7.03.2019

एक अकेले व्यक्ति की जान भी कितनी कीमती हो सकती है इसका क्षणिक अहसास भारत की जनता ने कुछ दिन पहले किया। जी हां, मैं भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान का ही जिक्र कर रहा हूं। हमें जैसे ही मालूम पड़ा कि पाकिस्तान ने हमारे एक जांबाज पायलट को पकड़ लिया है वैसे ही पूरे देश में चिंता की लहर फैल गई। अभिनंदन के खून से सने चेहरे का जो फोटो वायरल हुआ उसने हमको भीतर तक बेचैन कर दिया। देश में जगह-जगह लोग अभिनंदन की सलामती के लिए दुआएं करने लगे, पूजास्थलों में हवन-पूजन होने लगे और हमें यकायक समझ में आया कि युद्ध कोई सस्ता सौदा नहीं है। अगले दिन जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपनी संसद में अभिनंदन को बतौर सद्भावना नि:शर्त रिहा करने घोषणा की तो भारवासियों ने राहत की सांस ली और सबके चेहरे खुशी से खिल उठे। लेकिन अभी पटाक्षेप होना बाकी था।

अगले दिन सुबह से टीवी चैनलों की टीमें वाघा बार्डर पर जाकर डट गई थी। अलसुबह से लेकर रात साढ़े नौ बजे तक सस्पेंस का वातावरण बना रहा। किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि अभिनंदन की घर वापसी कब होगी। शाम होते-होते तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे। टीवी स्टूडियो में भांति-भांति के कथित विशेषज्ञ आकर बैठ गए। पाकिस्तानी इरादों पर फिर से शक किया जाने लगा। अंतत: जब अभिनंदन को भारतीय सीमा की ओर आते दिखाया गया तो कहीं यह बात होने लगी कि साथ में महिला कौन है; कहीं बहादुर सैनिक की बॉडी लैंग्वेज (देह भाषा) पढ़ी जाने लगी; कहीं उसकी बहन द्वारा कथित तौर पर लिखी गई कविता का पाठ हो रहा था; तो कहीं हवाई जहाज में दिल्ली आ रहे उसके माता-पिता की तस्वीरें दिखाई जा रही थीं। याने कुल मिलाकर जो युद्ध और शांति के बारे में विचार मंथन का एक अवसर हो सकता था उसे हल्की-फुल्की चर्चाओं और दृश्यों में उड़ा दिया गया।

आज भी स्थिति लगभग वही है। युद्ध की क्या कीमत चुकाना पड़ती है, इस बारे में बात करने से हम कतरा रहे हैं। भारत उपमहाद्वीप में स्थायी शांति कैसे स्थापित हो सकती है, इस पर बात करने में हमारी कोई दिलचस्पी दिखाई नहीं देती। दोनों प्रमुख राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप में अपनी शक्ति जाया कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी पुलवामा और बालाकोट की घटनाओं का हर तरह से राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है, तो दूसरी ओर कांग्रेस की कोशिश है कि ऐसा न होने दिया जाए। इस बीच अधिकतर राजनीतिक दल अपनी-अपनी सुविधा से इस पूरे घटनाचक्र पर टिप्पणियाँ कर रहे हैं। स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री सबसे ज्यादा गरज रहे हैं। उन्होंने अभिनंदन की रिहाई की घोषणा के तुरंत बाद जो टीका की वह वांछित नहीं थी। उन्होंने कहा कि यह तो पायलट प्रोजेक्ट है, असली खेल तो इसके बाद होगा।

यह कहकर नरेन्द्र मोदी क्या सिद्ध करना चाहते थे? क्या युद्धक विमान उड़ाने वाला फाइटर पायलट अभिनंदन वर्धमान एक प्रयोग मात्र था? और सवाल यह भी है कि आगे आप क्या करना चाहते हैं? सोमवार को श्री मोदी ने अहमदाबाद में कहा कि हम घर में घुसकर बदला लेंगे। जब एक तरफ सिर्फ एक सैनिक की गिरफ्तारी से उपजे भय और रिहाई की घोषणा से मिली राहत है, तब दूसरी तरफ आक्रामक मुद्रा अपनाकर हम क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या भारत और पाकिस्तान के बीच आर-पार की लड़ाई संभव है? अगर है तो उसके अंतिम नतीजे क्या होंगे? अपनी स्मृति में हमने जो लड़ाइयां देखी हैं उनके परिणाम आखिरकार क्या निकले? हमें भारत-चीन और भारत-पाक ही नहीं, कोरिया, वियतनाम, कांगो, ईरान, इराक, यमन, सीरिया, इजराइल, श्रीलंका, कंबोडिया आदि में क्या हुआ वह भी याद कर लेना चाहिए।

मेरे सामने सामरिक और रणनीति विशेषज्ञ अजय साहनी का हाल ही में इंडिया टुडे में प्रकाशित लेख है। इसमें उन्होंने पुलवामा की त्रासदी को केन्द्र में रखकर आंकड़े दिए हैं कि छत्तीसगढ़ के चिंतलनार में 2010 में माओवादियों ने 76 सैनिकों को मार दिया। 2008 में गुवाहाटी में एक आतंकीे हमले में 87 जन मारे गए। 2010 में ही माओवादियों द्वारा ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को पटरी से उखाड़ दिए जाने से 148 जनों की मृत्यु हुई। 2008 के मुंबई आतंकवादी हमलों में 175 लोग मारे गए। जबकि 2006 के मुंबई के रेल धमाके में 200 से अधिक लोग मारे गए। इस तरह हिंसक वारदातों की एक लंबी शृंखला बनती है जिसमें ताजा घटना पुलवामा की है जिसमें इसी 14 फरवरी को 42 जवान शहीद हुए। आशय यह कि एक घटना घटती है, हम कुछ समय के लिए उद्वेलित हो जाते हैं, प्रतिशोध लेने की बात करने लगते हैं और कुछ दिन बाद सब भूल जाते हैं।

मैं यहां पुलवामा में जवानों की शहादत और बालाकोट के बाद अभिनंदन की रिहाई- दोनों को आमने-सामने रखकर देखता हूं। हम जिस तरह अपने जवानों और निर्दोषजनों की मौत को भी कुछ दिन में भूल जाते हैं उसी तरह एक नागरिक या एक सैनिक की वास्तविक अथवा संभावित रिहाई को भी अधिक देर तक याद नहीं रखते। क्या हमें पायलट नचिकेता की याद है? क्या सरबजीत का प्रकरण हमारी स्मृति में है? जिंदगी और मौत की दहलीज पर खड़े कुलभूषण जाधव पर भी हमारा ध्यान कब जाता है? एक कटु सत्य है कि भारत ने युद्ध की विभीषिका का बहुत सीमित अनुभव किया है। बातें हम भले ही बड़ी-बड़ी कर लें। अभी दिल्ली में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का उद्घाटन हुआ। राष्ट्रपति देश के सशस्त्र बलों के सर्वोच्च सेनापति हैं, लेकिन एक ऐतिहासिक कार्यक्रम उनकी अनुपस्थिति में सम्पन्न हो गया। प्रधानमंत्री हमारे सुप्रीम लीडर जो ठहरे!

इस युद्ध स्मारक में 1947 से अभी हाल तक मारे गए छब्बीस हजार सैनिकों के नाम उत्कीर्ण हैं। एक दृष्टि में लग सकता है कि देश की अखंडता और सार्वभौमिकता की रक्षा के लिए इतनी बड़ी संख्या में सैनिकों ने प्राणोत्सर्ग किया है। लेकिन जब हम विश्व के कुछ अन्य देशों को देखते हैं तो एक नई तस्वीर उभरती है। अमेरिका ने वियतनाम युद्ध में कोई एक लाख सैनिक खोए होंगे। कोरिया में चीन और अमेरिका ने बहुत बड़ी संख्या में सैनिकों की बलि दी। खाड़ी युद्ध में मरने वालों की संख्या भी एक लाख के आस-पास ही है। और क्या आज कोई विश्वास करेगा कि द्वितीय विश्वयुद्ध में अकेले सोवियत संघ ने अपने दो करोड़ सैनिकों को खोया था। इन आंकड़ों को पेश करने का मकसद यह बतलाना है कि युद्ध किस तरह से किसी भी देश में तबाही ला सकता है। यह आंकड़े प्रकारांतर से यही दर्शाते हैं कि भारत अब तक इस मामले में सौभाग्यशाली रहा है कि हमें अब तक किसी लंबी चलने वाली लड़ाई का सामना नहीं करना पड़ा और लड़ाई का भूगोल भी सीमित रहा आया।

मैं कुल मिलाकर यह तर्क सामने रखना चाहता हूं कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है। जहां कहीं भी विवाद या समस्या है उसका समाधान आमने-सामने बैठकर बातचीत से ही निकाला जा सकता है। आज हमारी सबसे बड़ी समस्या कश्मीर प्रतीत होती है। इस बारे में भाजपा के पक्षधर और मोदी के मुरीद लार्ड मेघनाद देसाई तक कहते हैं कि- कश्मीर को स्वायत्तता देने में ही समस्या का हल है। इस ‘राष्ट्रभक्त’ की टिप्पणी पर आप क्या कहेंगे? मेरा अपने पाठकों से निवेदन है कि हमारे देश में जो उग्रवादी ताकतें कारपोरेट मीडिया का इस्तेमाल कर युद्ध का वातावरण बना रही हैं उनसे सतर्क रहें। दूसरी ओर यह जानने की कोशिश करें कि देश के भीतर या सीमापार से जो आतंकवादी गतिविधियां संचालित हो रही हैंं उनके असली सूत्रधार कौन हैं? इस विमर्श से ही शांति का मार्ग खोलने के संकेत मिल पाएंगे।

ललित सुरजन ,संपादक 

देशबंधु में 07 मार्च 2019 को प्रकाशित