एक कॉमरेड, जिनकी तनख्वाह ,ठेका मजदूर जुटाते थे चंदा करके …

    ज़ाकिर हुसैन भिलाई 

वो मेरी पत्रकारिता का शुरूआती साल था, जब 8 जुलाई 1998 को भिलाई स्टील प्लांट के पंप हाउस के पास झाडिय़ों में एक महिला ठेका मजदूर की लाश मिली और देखते ही देखते एक बड़ा मजदूर आंदोलन खड़ा हो गया। मुझे याद है, जब लगातार इस आंदोलन की खबरें छपने लगी तो संभवत: 12 वें दिन किसी अन्य प्रसंग में सेक्टर-9 अस्पताल में तत्कालीन मैनेजिंग डायरेक्टर विक्रांत गुजराल हम पत्रकारों के समक्ष लगभग हाथ जोडऩे की मुद्रा में खड़े थे और उनकी गुजारिश थी कि इस आंदोलन को कम छापा जाए क्योंकि इससे सेल-बीएसपी की छवि बहुत ज्यादा खराब हो रही है।

 

तब इस आंदोलन को लीड कर रहे थे कॉमरेड कमल रॉय। उन दिनों उनकी जैसी कद-काठी थी, आज भी कुछ खास बदलाव नहीं आया है। शादी उन्होंने की नहीं और अपनी पूरी नौकरी के दौरान मजदूर आंदोलनों के चलते बीएसपी, प्रशासन व शासन से टकराते रहे।

हालांकि आज भी उनकी 1976 मॉडल स्कूटर टीप-टॉप कंडीशन में हमसफर के तौर पर साथ है। अब फर्क सिर्फ ये है कि हाल ही में 28 फरवरी को भिलाई स्टील प्लांट में करीब 43 साल सेवा देते हुए कमल दादा रिटायर हो गए। उन्हें देखने से नहीं लगता कि 60 पूरे कर लिए हैं। हंस कर बताने लगे-कलकत्ता में सीनियर फुटबॉल टीम में शामिल होना था इसलिए उम्र कम होने के बावजूद करीब 2.5 साल बढ़ा कर लिखा दिए थे, इसलिए वही जन्मतिथि चलती रही। मैनें भी नहीं सुधरवाया। ऐसे में मुझे करीब 2.5 साल पहले रिटायर होना पड़ रहा है।

कमल रॉय जैसे जुझारू मजदूर नेता का भिलाई के श्रमिक आंदोलन की तारीख मेें खास तौर पर नाम दर्ज रहेगा। दादा बताते हैं कि 1976 मेें वो भिलाई आ गए थे और लड़कपन की उम्र में ही अस्थाई तौर पर (एनएमआर) बीएसपी में काम शुरू कर दिया था, फिर 1980 में दस्तावेज के मुताबिक बालिग होने पर बीएसपी ने परमानेंट कर दिया और सेवा शुरू हुई रिसर्च एंड कंट्रोल लैब में। इसके अगले साल हिंदुस्तान स्टील एम्पलाई यूनियन (सीटू) की सदस्यता लेकर उन्होंने श्रमिक राजनीति में कदम रखा और तब से अब तक जूझते रहे।

ठेका मजदूर बलात्कार-हत्याकांड को लेकर चले आंदोलन का दौर याद करते हुए कमल राय बताते हैं -पहले तो बीएसपी मैनेजमेेंट मानने ही तैयार नहीं था कि प्लांट के अंदर बलात्कार और हत्या जैसा अपराध हो सकता है। ऐसे मेें दूसरे दिन दुर्ग में पोस्टमार्टम नहीं हो पाया। फिर तीसरे दिन रायपुर मेकाहारा में भी कतिपय कारणों से पोस्टमार्टम टल गया। ऐसे में सारे ठेका मजदूर एकजुट हुए और इस्पात भवन के सामने इस महिला ठेका मजदूर की लाश रखकर प्रदर्शन शुरू कर दिया। किसी तरह मैनेजमेंट बैकफुट पर आया और पीएम के बाद अंतिम संस्कार हो पाया। इसके बाद आंदोलन करीब महीने भर चला और पंप हाउस के दो कर्मियों को हत्या और बलात्कार के आरोप मेें ना सिर्फ सजा हुई बल्कि उन्हें बर्खास्त भी किया गया।
लेकिन इस आंदोलन के बदले कमल रॉय मैनेजमेंट के निशाने पर आ गए। उन्हें चार्जशीट और दूसरी कागजी कार्रवाई के बाद 1998 में निलंबित कर दिया गया। मामला मुकद्दमा चला और तीन साल बाद जीत कमल राय की हुई। लेकिन यह तीन साल उनके जीवन के सबसे कठिन दौर के तौर पर बीते। कमल राय बताते हैं-तब ठेका मजदूर अपनी तनख्वाह से हर महीने 3-3 रूपए इकठ्ठा  कर मुझे देते थे, जिससे घर और न्यायलयीन खर्च चलता था।

कमल रॉय अपने मजदूर आंदोलनों की सफलता गिनाते हुए कहते हैं-मैनें जो भी आंदोलन किया, उसमें मुझे मेरे गुरू और वरिष्ठ नेता कॉमरेड पीके मोइत्रा का मार्गदर्शन मिला। जिसके चलते हम लोग ठेका मजदूरों का पीएफ कटवाने में सफल रहे और हत्याकांड वाले आंदोलन के बाद बीएसपी मैनेजमेंट ने ठेका मजदूरों की मौत के मामलों को भी अनुकंपा नियुक्ति के दायरे में लेने सहमत हुआ। जिसकी वजह से कई ठेका मजदूरों के आश्रितों को बीएसपी में स्थाई नौकरी मिली।

अब कमल रॉय वापस कोलकाता जाकर मां और बहनों के साथ रहना चाहते हैं। रिटायरमेंट के बाद के जीवन की उन्हें शुभकामनाएं।

ज़ाकिर हुसैन पत्रकार एवं लेखक 
@mzh11319

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