दस्तक, मार्च-अप्रैल 2019, अंक का संपादकीय

8 मार्च अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस हमारे सामने है। इस दिन महिलायें पितृसत्ता के कारण दमित कर दिये गये उनके अधिकारों के खिलाफ एकजुट लड़ाई का संकल्प दोहराती हैं। महिला आन्दोलनों का ही नतीजा है कि वे हर क्षेत्र में पुरूष वर्चस्व को तोड़ समाज का जनवादीकरण कर रही हैं। लेकिन फासीवाद के इस दौर में महिलाओं की लड़ाई सामाजिक पितृसत्ता के बरख़्श राजकीय पितृसत्ता के खिलाफ अधिक केन्द्रित करनी ही पड़ेगी, क्योंकि इस दौर में महिलाओं पर हमले की बर्बरता बढ़ जाती है और महिलाओं को पीछे ढकेलने का काम सत्ता के स्तर पर तेज कर दिया जाता है। पिछले कई सालों से महिलाओं पर हो रही हिंसा और उस पर सरकारों के रूख से यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

महिलाओं पर हिंसा और असमानता का व्यवहार तो सदियों से है, जब से समाज में पितृसत्ता का जन्म हुआ। लेकिन यह समाज विज्ञान का नियम है कि समाज धीरे- धीरे जनवादीकरण की ओर बढ़ता है, शोषितों-वंचितों की चेतना और आन्दोलन इसमें मुख्य भूमिका निभाते हैं। पूरी दुनिया की तरह भारत में भी महिलाओं के आन्दोलनों ने संविधान में महिलाओं को बहुत से हक़-अधिकार दिलाये। जो वहां से नहीं मिल सका, उसके लिए वे आगे भी आन्दोलनरत रहीं और अपने अधिकार हासिल करती रहीं, उनकी बढ़ती चेतना के कारण इस पितृसत्तात्मक समाज को उनके हिस्से का धरती-आसमान छोड़ना ही पड़ रहा है। वास्तव में ये सिर्फ अपने अधिकार हासिल करने की बात नहीं, बल्कि समाज के जनवादीकरण की भी प्रक्रिया है। लेकिन पूंजीवाद की आर्थिक मंदी से उपजा फासीवाद इस प्रक्रिया को जबरन रोकने का काम करता है। वह इतिहास के इस आगे बढ़ने वाले पहिये को उल्टा घुमाने का प्रयास करता है। जाहिर है इसका असर दलितों और महिलाओं पर ही ज्यादा होगा। ये समाज का पहिया आगे घुमाने वाले वर्ग के उन अर्न्तविरोधों को तेज करने का काम करता है, जिससे उनकी निर्मित होती एकता टूटे, और उनकी मुनाफाखोर व्यवस्था किसी तरह कायम रह सके। ऐसे दौर में फासीवाद से लड़ाई दूसरे समुदायों के साथ महिलाओं के लिए भी जरूरी हो जाती है। इसके कुछ कारण है-

पहला यह कि-फासीवाद दरअसल पूंजी के बर्बर एकाधिकारी रूप की एक अभिव्यक्ति है। वह एकाधिकार सिर्फ आर्थिक क्षेत्र में ही कायम नहीं करता, बल्कि यह समाज और संस्कृति में भी कायम होता जाता है। यह एकछत्र एकाधिकार की प्रवृत्ति पूंजी से लेकर ‘एक धर्म’, ‘एक संस्कृति’, ‘एक वर्ण’ से होता हुआ ‘एक जेण्डर’ तक पहुंचता है। जाहिर है पितृसत्तात्मक समाज में यह एकाधिकारी जेण्डर पुरूष का ही होगा। इसे हम अपने समाज में घटित होता पहले से ही देख रहे थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसे घनीभूत होते भी देख रहे हैं। रोजगार से लेकर शिक्षा तक, यहां तक कि धर्म-कर्म तक पुरूषों का वर्चस्व न सिर्फ कायम है, बल्कि महिला और दूसरे जेण्डर के लोगों के जनवादी अधिकारों के रास्ते में सत्ता बाकायदा असमानता के कानून और गुण्डों से लैस होकर खड़ी है। सबरीमाला में महिलाओं को न जाने देना इसका ही उदाहरण है। तीन तलाक को ‘धर्म विरोधी’ बताते हुए खारिज करना भी इसका उदाहरण है। ये दोनों मामले सत्ता की ओर से महिलाओं को स्पष्ट सन्देश है कि ‘‘जो धर्म में है उसका पालन उन्हें करना ही होगा, भले ही इससे उनके जनवाद का हनन होता हो।’’

दूसरे-फासीवाद महिलाओं की यौनिकता को नियन्त्रित करने का प्रयास तेज करता है। भारत में वर्ण/जाति और धर्म की ‘रक्त शुद्धता’ को बनाये रखने यानि जाति व्यवस्था बनाये रखने के लिए मनुवाद ने महिलाओं के प्रेम करने की आज़ादी पर पहरे लगाये थे। महिलाओं ने मनुस्मृति को धता बताकर कुछ दशकों पहले ही प्रेम की आजादी को बड़े पैमाने पर जीना शुरू किया है, जिस पर सामाजिक हमले भी होते रहे हैं। लेकिन फासीवाद के दौर में औरत की इस आजादी को ‘लव जिहाद’ का नाम देकर हमले किये जा रहे हैं और सत्ता हमलावरों के साथ खड़ी है। केरल की अखिला का मामला इसका सटीक उदाहरण है, जिसने एक मुसलमान युवक से शादी की, तो उसकी जांच एनआईए से करायी गयी। तेलंगाना की अमृता इसका उदाहरण है, जिसने दलित लड़के से शादी की, तो सत्ता में पैठ रखने वाले उसके पिता ने अमृता के पति की हत्या उसके सामने ही करवा दी। उदाहरण और भी हैं।

तीसरा यह कि- फासीवादी राज्य महिलाओं पर हमलों को ढंके-छुपे तौर पर नहीं, बल्कि खुल्लमखुल्ला प्रोत्साहित करता है। सोनी सोरी को याद कीजिये, पुलिस कस्टडी में जिसके गुप्तांग में कंकड़ भर दिये गये और ऐसा करने वाले अंकित गर्ग को राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया, बस्तर की आदिवासी औरतों पर अमानवीय यौन हिंसा करने वाले पुलिस अधिकारी कल्लूरी को भाजपा सरकार ने पुरस्कृत किया और कांग्रेस सरकार ने उसकी नियुक्ति फिर से उसी जगह करके सम्मानित किया। जबकि बस्तर की औरतों पर सेना के जवानों, अर्द्धसैनिक बलों और पुलिस की यौन हिंसा जारी है। गुजरात, मुजफ्फरनगर को याद करिये- सत्ता हमेशा महिलाओं पर हिंसा करने वालों के पक्ष में खड़ी रही। पिछले साल पूरे देश को हिला देने वाले कठुआ में आसिफा के बलात्कार में तो सत्ताधारी पार्टी ने पूरी बेशर्मी के साथ बलात्कारियों के पक्ष में तिरंगे के साथ जुलूस निकाला।

इन तीनों बातों का निष्कर्ष यही है कि फासीवाद हमेशा एक नस्ल, धर्म, समुदाय के खिलाफ दूसरे नस्ल, धर्म, समुदाय को खड़ा करता है, जिसमें उसका पक्ष तय रहता है। अलग-अलग देश स्थान के अनुरूप पीड़ित समुदाय बदल जाता है, लेकिन महिलायें हर जगह पीड़ित समुदाय का आवश्यक अंग होती हैं। महिलायें फासीवाद का आवश्यक शिकार होती हैं, इसलिए फासीवाद के खिलाफ लड़ाई का आवश्यक अंग होना भी उनके लिये जरूरी है। जब फासीवाद सामने हो, तो उससे लड़े बगैर महिला आन्दोलनों को आगे बढ़ाना मुमकिन नहीं।

एक अन्तिम बात यह कि- फासीवाद और ‘राष्ट्रवाद’ दोनों का गहरा जुड़ाव हैं। फासीवाद हमेशा, हर दौर में, हर देश में ‘राष्ट्रवाद’ को ढाल बनाकर जनता से लड़ता है और मानवतावाद पर हमले करता है। यह फासीवादी राष्ट्रवाद हमेशा ही महिला विरोधी होता है। मूलतः यह एक मर्दवादी अवधारणा है, क्योंकि यह सत्ता द्वारा बताये गये दुश्मन के खिलाफ पुरूषत्व का प्रदर्शन है। इसकी ललकार की भाषा मर्दवाद से लबरेज़ है, जो कि हमेशा दुश्मन खेमे की महिला पर यौन हमला करने वाली गालियां होती है। इन गालियों को हम महिलायें इन दिनों हर जगह, राष्ट्रवादी जुलूसों में सुन रहे हैं। यह राष्ट्रवादी उन्माद भी देश भर में महिलाओं के लिए बन रहे जनवादी माहौल को छिन्न-भिन्न कर रहा है, (लेकिन इसके खिलाफ बोलने भर से देशद्रोही का तमगा सत्ता की ओर से दिया जा सकता है)। यह उन्माद देश भर में महिला विरोधी माहौल तैयार कर रहा है, जिसमें महिलाओं से बद्तमीजी, बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी होने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए महिला आन्दोलनों की ही बड़ी जिम्मेदारी है कि फासीवाद द्वारा पैदा युद्ध के इस राष्ट्रवादी उन्माद को रोकें।

आज महिला आन्दोलन की जरूरत है कि वे इस महिला दिवस पर हिन्दुत्व फासीवाद के खिलाफ एकजुट होने और इसके खिलाफ अपनी लड़ाई को केन्द्रित करने का संकल्प लें।

***

सीमा आज़ाद 

संपादक दस्तक