अपना मोर्चा .काम से 

छत्तीसगढ़ के अमूमन सभी ( इक्का-दुक्का को छोड़कर ) अखबारों और चैनलों के संपादक इन दिनों परेशान चल रहे हैं. उनकी परेशानी की वजह यह नहीं है कि काम का बोझ बढ़ गया है. बल्कि वे इसलिए परेशान चल रहे हैं कि अब उन्हें मुख्यमंत्री सचिवालय से किसी चमन-फमन सिंह का फोन नहीं आ रहा है.

अब से ठीक दो-ढाई महीने पहले तक स्थिति काफी बुरी थीं. मुख्यमंत्री सचिवालय से हर दूसरे-तीसरे दिन संपादकों ( कई बार तो मालिकों के पास ) खबर को रोक देने… फलांनी खबर को ढिकांनी कर देने… मतलब एंगल बदल देने, अमकां रिपोर्टर को ठिकाने लगा देने के लिए फोन आया करता था.

संपादक और मालिक इस बात के लिए आत्ममुग्ध रहते थे कि चलो चमन सिंह ने उन्हें अपने बगीचे का फूल तो माना. वैल्यू बनी रहती थीं तो फोकट फंट में हवाई जहाज की टिकट से लेकर और भी दस तरह के काम वे करवा लेते थे, लेकिन उनकी वैल्यू के चक्कर में रिपोर्टर को बलि चढ़ जाती थीं. अब संपादकों को बलि चढ़ाने का मौका नहीं मिल रहा है. पिछले दो-ढाई महीनों से अखबारों और चैनलों में पिछले पन्द्रह साल से चल रही बलि प्रथा पर विराम लग गया है.

अंदरखाने की खबर यह है कि पिछले दिनों कुछ संपादकों ने एक जगह एकत्र होकर इस बात के लिए विचार-विमर्श किया कि वैल्यू में इजाफा कैसे और किस तरह से किया जाय. पूर्व मुख्यमंत्री भी वैल्यू एडीशन पर काफी जोर दिया करते थे सो एक संपादक ने सुझाव दिया- अब तक मुख्यमंत्री जी संपादकों को आमंत्रित करते थे… क्यों न इस बार सारे संपादक मिलकर  मुख्यमंत्री को लंच पर आमंत्रित करें. एक ने कहा- यह काम अलग-अलग रहकर भी किया जा सकता है. सब अपने-अपने अखबार में आमंत्रित करते हैं. एक ने पकी-पकाई सलाह दी- क्यों ने मुख्यमंत्री को एक दिन का एडिटर बना दिया जाय. जिस रोज वे एडिटर बनेंगे उस रोज सारी खबरें वे तय करेंगे यहां तक हैडिंग भी.

सुझाव देने के लिए मशहूर एक संपादक ने अपना दर्द बयां किया- यार… हर रिपोर्टर आंख दिखाता है. कहता है- खबर छापना है तो छापो… नहीं तो भाड़ में जाओ… कोई भी अखबार दशा और दिशा तय नहीं करता है. अब अखबार से ज्यादा सोशल मीडिया हावी है. एक संपादक की पीड़ा थीं- रिपोर्टरों पर पकड़ तब तक रहती है जब तक उनके भीतर नौकरी का डर रहता है. थोड़ा-बहुत भी समझाओ तो रिपोर्टर कहता है- अभी वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं मांगा है. हम किसी खबर पर कार्रवाई करने के बारे में सोचते ही रहते हैं उससे पहले सरकार ही निपटा देती है.

साला… खबर का असर लिखने का मौका भी नहीं मिल पा रहा है.