति क्रमशः जागरूक होते गयी।

कालेज के दिनों में लेखिका अपनी अध्यापिका शीला अग्रवाल से काफी प्रभावित हुई, जिन्होंने उसे सार्थक पढ़ने तथा अपने अस्मिता के प्रति जागरूक होने मे मदद की।इसी तरह उनकी दीदी शीला तथा पुष्पमयी घोष का चरित्र है जिनसे उन्हें काफी सहयोग मिला। आगे भी पारिवारिक तथा लेखकीय जीवन मे विभिन्न व्यक्तियों से मिलने वाले सहयोग का उन्होंने कृतज्ञता और प्रेम से याद किया है जिनमे उनके उम्र से बड़े-छोटे सभी हैं।

लेखकीय जीवन की शुरुआत भी बहुत ‘सामान्य’ ढंग से, अमूमन अन्य लेखकों की तरह ही हुई। अपनी पहली कहानी ‘नयी कहानी’ पत्रिका में भेजी, जो आशा के विपरीत स्वीकृत हो गयी।फिर धीरे-धीरे पहचान बनती गई। इस सारे उपक्रम में मन्नू जी बेहद सहज और संयत ढंग से व्यवहार करती दिखाई देती हैं। उपलब्धि की चाह अवश्य है मगर आसमान में नही उड़तीं। इस समय नयी कहानी आंदोलन शिखर पर था और राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश इसके कर्ताधर्ता थें। इनकी अपनी रचनात्मक उपलब्धियां तो थी ही मगर बकौल लेखिका पुरानी पीढ़ी को ‘ध्वस्त’ करने के उपक्रम में भी लगे रहते थे। धीरे-धीरे इनके अपने अंतर्विरोध उभरने लगे। प्रतिस्पर्धा ‘ईर्ष्या’ तक पहुंचने लगी। जाहिर है ऐसे में सम्बन्ध सामान्य नही रह सकते थे।उन्होने कई अन्य सन्दर्भों में भी लेखकों के कथनी और करनी के अंतर को रेखांकित किया है।इसी तरह ‘आपात काल’ तथा ‘चौरासी के दंगे’ के घटनाक्रम और कई पहलुओं को लेखिका की नज़र से देखा जा सकता है।

राजेन्द्र जी और मन्नू जी के विवाह को निश्चित रूप से साहित्य जगत में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा गया होगा। रचनात्मक ऊर्जा से लबरेज दो युवाओं का हमराह होना रचनात्मकता को नया आयाम दे सकता था। मन्नू जी अपने तई यह उम्मीद करती भी थी।उन्होंने लिखा भी है कि राजेन्द्र जी हमेशा उन्हें नया पढ़ने-लिखने को प्रोत्साहित करते रहें तथा उनके मित्र-मंडली के साथ घर-बाहर होने वाली बैठकों और बहसों से वे काफी प्रोत्साहित होती थीं। ‘एक इंच मुस्कान’ उपन्यास दोनो के सहलेखन का विशिष्ट उदाहरण है। मन्नू जी ने लिखा है कि उनके व्यक्तित्व के दो हिस्सों में रचनाकार वाला हिस्सा तो राजेन्द्र जी के साथ से लगातार फलता-फूलता रहा, मगर वो केवल रचनाकार नही हैं; एक संवेदनशील स्त्री भी हैं। राजेन्द्र जी से प्रेम और विवाह करके जो दाम्पत्य सुख की कल्पना उन्होंने की थी, वह ध्वस्त हो गया।

मन्नू जी लिखती हैं कि विवाह के बाद उन्हें पहली बार पता चला कि राजेन्द्र जी कहानियों में ‘एक दुनियां समानांतर’ की तरह जीवन मे ‘समानांतर’ के पक्षधर थे। यानी एक ही छत के भीतर दो दुनियां। जाहिर है यह उनके लिए अप्रत्याशित थी और वे काफी आहत हुई।आगे उन्होंने लिखा है कि इस ‘समानांतर’ जीवन के सूत्र कहीं और थें;जो ‘मीता’ प्रसंग से जुड़े हुए थे। इस द्वंद्व के साथ भी दोनो का जीवन साथ-साथ चलता रहा, जो लगभग पैंतीस वर्ष के बाद ही अलग-अलग रहने की स्थिति पर पंहुचा। जाहिर है यह परस्पर लगाव के बिना असम्भव था।

मन्नू जी ने खुद कई उदाहरण भी दिए हैं जहां राजेन्द्र जी की संवेदनशीलता और भावुकता का पता चलता है। मन्नू जी की मुख्य शिकायत यह रही है कि राजेन्द्र जी ने पिता और पति के दायित्व को पुरी जिम्मेदारी से नही निभाया। इस संदर्भ में वे उनके’असंवेदनशीलता’ के कई उदाहरण भी देती हैं। मन्नू जी के चित्रण से यह बार-बार उभरता है कि राजेन्द्र जी ‘बुरे’ नही हैं; दायित्वहीन हैं। उनके चिंतन और व्यावहारिक जीवन मे कहीं फांक है। ख़ुद राजेन्द्र जी ‘मुड़-मुड़ के देखता हूँ’ मे इसे स्वीकारते भी हैं – “अपने आप से पूछता भी हूँ कि स्वतंत्रता की छूट का मेरा आबसैशन सच ही कही ‘लंपटता की छूट’ का ही तो दूसरा नाम नही है? मुझे घर भी चाहिए और निर्बन्ध उत्तरदायित्वहीनता भी”। जाहिर है घर के साथ कुछ उत्तरदायित्व अवश्य जुड़े होते हैं। मगर मन्नू जी के अनुसार वे लगातार इसे नजरअंदाज करते रहें।

इस पूरे प्रसंग में एक पाठक की दुविधा यह होती है कि वह घटनाओ को केवल ‘पढ़’ रहा होता है; वह उन घटनाओं का साक्षी नही रहा है।मगर वह अपने प्रिय लेखक की जिंदगी और रचनाकर्म को जानने का आकांक्षी अवश्य होता है। इसलिए ‘आत्मकथाओं’ में ‘रस’ लेता है;और लेखक के सुख-दुख उसके संवेदना को प्रभावित करते हैं। फिर चाहे साधारणीकरण कह लें अपने जीवन की स्मृतियां उसके ज़ेहन में कौंध जाती है और क्षण भर वह उसमे डूब जाता है।
यह कहा जाता है कि ‘तथ्य’के कई पहलू होते हैं; जिस कोण से देखो वैसा।ठीक है लेखक की अपनी आत्मग्रस्तता हो सकती है, और वह ‘तथ्य’ के किसी अन्य पहलू से अपरिचित भी हो सकता है। मगर ‘तथ्य’ इतने अराजक भी नही होतें कि ‘सत्य’ तक पहुंचा ही न जा सके और उसकी कोई ‘वस्तुनिष्ठता’ ही न हो।कोई जान बूझकर इंकार करे तो और बात है। व्यक्ति जो जीवन जीया होता है; उसके सच-झूँठ कई छिद्रों से झांकते हैं। उसके रचनाकर्म, उसके कर्म क्षेत्र, उसके सतत आचरण उसके ‘होने’ को प्रकट करते रहते हैं। जो उसके कथनी और करनी जे फांक(यदि है) को कहीं न कहीं प्रकट कर ही देते हैं।इसलिए जो रचनाकार के जीवन और रचनाकर्म को जितना करीब से जानता है,वह उतना ही अधिक ‘आत्मकथा’ के ‘वस्तुनिष्ठता’ को जान सकता है।

प्रथम दृष्टया ‘एक कहानी यह भी’ शीर्षक से यह भ्रम हो सकता है कि यह राजेन्द्र जी की आत्मकथ्यान्श ‘मुड़- मुड़ के देखता हूँ’ के प्रतिवाद में लिखा गया होगा, मगर ऐसा नही है कथाकार मन्नू भंडारी ने अपने ‘जीवन कथा’ को भी एक कहानी की तरह देखा है और उसे ‘एक कहानी यह भी’ कहा है। राजेन्द्र जी को जबाव ‘देखा तो यह भी देखते’ पूरक अंश के रूप में प्रस्तुत किया गया है।चूंकि दोनो का रचनात्मक और दाम्पत्य जीवन साथ-साथ चला है, इसलिए स्वाभविक है कि अधिकांश प्रसंग में राजेंद्र जी की उपस्थिति है।

इस आत्मकथा में उन्होंने जीवन के द्वंद्वों के अलावा अपने रचनाकर्म की प्रक्रिया, पात्रों के वास्तविक जीवन से कहानी में उनके चित्रण, कहानी के कथावस्तु की प्रेरणा, कहानी की भाषा-शैली, कथा का नाट्य-रूपांतरण, आदि पर महत्वपूर्ण बातें कही हैं, जो नए लिखने पढ़ने वालों के लिए दिलचस्प और ज्ञानवर्धक है।इस आत्मकथा से प्रेरणा ली जा सकती है कि रचनात्मकता सहजता का विरोधी नही है।

सतत कर्मरत रहते, अपने दायित्वों का निर्वहन करते, बिना छद्म-छल के रचनात्मक उपलब्धियां प्राप्त की जा सकती है।यह भी कि बेहतर रचनाकर हो न हों, बेहतर इंसान होना ज्यादा जरूरी है। मैनेजर पांडे जी ने उचित ही इस कृति को ‘आत्मा का आईना’ कहा है।

कृति- एक कहानी यह भी
रचनाकार- मन्नू भंडारी
प्रकाशन- राधाकृष्ण, नयी दिल्ली

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