रायपुर / 22.02.2019

सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी को एक अभूतपूर्व फैसला सुनाते हुए 21 राज्यों को आदेश दिया हैं कि वन अधिकार कानून के तहत निरस्त दावेदारों को बेदखल कर जंगल ज़मीन खाली करवाएँ. हालांकि सर्वोच्च न्यायलय सन 2015 का आंकड़े के हिसाव से पूरे देश में 10 लाख से ज़्यादा मूल निवासी परिवारों को अपनी जमीन और जंगल से बेदखली की बात कही गयी हैं. लेकिन दिसम्बर,2018 तक कि आंकड़े के हिसाव से कुल 23 लाख 30 हज़ार परिवार अर्थात करीब 1 करोड़ जनता को बेदखली अनिवार्य हो सकता है। ऐसा पहली बार होगा जब भारत में इतनी बड़ी संख्या में आदिवासियों और अन्य समुदाय का विस्थापन होगा .

यह सब सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार और अन्य राज्य सरकारों द्वारा सही पैरवी न करने के कारण हुआ है .केंद्र सरकार का वकील समूह ही कोर्ट में उपस्तिति होने के बावजूद चुप्पी साध लिए.

आज़ादी के पहले तथा बाद में देश के वन निवासियों के साथ संवेधानिक एवं कानूनी तौर पर हुए “ऐतिहासिक अन्याय” को सुधार तथा वन प्रशासन को लोकतान्त्रिक करने के लिए जिसमें ग्रामसभा को जंगल पर नियंत्रण के लिए लाये गए वन अधिकार कानून 2006 को सही ढंग से क्रियान्वयन न हो कर प्रारम्भ से ही सरकार तथा वन विभाग के नौकरशाह, कार्पोरेट परस्त संस्थाए इसका विरोध करते रहे और हर संभव तरीके से असफल करने में लगे रहे .

कानून बनाने की प्रक्रिया एवं बाद से ही सरकारें तथा अन्य निहित स्वार्थी तत्व इसकी अंदुरनी और बाहरी तौर पर विरोध जारी रखे रहे . सर्वोच्च न्यायलय में इस केस की सुनवाई के समय पिछले चार बार लगातार वहस में केंद्र सरकार के वकील नदारद रहे .कोई भी कानून की समर्थन में न्यायलय सरकार की पक्ष को प्राथमिकता दे कर सुनते हे, लेकिन सरकारें ही नदारद हो तो कोर्ट को गलत जानकारी दे कर गुमराह किया जाये तो क्या किया जा सकता हे .पिछले 5 साल में केंद्र सरकार का रवैया सारे जनपक्षीय कानून- वन अधिकार कानून को कमज़ोर करने के लिए वन मंत्रालय द्वारा समय समय जारी निर्देश, कांपा कानून,माइनिंग कानून,भू-अर्जन कानून, 2013 या अनुसूचित जाती एवं अनुसूचित जनजाति संवंधित कानूनों में संशोधन इत्यादि- को वद्लने या निरस्त करने का काम करते रहे हैं.

वन अधिकार मान्यता कानून का कार्यान्वयन की ज़िम्मेदारी जनजाति मंत्रालय की हे ,लेकिन केंद्र सरकार और राज्य सरकारें वन मंत्रालय तथा वन विभाग को इसकी अगुवाई करने की ज़िम्मेदारी दे कर इस कानून का धज्जियाँ उड़ाते गए. न इसकी प्रचार ,न सही प्रशिक्षण – लेकिन कानून की धारा 4 [5] के दिए गए प्रक्रिया को न अपनाते हुए घोषित या अघोषित रूप से विस्तापन जारी रखते हुए जंगले ज़मीन को कॉर्पोरेट के हाथ में देते गए ,यहाँ तक की वनक्षेत्र में घोषित “नो – गो” क्षेत्र को भी बदल कर माइनिंग कंपनियों को दे दी गया .

छत्तीसगढ़ की पिछली सरकार कानून के प्रावधानों को ही नज़रंदाज़ (पंचायत सचिव ,वन अधिकार समिति का सचिव ) कर दिए .पुरे देश में कहीं भी वन अधिकार कानून का सम्पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो पाया हे , न समाप्ति हुआ हे . गौर करने की बात हे की वन अधिकार की समाप्ति की घोषणा कानूनी तौर पर ग्राम सभा ही कर सकती हे .

अब तो छत्तीसगढ़ में कानून की सही क्रियान्वयन का उम्मीद जगी हे . इस समय सर्वोच्च न्यायलय को गुमराह कर कॉर्पोरेट परस्त सरकार जिस जन विरोधी निति अपनाने जा रही हे उस नापाक इरादे को छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन तीब्र भर्त्सना करते हुए इसकी जनवादी तरीके से विरोध जारी रखेगी. राजनैतिक दलों तथा अन्य जन जनआन्दोलनों से अपील करते हें की वे भी अपनी भूमिका सुनिश्चित करें और जंगले को ख़तम करने की इस षड़यंत्र में न फंसे .छत्तीसगढ़ सरकार से आग्रह हे की अपनी चुनावी घोषणा के तहत तथा इस सम्वन्ध में कांग्रेस पार्टी का अध्यक्षजी के निर्देशात्मक पत्र के मद्देनजर इस पर दुसरे राज्य सरकारों के साथ मिलकर न्यायलय में अपनी जनपक्षीय दलील चुस्त रूप में उठायें. .

**
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन
संयोजक समूह के और
विजय भाई नंदकुमार कश्यप
रिनचिन रामाकांत बंजारे
आलोक शुक्ला