अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : महिला विरोधी हिंसा ,अवैध गिरफ्तारीयों ,फासिस्ट दमन , के खिलाफ रायपुर में महिला अधिकार मंच का थरना, प्रदर्शन तथा बड़ी संख्या में गिरफ्तारी .

रायपुर 8 मार्च , रायपुर 

आज रायपुर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिला अधिकार मंच छत्त्तीसगढ ने प्रदेश में हिंसा के अलग-अलग रूपों का जैसे प- मजदूरों की आजिविका छीनना या उनको न्यूनतम वेतन ना देना, महिलाओं पर तेजाब छिडकाव, अत्यधिक संसाधनों के खनन, विस्थापन तथा वंचितों के लिए लड़ रहें मानव अधिकार कार्यकर्ताओ, पत्रकारों, वकीलों के दमन के खिलाफ धरना दिया .धरने के पश्चात रैली को ओसीएम पर पुलिस ने रोक लिया और बड़ी संख्या में प्रदशर्न कारी महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया .जिन्हें बाद में छोड़ रिहा कर दिया गया.


एसडीएम को राज्यपाल के नाम ज्ञापन सोंपा गया .
प्रदेश के कौने कौने से आई महिलाओं को वक्ताओं ने संबोधित करते हुये कहा कि

छत्तीसगढ़ में सुरक्षाबलों और पुलिसफोर्स द्वारा बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों मे महिलाओं के ऊपर हुए यौनिक हिंसा की घटनाएं आज भी सामने आ रही है। नक्सल उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों के फर्जी एनकाउन्टर, सरेंडर और गैर कानूनी गिरफ्तारियों की घटनायें कम नहीं हो रही हैं .

उन्होंने कहा कि हमारा मानना है की छत्तीसगढ़ सरकार इससे निपटने के लिए मजबूत शासकीय तंत्र बनाने में न सिर्फ नाकाम रही है बल्कि जहाँ शासन और शासकीय व्यक्ति इस हिंसा और दमन में शामिल है, उनको सरकार द्वार पनाह दी गयी है| नयी सरकार आने के बाद भी बस्तर में सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी महिलाओं पे लैंगिक और शारीरिक हिंसा रुक नहीं रहा है ना ही कांग्रेस सरकार द्वारा इसपे कारवाई के लिए कोई कदम उठाये गए है|

पूरे देश में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को झूठे आरोपो में गिरफ्तार किया गया .छत्तीसगढ़ की वरिष्ठ अधिवक्ता ,ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज की गिरफ्तारी पर रोष प्रगट किया और उन्हें तत्काल रिहा किया जाये.

सुधा भारद्वाज ने जेल से अपने संघर्ष के साथियो को एक पत्र भेजा जिसमें महिला दिवस की शुभकामनाएं दी और साथियों के संघर्ष को याद किया .पत्र पुष्पा कलाप्रेमी ने पढ कर सुनाया .

वक्ताओं में राजिम तांडी ,नीरा डहरिया ,दुर्गा झा ,इन्दु नेताम ,चंचल.हेमलता साहू ,अधिवक्ता रजनी सौरेन ,एडवोकेट प्रियंका शुक्ला ,दीपा साहू ,श्रेया ,सुलक्षणा नंदी .रिन चिन एवं प्रदेश के जनसंगठनो से जनक लाल ठाकुर. बागड़े जी ,सौरा यादव , गौतम बंदोपाध्याय ,दिनेश सतनाम ,राजेंद्र सायल ,लखन साहू ,विजय भाई ,आलोक शुक्ला तथा डा. लाखन सिंह आदि उपस्थित थे.

महिला अधिकार मंच ने राज्यपाल को सोंपे ज्ञापन मे मांग की गई कि :

1. बस्तर में सुरक्षा बालों द्वारा आदिवासी महिलायों पे हिंसा बंद हो जिसकी कड़ी नयी सरकार आने के बाद भी रुकी नहीं है| पुराने हिंसा के केसेस जैसे पेद्दगेल्लुर, नेन्द्रा, हाल में हुए सुकमा और भैरमगढ़ के ताड़ीबल्ला और कोरसागुडा की घटना जिसमें दो छोटी लड़कियों के साथ बलात्कार भी हुआ, दंतेवाडा के समेली में सुरक्षा बल द्वारा बच्ची पे लैंगिक हिंसा और आत्महत्या, मीना खालको (बलरामपुर) के वसे में न्यायिक जांच की अनुशंसा के बावजूद कोई कारवाई नहीं हुई है|

2. राज्य के अन्य हिस्सों में भी पिछले कुछ सालों में राज्य में लैंगिक हिंसा के कई केसेस सामने आये खासकर जिसमें अमीर या ताकतवर व्यक्ती जिम्मेदार थे जैसे भिलाई की आरती , मंजीत कौर बल, कोमाखान से दलित युवती| इन सभी केस में शासन और पुलिस द्वारा महिलायों की सुनी नहीं गयी या फिर न्याय मिलने ने बहुत देरी हुई| सरकार इन केसेस पे जल्द न्याय के लिए दबाव डाले |

3. जेन्डर-आधारित हिंसा को एक जन-स्वास्थ्य संबंधी मुद्दा माना जाए और आवश्यकता पड़ने पर शीघ्र बचाव एवं स्वास्थ्य देखभाल, व्यापक मेडिकल देखभाल और पीड़ित व्यक्तियों को लगातार सहायता सुनिश्चित किया जाए। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में इसके लिए जेंडर आधारित हिंसा से निपटने के लिए विशेष नीति बनायी जाए | ट्रांसजेंडर समुदाय पे होने वाली हिंसा से निपटने और सामाजिक, राजनैतिक और कानूनी अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए विशेष ध्यान देने की जरूरत है | ट्रांसजेंडर पर्सन्स(प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स) बिल, 2018 को ट्रांसजेंडर समुदाय की मांगों के आधार पर केंद्र सरकार को संशोधित करने की जरूरत है | जेन्डर-आधारित हिंसा से निपटने के लिए शासन की कुछ तंत्र है जैसे पुलिस, सखी वन स्टॉप सेंटर, डिस्ट्रिक्ट प्रोटेक्शन ऑफिसर, अस्पतालों और पुलिसद्वारा पालन किये जाने वाले नियम है जिनका कडाई से पालन हो |

4. नसबंदी काण्ड को तीन साल हो गए लेकिन आज भी दोषियों पे कोई कार्यवाही नहीं हुई है | सरकार नसबंदी काण्ड से सीख लेने में असफल रही है जहां आज भी महिलायों को सरकारी अस्पतालों में नसबंदी सेवाएं नहीं मिल रही| सरकार को गर्भनिरोध के अस्थायी साधनों और पुरुषों की भागीदारी बढाने पर जोर देने की जरूरत है जिसके लिए एक मजबूत स्वास्थ्य तंत्र होना चाहिए |

5.प्रदेश में महिलायों और बालिकायों की आवासीय संस्थायों जैसे कन्याआश्रम, जुवेनाइल होम्स, हॉस्टल में पिछले सालों में कई लैंगिक हिंसा के मुद्दे आये है और साथ ही इसमें रहने की स्थिति खराब है जिसे निपटने के लिए सरकार कड़ी निगरानी के लिए कदम उठाये | इसके लिए सरकार द्वारा स्वतंत्र सोशल ऑडिट का प्रावधान किया जाए जिसमें महिला संगठनों को भी शामिल किया जाए |

6. मूलभूत शासकीय सेवायों जैसे शिक्षा , स्वास्थ्य , पोषण पर सरकार तंत्र पूर्ण रूप से जिम्मेदारी ले| इसमें निजीकरण , पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप्स, आउटसोर्सिंग, ठेका प्रथा बंद की जाए | लोगों को प्राथमिक से टरशिअरी स्तर तक पूर्ण रूप से निःशुल्क और गुणवत्तापूर्वक स्वास्थ्य सेवाएं जिसमें सभी आवश्यक औषधीयाँ एवं जांच सेवाएं सुनिश्चित की जाए|

7. मजदूर महिलायों को समान वेतन एवं मजदूर वर्ग को कार्यस्थल में सुरक्षा के लिए कानूनों का सख्ती से पालन किया जाए | न्यूनतम वेज , पर्याप्त क्षतिपूर्ति, सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व सहायता, झूलाघर की उपलब्धता एवं कार्यस्थल में हिंसा और शोषण मुक्त वातावरण सुनिश्चित करना अत्यंत जरूरी है | मितानिन आंगनवाड़ी , मध्यान्ह भोजन रसोइया और अन्य असंगठित मजदूरों को नियमित किया जाए , न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया जाए |

8.. सरकार के कुछ कदम जैसे पत्रकार सुरक्षा कानून और आदिवासी बंदी की रिहाई के लिए बनायी गयी जांच समिति का हम स्वागत करते है| हम उम्मीद करते है की इससे राज्य में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आदिवासियों पर दमन की कड़ी बंद होगी और उम्मीद करते की यह जांच समिति समयबद्धऔर संवेदनशील तरीके से क्रियान्वन करे और इससे बंदियों की रिहाई करे | हम राज्य सरकार से मांग करते है की देश में भीमा कोरेगांव के नाम पर सुधा भारद्वाज और अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई के लिए महाराष्ट्र और केंद्र सरकार पर दबाव डाले | वही छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्यूरिटी एक्ट, जिसका राज्य में नक्सल उन्मूलन के नाम पे आदिवासियों के दमन में इस्तेमाल होता आया है | बस्तर में राजनातिक बंदी खासकर महिला राजनैतिक बंदियों की रिहाई के लिए कदम उठाये जाए |

9. पेसा और वनाधिकार कानून का पालन किया जाए जिसमें आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित हो | महिलायों के लिए इन कानूनों के अधिकारों जैसे कानूनी मालिकाना, समिति और निर्णय लेने में भागीदारी , इसका पालन हो | उच्चत्तम न्यायालाय के निरस्त पट्टों के आदिवासियों को जमीन से बेधाखाल करने के निर्णय का सबसे ज़्यादा प्रभाव महिलायों पर पढेगा जो रोजमर्रा के कामों के लिए जंगल पर निर्भर है | इस फैसले का राज्य सरकार विरोध करे और आदिवासी अधिकारों के लिए पैरवी करे|

10. राज्य में हिंदूवादी और जातिवादी ताकतों द्वारा अल्पसंख्यकों पर हमले के मुद्दों पर सरकार कार्यवाही करे एवं उनके संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा करे | राज्य में हो रहे गौ ह्त्या और धर्मांतरण के नाम पे हो रही हिंसा और गिरफ्तारियों पे समिति का गठन करके कारवाई की जाए |

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