15.03.2019

लोक सभा चुनावों की घोषणा के साथ  ही पूरे देश में चुनावी सरगर्मियां तेजी से बढ़ गई हैं । विशेष रूप से उन राज्यों में जहां हाल ही में विधान सभा चुनाव संपन्न हुए हैं और कॉंग्रेस की सरकार बनी है । छत्तीसगढ़ भी उन्ही राज्यों में से है । देखा जाए तो छत्तीसगढ़ पर तो कॉंग्रेस का फोकस सबसे ज्यादा है क्योंकि विधान सभा चुनाव में लगभग तीन चौथाई सीटें कॉंग्रेस के पाले में रही हैं और भाजपा पूर्व में जीती गई सीटों से एक तिहाई पर सिमट कर रह गई है .

ग़ौरतलब बात यह है कि पिछले दोनो लोकसभा चुनावों में जब रमन सिंह विधान सभा जीतकर आए थे तो उन्होंने भाजपा को लोक सभा की 11 सीटों में से 10-10 सीटें जितवाकर दी । इस लिहाज से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेस बघेल पर सिर्फ जीत का नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर लाने का मनोवैज्ञानिक दबाब बढ़ गया है । यहां यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि पूर्व के विधान सभा चुनावों में भाजपा व कॉंग्रेस के प्राप्त मतों में बमुश्किल 1 प्रतिशत का ही अंतर रहा आया था जबकि हाल के विधान सभा चुनाव में भाजपा के मत प्रतिशत में लगभग 10 प्रतिशत की कमी आई है । हालांकि यह बात सही है कि भाजपा को हुए मतों के नुकसान का पूरा फायदा कॉंग्रेस को नहीं मिला मगर लोक सभा चुनाव की दृष्टि से इस नुकसान का सीधा लाभ कॉंग्रेस को मिल सकता है ।

इस बात पर ग़ौर करना जरूरी है कि पूर्व में भाजपा कॉंग्रेस के मतों में कम अंतर के बावजूद पूर्व के लोक सभा चुनावों में भाजपा छत्तीसगढ़ की 11 में से 10-10 सीटें जीतने में कामयाब रही आई । अतः यह देखना होगा कि इस बार लोक सभा चुनाव में भाजपा को हुए 10 प्रतिशत मतों के नुकसान को मुख्य मंत्री भूपेश बघेल कितना सीटों में बदल पाते हैं । यह तो माना जा सकता है कि मतों के इस बड़े अंतर का मनोवैज्ञानिक लाभ तो कॉंग्रेस को मिल ही रहा है अतः पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की उम्मीदें रमन सिंह द्वारा भाजपा को दिलाई गई 10 सीटों से कम नहीं होंगी अतः पार्टी की इन ऊंची उम्मीदों पर खरे उतरना मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के लिए एक चुनौती है ।

लोक सभा चुनावों में हालांकि विधान सभा के मुकाबले मतदाताओं की अलग तरह की मानसिकता होती है जो पूर्व के चुनावों में विधान सभा व लोक सभा के नजीजों से समझा जा सकता है । अतः विधान सभा में मिली जीत व मत प्रतिशत को सिंपल मैथ्स से लोक सभा की जीत में नहीं आंका जा सकता । लोक सभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे व नेतृत्व का आकर्षण भी बड़ी भूमिका निभाता है। भाजपा में देखा जाए तो नरेन्द्र मोदी जी के पास सर्वमान्य नेतृत्व के साथ ही पिछले पांच वर्षों के शासन का रिपोर्ट कार्ड है जिसे वे लगातार आक्रामक रूपब से जनता के सामने बखान करते चुनावी समर में निकल पड़े हैं । नेतृत्व तो पार्टी व गठबंधन का अंदरूनी मामला है मगर पांच साल के रिपोर्ट कार्ड पर जनता कितना भरोसा कर पाती है यह गंभीर प्रश्न है ।

दूसरी ओर राहुल गांधी के कॉंग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद कॉंग्रेस लगातार बेहतर प्रदर्शन करते जा रही है । इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि राहुल गांधी के नेतृत्व संभालने के बाद हुए विभिन्न चुनावों में कॉंग्रेस ने बहुत बेहतर प्रदर्शन करते हुए प्रमुख राज्यों में सत्ता भी हासिल की है । छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक जीत भी इन राज्यों में से है । अतः यह माना जा सकता है कि केन्द्रीय नेतृत्व की सफलता व जन समर्थन का मनवैज्ञानिक लाभ लोक सभा में भी मिल सकता है । इसके साथ ही विगत दो तीन माह में मुख्य मंत्री भूपेश बघेल की नई सरकार द्वारा किसानो की कर्ज़ माफी, धान के समर्थन मूल्य में वृद्धि,

आदिवासियों की अधिकृत जमीन को वापसी, आम जन को बिजली बिल में 50 प्रतिशत की छूट व छोटे भूखंडों की रजिस्ट्री पुनः शुरु करने, शिक्षित बेरोजगारों के लिए अनेक पदों की नियुक्ति के विज्ञापन जारी करने जैसे अनेक जनहितकारी घोषणाओं के तत्काल क्रियान्वयन से आम जन में काफी उम्मीदें जागी हैं । विधान सभा चुनावों के घोषणा पत्र के इस तरह तत्काल क्रियान्वयन की यह पहल सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही नहीं बल्कि कॉंग्रेस द्वारा हाल में जीते गए तमाम प्रदेशों में की गई है । निश्चित रूप से लोकहित में की शुरु की गई इस नई कार्य संस्कृति का आमजन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा । इन सभी सकारात्मक व अनुकूल परिस्थितियों के आलोक में कॉंग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व को मुख्य मंत्री भूपेश बघेल से बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं जिस पर खरा उतरना मुख्य मंत्री के लिए एक चुनौती तो है ही साथ साथ उनकी पार्टी द्वारा विगत दो माह में किए गए कार्यों व लोकहित में लिए गए निर्णयों पर जारी किए गए रिपोर्ट कार्ड के नजीजों का इम्तिहान भी होगा । कॉंग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ साथ मुख्य मंत्री भूपेश बघेल दोनों के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में होने वाला यह पहला लोक सभा चुनाव काफी महत्वपूर्ण व चुनोती भरा है ।

 

जीवेश चौबे-