हुए तुम दोस्त जिनके, दुश्मन उनका आसमाँ क्यों हो !!

दुनिया में ऐसी मिसालें कम ही हैं जब सीमा पर भरापूरा तनाव व्याप्त हो, टकराव चल रहा हो और देश की सरकार में बैठे लोगों की अगुआई में खुद अपने देश के नागरिकों के एक हिस्से – एक खासे बड़ी आबादी वाले हिस्से – पर हमले किये और कराये जा रहे हों । जिससे विवाद है उसे अलगथलग कर कठघरे में खड़ा करने की बजाय अपने ही नागरिकों को निशाना बनाकर उनके बीच विभाजन गहरा किया जा रहा हो । आमतौर पर यह काम “दुश्मन देश” की सामरिक नीति का हिस्सा होता है : इसके लिए उसे भारी रकम खर्च करनी पड़ती है ।

मगर संघ परिवार है तो ऐसा होना संभव है ; मोदी हैं तो मुमकिन है ।

● पुलवामा आतंकी हमले के बाद पिछले पूरे पखवाड़े देश के विभिन्न राज्यों में पढ़ाई कर रहे कश्मीरी छात्रों और शॉल, स्वेटर, अखरोट, केसर बेचने गये कश्मीरी व्यापारियों पर हुये हमले इसी तरह की मिसाल हैं । जम्मू तक इस उन्मादी हिंसा से झुलसने से नहीं बचा । आरएसएस की अगुआई वाले हिंदुत्ववादी संगठनों के गिरोहों ने इस मौके का इस्तेमाल खासतौर से कश्मीरी अवाम और आमतौर से मुसलमानों के खिलाफ नफ़रत फैलाने के लिए किया ।

● जिस झूठ को साबित करने में पाकिस्तानी हुकूमतें और साम्राज्यवादी ताकतें 70 साल में भी कामयाब नहीं हुयीं उसे इन हिंदुत्ववादी गिरोहों ने अपने इस राज संरक्षित-संघ पोषित आचरण से सप्ताह भर में एक ठोस बहाना मुहैया करा दिया। अपनी हिंसा से यह “प्रमाण” उपलब्ध करा दिया कि कश्मीर और बाकी हिन्दुस्तान के रिश्ते सहज और स्वाभाविक नहीं हैं । इसकी अनुगूंज अबू धाबी में हुये इस्लामी देशों के संगठन (ओआईसी) के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में सुनाई दी । जहां इतिहास में पहली बार दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी भारत की विदेश मंत्री को मेहमाने-खुसूसी के रूप में न्यौता गया था और जहां खुद उनकी मौजूदगी में एक प्रस्ताव पारित कर “जुलाई 2016 से कश्मीर में जारी बर्बरियत और अवैधानिक गिरफ्तारियों और गुमशुदगियों ” की सख्त शब्दों में भर्त्सना की गयी। गौरतलब है कि इस्लामी देशों के प्रस्ताव में काश्मीर का जिक्र और भारत की भर्त्सना भी इतिहास में पहली बार है !!

● इस तरह संघी जमात ने एक बार और साबित कर दिया कि दक्षिणपंथी जमातें एक दूसरे की पूरक होती हैं । भारतीय प्रायद्वीप के मामले में तो वे एक दूजे की सहोदर भी हैं।

● पुलवामा के बाद विभाजन के ध्रुवीकरण की इस नीति को तेजी से अमल में लाकर संघी एजेंडे को आगे बढ़ाने की ये ताबड़तोड़ कोशिशें कुछ सप्ताह बाद होने वाले आमचुनाव में ईवीएम मशीनों पर दबने वाली अँगुलियों को कितना प्रभावित करेंगी यह बाद की बात है। फिलहाल तो इन्होंने वह कर दिखाया है जिसे न होने देने के लिये आज़ादी के बाद की सारी विदेशनीति लगी रही थी ।

● भारतीय वायुसेना की शानदार कार्यवाही में बालाकोट के आतंकी ठिकाने पर हुए हमले में एक कौए और अनेक पेड़ों के अलावा जैशे मोहम्मद के कितने आतंकी मारे गये इस अटकलबाजी को छोड़ भी दें तो भी पिछले पखवाड़े की चुनावी आमसभाओं में मोदी – अमित शाहों और येदुयेरप्पाओं की सैनिकों की लाशों को वोट की एटीएम के पासवर्ड में बदल देने की जुगुप्सा से भरी लिप्सा और युद्दोन्मादी घनगरज के बीच कश्मीर के मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण होने की चिंताजनक खबर आई है। गोदी मीडिया के चलते भले फिलहाल ये दब गयी हो – भविष्य के लिए मुश्किल खड़ी कर गयी है ।

● अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प के दो छोटे बयान बड़े संकेत देने वाले हैं । बालाकोट धावे से ठीक पहले ट्रम्प ने कहा था कि ” भारत पाकिस्तान की सीमा पर कुछ बड़ा होने वाला है” । विंग कमांडर अभिमन्यु वर्धमान की रिहाई के एक दिन पहले ट्रम्प ने फिर बोला कि “पाकिस्तान से अच्छी खबर आने वाली है”। मतलब देश और उसकी सरकार के बड़े हिस्से को भी जिसका पता नहीं था – ट्रम्प को उसका पता था । मतलब साफ़ है कि बन्दर वाशिंगटन में तराजू लिए बैठा था । कब, क्या और कितना, किसे करना है, इसे तय कर रहा था ।

● यह एक प्रकार से कश्मीर पर तीसरे पक्ष की भूमिका को स्वीकार करना है और इस तरह राष्ट्रीय सर्वानुमति वाली अब तक की भारतीय विदेशनीति और उसकी समय द्वारा जाँची परखी गयी कश्मीर नीति को सर के बल उलटा खड़ा करना है । यह कश्मीर को आन्तरिक मसला मानने और बिना किसी की मध्यस्थता के, संवाद के जरिये सभी हितधारकों को जोड़ते हुये एक राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने की वचनबध्दता से भी विचलन है।

● इस सबका एक और महत्वपूर्ण आयाम है। पिछले कुछ महीने पाकिस्तान के अंतर्राष्ट्रीय रूप से अलग-थलग पड़ने के महीने थे । सऊदी अरब के प्रिंस – जो भारत पाक दोनों के गले मिलकर गये – की यात्रा के अपवाद को छोड़ दें तो उसकी अमरीका सहित अंतर्राष्ट्रीय मदद रोकी जा रही थी । पाकिस्तानी सीमा के भीतर बनी आतंकवाद की पनाहगाहों को खत्म करने के लिए उस पर दबाब बढ़ रहा था । अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान सचमुच की मुश्किल में था ।

● पुलवामा के आतंकी हमले और बालाकोट के ठिकानों पर भारतीय वायुसेना के धावे, अभिमन्यु की सलामत वापसी सहित इस पूरे पखवाड़े के तनाव के बीच इमरान खान और पाकिस्तानी सरकार ने जिस तरह की भूमिका निबाही – जिस तरह की कमोबेश संयमित स्क्रिप्ट का वाचन किया, उसने उसे कूटनीतिक बढ़त दिलाई है । खुल्लमखुल्ला भले कुछ बोला जा रहा है मगर अंदरखाने जरूर इमरान खान ने अपने इस अलगाव को खत्म करवाने के लिए मोदी को थैंक्यू बोला होगा ।

● इसके उलट ठीक इसी बीच अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत के साथ व्यापार में किये जा रहे तरजीही बर्ताब के कार्यक्रम को बंद करने की इच्छा का एलान कर दिया है । इस व्यवहार के तहत भारत कोई 5.6 बिलियन डॉलर (3 ख़रब 96 अरब 42 करोड़ रुपयों) तक का माल बिना किसी टैक्स या ड्यूटी के अमरीका निर्यात कर सकता था। अब यह सुविधा खत्म हो जाएगी।

● मौजूदा सत्तासीनों के विचार और व्यवहार से उपजी समस्यायें साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, समाज के मध्ययुगीनीकरण और सत्ताप्रतिष्ठान के शनैः शनैः फासिस्टीकरण भर की नहीं है ; विदेश नीति की उनकी संकीर्ण समझ भी एक फुटनोट पर लिखी इबारत से ज्यादा नहीं है।

● इनकी पुनर्वापसी क्या कहर ढायेगी इसे समझा जा सकता है।

(Clip Via #सुबह_सवेरे)