अज्ञानता का आनंदलोक रचते एंकर .ः •उर्मिलेश उर्मिल

भारत और उसके लोकतंत्र की एक बड़ी समस्या इस देश के ज्यादातर न्यूज चैनल, खासकर हिन्दी और अंग्रेजी के चैनल बन गये हैं! इन चैनलों के ज्यादातर एंकर न सिर्फ नासमझ अपितु गैर-जिम्मेदार भी हैं! वे भयानक अहमन्य और असंवेदनशील हैं ! उनसे पूछिए कि कश्मीर में आतंकवाद, मिलिटेंसी और अलगाववाद पर उन्होंने अब तक एक भी किताब पढ़ी? क्या कभी सरहदी सूबे में समस्याओं को समझने के लिए वहां का सघन दौरा किया? इनका जवाब ‘ना’ में होगा! पर उनमें ज्यादातर आज सेना के उच्चाधिकारियों, सरकार के शीर्ष पदाधिकारियों और विपक्षी नेताओं को देर रात तक उपदेश देते रहे कि आतंक से लड़ने के लिए सरकार और सेना को अब क्या-क्या करना होगा!

वे यह मानने को तैयार नहीं कि शासन और सेना में टीवी एंकरों से ज्यादा समझदार और अनुभवी लोग भरे पड़े हैं! उनके विवेक पर भरोसा रखिए और रणनीतिक फैसला करने दीजिए!

इन एंकर महाशयों को सूचना, समझ, समाज, जनता और जनतंत्र की तनिक भी परवाह नहीं! वे सिर्फ अपने चैनल की कथित लोकप्रियता का शार्टकट खोजते हैं! जाहिर है, वे यह सब अपनी इच्छानुसार नहीं करते। अपने चैनलों की खास योजना के तहत वे अपने आकाओं की इच्छानुसार ये सब करते हैं।

ये एंकर बहुत नाज़ुक और चुनौतीपूर्ण दिनों में भी हमारे समाज और लोगों के समक्ष ‘अज्ञानता का आनंदलोक’ रचते हैं! लोगों को सूचना देने और और समाज की समझ बढ़ाने की बजाय वे सिर्फ पर्दे पर चीखना और शोर मचाना जानते हैं! वे सोच और संवेदना विहीन लोग हैं! उन्हें न कश्मीर के बारे में कुछ मालूम और न हमारे सैन्य मामलों की कोई जानकारी है! उन्हें सैन्य-आपरेशंस की भी कोई जानकारी नहीं! सैनिकों के जीवन और सरोकारों से भी उनका कोई लेना-देना नहीं! हमारे सैनिकों का मारा जाना उनके लिए पर्दे पर शौर्य प्रदर्शन का एक मौका बन जाता है! उन्हें नहीं मालूम कि हर समस्या का समाधान युद्ध नहीं है। कई बार बल्कि अक्सर ही युद्ध समस्याओं का समाधान नहीं, उनकी शुरुआत होता है! 

पर वे हमेशा युद्धोन्माद में जीते हैं और पर्दे पर भी युद्ध रचते हैं! ऐसा करते हुए वे आम लोगों को युद्धोनमाद बेचते हैं! चैनलों के स्टूडियो में ही वे एक ‘वॉर रूम’ बना लेते हैं! कई बार तो सैन्य वर्दी पहन तक लेते हैं! पर दिमाग से वे पैदल होते हैं! डरपोक, नेताओं के चाटुकार और स्वार्थी भी! ऐसे लोग हमारे राष्ट्र-राज्य, उसकी एकता-अखंडता और जनतंत्र के लिए सचमुच खतरनाक हैं! पता नहीं, हमारी पत्रकारिता को इस तरह के लोग कब तक कलंकित करते रहेंगे?

पुनश्न: एनडीटीवी को लेकर कई मुद्दों पर हमारे जैसे लोगों की समय-समय पर असहमति भी रही है पर यह कहना आज जरुरी है कि उसके हिंदी और अंग्रेजी, दोनों चैनलों ने कश्मीर में आतंकी-हमले पर अपेक्षाकृत बहुत संजीदा और समझदारी भरी रिपोर्टिंग और विश्लेषण पेश किया! जब देश में पत्रकारिता शर्मसार हो रही है, ऐसे वक्त इस चैनल का कवरेज आशा जगाता है कि कहीं न कहीं पत्रकारिता अभी जिंदा है! कुछ अन्य चैनलों के कुछेक एंकरों ने भी सूचना और जानकारी देने पर जोर दिया।

•उर्मिलेश उर्मिल

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