खुलासा :  सरगुजा स्थित हसदेव अरण्य के सघन वन क्षेत्र में नियम विरुद्ध गलत तथ्यों के आधार पर परसा कोल ब्लाक को जारी की गई पर्यावरणीय स्वीकृति .

15.03.2019 

आदिवासियों की आजीविका, संस्कृति और पर्यावरण के बजाए कार्पोरेट मुनाफे के लिए प्रतिबद्ध हैं मोदी सरकार l

छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्ड कोल फ़ील्ड्स में स्थित परसा कोल ब्लॉक को केन्द्रीय वन पर्यावरण एवं क्लाइमेट चेंज मंत्रालय की पर्यावरण प्रभाव आकलन समिति (EAC) ने पर्यावरणीय स्वीकृति प्रदान करने की अनुशंसा की हैं l छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन एवं हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति इस पर्यावरण स्वीकृति का पुरजोर तरीके से विरोध करता हैं, क्यूंकि गलत तरीकों एवं फर्जी आंकड़ों के आधार पर एक कम्पनी विशेष के मुनाफे लिए मोदी सरकार के दवाब में इस परियोजना को स्वीकृति प्रदान की गई हैं l

यह कोल ब्लाक राजस्थान राज्य विधुत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित हैं जिसमे कोयला उत्खनन का ठेका mdo अनुवंध के माध्यम से अडानी कम्पनी को दिया गया हैं l 5 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन क्षमता की इस खनन परियोजना में 1252 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित होगी जिसमे 3 गाँव विस्थापित होंगे और लगभग 1 लाख से अधिक पेड़ो की कटाई होगी l

वर्ष 2018 में इस परियोजना को स्वीकृति प्रदान करने के संबंध में निर्णय लेने हेतु ईएसी की कुल 3 बैठकें हुई l पहली बैठक दिनांक 15-16 फरवरी 2018 को हुई जिसमे तीन महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर राज्य सरकार से राय मांगी थी –

1. छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग से मौजूदा एवं प्रस्तावित खनन परियोजनओं से हसदेव नदी पर होने वाले प्रभावों के संचयी आंकलन (Cumulative Impact Assessment) की रिपोर्ट|

2. छत्तीसगढ़ राज्य वन्यजीव बोर्ड से हसदेव अरण्ड क्षेत्र में मौजूदा एवं प्रस्तावित खनन परियोजनाओं से हाथियों के विचरण और अन्य वन्य जीवों पर होने वाले प्रभाव के सम्बन्ध में विस्तृत रिपोर्ट|

3. राज्य के आदिवासी विकास विभाग से इस परियोजना हेतु ग्राम सभा सहमति, आदिवासियों की आजीविका पर होने वाले प्रभाव तथा पेसा कानून से सम्बंधित रिपोर्ट|

इस बैठक के पश्चात् दिनांक 24 जुलाई 2018 एवं 27 सितम्बर 2018 को ईएसी की पुनः बैठक हुई जिसमे परियोजना प्रस्तावक द्वारा राज्य सरकार की और से गलत एवं फर्जी दस्तावेज समिति को प्रस्तुत किये गए l राज्य वन्य प्राणी बोर्ड की जगह वन विभाग के मुखिया पीसीसीएफ के द्वारा दिनांक 18 मई 2018 को पत्र जारी किया गया जिसमे हाथी की अनुपस्थिति के संबंध में गलत रिपोर्ट प्रस्तुत की गई l

जल संसाधन विभाग ने भी सम्पूर्ण केचमेंट का अध्यन किये बिना ही दिनांक 6 अगस्त 2018 को नाला के डायवर्सन की अनुमति प्रदान कर दी गई l सबसे महत्वपूर्ण अदानी कंपनी के द्वारा स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर प्रभावित गाँव साल्ही, हरिहरपुर और फतेहपुर की ग्रामसभाओ के फर्जी प्रस्ताव तैयार कर केंद्रीय मंत्रालय को प्रस्तुत किया गए l ग्रामीणों ने इन फर्जी प्रस्तावों की जाँच और कार्यवाही हेतु वर्तमान मुख्यमंत्री से भी गुहार लगाई थी एवं जल संसाधन मंत्री से मुलाकत कर पूर्व सरकार के समय जारी की गई noc को रद्द करने की मांग की थी l परन्तु पर्यावरण प्रभाव आकलन समिति (EAC) ने कंपनी द्वारा प्रस्तुत गलत एवं फर्जी दस्तावेजो को ही आधार मानकर यह स्वीकृति जारी कर दी l

इस क्षेत्र में हाथी मानव संघर्षों की स्थिति, हसदेव नदी के पूरे कैचमेंट तथा बांगो बांध पर प्रभाव, पाँचवी अनुसूचित क्षेत्र होने के कारण आदिवासियों की आजीविका एवं संस्कृति पर पड़ने वाले प्रभाव और इस की संपूर्ण जैव विविधता और वन संपदा, फर्जी ग्राम सभा एवं दस्तावेजीकरण जैसे महत्वपूर्ण सन्दर्भों में वर्तमान राज्य सरकार की उदासीनता एवं हस्तक्षेप का अभाव यह दर्शाता है कि कार्पोरेट के मुनाफे के लिए हो रही गलत प्रक्रियाओं पर सरकार द्वारा चुप्पी साध ली गई है | एक बार पुनः प्रभावितों के पक्ष एवं तथ्यों को दरकिनार करके कोयले की आपूर्ति जैसे कारणों की आड़ में केवल कॉर्पोरेट उद्देश्यों की पूर्ति एवं हितों को साधने के लिए इस परियोजना को मोदी सरकार द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई है |

हम अपेक्षा करते हैं कि राज्य सरकार अपनी चुप्पी तोड़ते हुए हसदेव अरण्य और वहां निवासरत आदिवासियों के हितो में इस गलत पर्यावरणीय स्वीकृति पर संज्ञान लेगी एवं फर्जी ग्रामसभाओ के प्रस्तावों की जाँच और उसके आधार पर सम्पादित भूमि अधिग्रहण की कार्यवाहियों को रद्द करेगी।

आलोक शुक्ला की फेसबुक वाल से 

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