आलेख ःः कहानी लिंगो की जिन्होंने रची है सृष्टि, खोजा है संगीत बस्तर और समाजशास्त्र  ःः  राजीव रजन प्रसाद

14.02.2019

सृष्टि की रचना में लिंगों के योगदान का वर्णन करते हुए अनेक मौखिक साहित्य तथा जनश्रुतियाँ संकलित हैं। वह महान व्यक्तित्व जो सर्जक है, जीवन को रचता है, चांद और सूरज की रचना करता है, आग की खोज करता है, शराब की खोज करता है, संगीत का आदिपुरुष है, आखिर वह है कैसा? आमाबेड़ा परगने के गोत्र देवता लिंगो आज एक सर्वोच्च देवता के रूप में प्रतिष्ठित हैं और उनकी अपनी एक विशिष्ठ मर्यादा है।

लिंगों पर आधारित कविताओं, कहानियों, जनश्रुतियों का एकत्रीकरण करने के पश्चात मेरे संकलन में इस संदर्भ की दो सौ से अधिक कहानियाँ संग्रहित हो गयी है। एल्विन, ग्रिग्सन, लाला जगदलपुरी, राम सिंह ठाकुर, डॉ. हीरालाल शुक्ल आदि अनेक विद्वानों ने लिंगों की बहुतायत कथा-कविता को एकत्रित कर उसका सरलीकरण करने का प्रयास किया है। इन संदर्भों और बस्तर से सम्बंधित उपलब्ध मौखिक साहित्य को आधार बना कर लिंगों की कहानी के पुनर्प्रस्तुतिकरण का एक प्रयास मैंने भी किया है।

नारायनपुर के समीप रावघाट पर्वत श्रृंखला क्षेत्र में कभी वे सात भाई रहा करते थे। वह क्षेत्र ‘दुगान हूर` के नाम से जाना जाता था। इन्ही सात भाइयों में सबसे छोटे भाई का नाम था ‘लिंगो`। लिंगो न केवल अपने भाईयों की तुलना में बलिष्ठ और सुन्दर थे बल्कि वह चमत्कारिक और बुद्धिमान भी थे। कहते हैं वे एक साथ बारह प्रकार के वाद्ययंत्र समान रूप से बजाता लेते थे। खेत-खलिहान तथा अन्य काम के समय सभी छह भाई सवेरे से अपने- अपने काम में चले जाते। छहों भाइयों का विवाह हो चुका था, लिंगो अकेले ही अविवाहित थे। लिंगो न केवल अपने भाइयों का, बल्कि वह अपनी छहों भाभियों के भी प्यारे थे। लिंगो सुबह उठते ही संगीत-साधना में जुट जाते। उनके संगीत में ऐसा सम्मोहन था कि छहों भाभियाँ अपने सारे काम भूल कर मन्त्र-मुग्ध हो सुना करती थीं।

इस संगीत ने लिंगो के भाइयों और भाभियों के बीच तकरार करा दी। आखिर समय पर खाना न बने और खलिहान में काम कर रहे उनके पतियों तक देर से पहुँचे तो झगड़े होने ही थे। छहों भाई लिंगो से नाराज हो गये। क्यों न हो? लिंगो का संगीत बाकी छ: भाईयों की गृहस्थी खराब कर रहा था। पति थक-हार कर घर लौटते और पाते कि लिंगो का संगीत चल है और उनकी पत्नियाँ मन्त्र-मुग्ध सुन रहीं हैं। भाईयों की समझाईश से भी लिंगो का संगीत प्रेम कम नहीं हुआ। सभी पतियों को अपनी पत्नियों और लिंगो के परस्पर सम्बंधों को ले कर शक होने लगा। इसी से झगड़ा बढ़ गया। अब भाईयों ने लिंगो को ही मार देने की योजना बना ली। अपने पतियों का साथ पत्नियों को भी देना ही पड़ा चूंकि अब बात ‘शक’ की थी। योजना बना कर सातो भाई शिकार करने गए। जंगल पहुँच कर अपनी योजना के अनुसार सभी भाईयों ने एक पे़ड़ की खोह में छुपे बरचे को मारने के लिये लिंगो को पे़ड़ पर चढ़ा दिया और स्वयं उस पे़ड़ के नीचे तीर-कमान साध कर खड़े हो गये। बरचे, गिलहरी प्रजाति का है। गिलहरी से थोड़ा बड़ा जन्तु होता है। बरचे का रंग भूरा और पूँछ लम्बी होती है। इसका शिकार कर के आदिवासी बड़े चाव के खाते हैं।

लिंगो पे़ड़ पर चढ़ गये और बरचे को तलाशने लगे। इसी समय एक भाई ने मौका देख कर नीचे से तीर चला दिया। तीर लिंगो की बजाय पे़ड़ की शाख पर जा लगा। पे़ड़ बीजा का था। तीर लगते ही शाख से बीजा का रस जो लाल रंग का होता है, नीचे टपकने लगा। छहों भाइयों ने सोचा कि तीर लिंगो को लगा है और यह खून उसी का है। अब लिंगो का जीवित रहना मुश्किल है, सोच कर सभी भाई वहाँ से घर भाग आये। इधर लिंगो को समझ नहीं आया कि उसके भाई उसे अकेला छोड़ कर भाग क्यों गये। घर पहुँच कर चुपके से अपने भाई और भाभियों की बातें सुनीं तो उनके रोंगटे खड़े हो गये। उन्होंने किसी को नहीं बताया कि वे अपने विरुद्ध हुई साजिश का सच जान गये हैं। लिंगो इस तरह से घर के भीतर आये जैसे कि कुछ सुना ही न हो। उन्हें जीवित देख कर भाईयों-भाभियों को बड़ा आचर्य हुआ। लेकिन बात आयी-गयी हो गयी।

दिन फिर पहले की ही तरह गुजरने लगे। अब लिंगो का अब विवाह ऐसे परिवार में किया गया जहाँ लोग जादू-टोना जानते थे। उसकी पत्नी भी यह विद्या जानती थी। इसलिये स्थिति यह हुई कि परिवार में कभी कोई बच्चा या भाई-भाभी बीमार पड़ते तो हर बार छोटी बहू पर ही शक की सुई जा ठहरती थी, कि वही सब पर जादू- टोना कर रही है। छहों भाइयों ने छोटे भाई और बहू को घर से बाहर निकाल दिया। उन्हें सम्पत्ति में भी हिस्सा नहीं मिला, बस भाईयों ने यादगार के तौर पर एक ‘मोह्ट’ दे दिया। मोह्ट अँग्रेजी के ‘यू` आकार की एक चौड़ी कील जैसी जोती है जिससे हल फँसा रहता है। लिंगो उसे ले कर अपनी पत्नी के साथ वहाँ से चल पड़े। चलते-चलते वे एक गाँव के पास पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि धान की मिजाई करने के बाद निकला ढ़ेर सारा पैरा या पुआल खलिहान में रखा हुआ था। घर से निकलने के बाद से लिंगो और उसकी पत्नी भूखे थे उन्होंने इसी पुआल को दुबारा मींज कर कुछ धान अपने लिये निकाल लेने का अनुरोध किसान से किया। उस किसान ने लिंगो की पूरी कहानी सुन कर उसे मिजाई करने की अनुमति दे दी। लिंगो ने गाँव के लोगों से बैल माँगे और ‘मोह्ट` को उसी स्थान पर स्थापित कर मिजाई शुरु की। मिजाई पूरी होने पर गाँव वालों ने देखा कि उस पैरा से ढ़ेर सारा धान निकल गया है। सब आश्चर्य चकित हो गये और लिंगो को चमत्कारी पुरुष मान लिया गया। लिंगो उस गाँव के देवता बन गये और वहीं बस गये।

अब लिंगो की कीर्ति गाँव के बाहर भी फैली और उसके भाइयों के कानों तक बात पहुँची। उसकी प्रगति सुन कर भाइयों को बड़ी पीड़ा हुई। उन्होंने पुन: लिंगो को मार डालने की योजना बनायी और सब सेमरगाँव आ पहुँचे। भाईयों ने बारह गाँव से लोहार मंगा कर बड़ा सा कड़ाह तैयार करवाया। उसके भाईयों ने बारह बैल गाड़ियों में से लकड़ी इकट्ठा की फिर इस कडाहे में तेल डाल कर नीचे आग लगायी गयी। लिंगो को पकड़, उस कडाहे में उतार कर ढ़क्कन बंद कर दिया गया। यह लिंगो की पवित्रता की अग्निपरीक्षा थी। लिंगो नहीं मरे। अंदर ठंडक ही रही और आग में से भाईयों को उन अट्ठारह वाद्य यंत्रों की आवाज आती रही जिन्हें बजाने में लिंगो प्रवीण थे.

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राजीव रंजन प्रसाद, 

लेखक मूल रूप से बस्तर (छतीसगढ) के निवासी हैं तथा वर्तमान में एक सरकारी उपक्रम एन.एच.पी.सी में प्रबंधक है। आप साहित्यिक ई-पत्रिका “साहित्य शिल्पी” (www.sahityashilpi.in) के सम्पादक भी हैं। आपके आलेख व रचनायें प्रमुखता से पत्र, पत्रिकाओं तथा ई-पत्रिकाओं में प्रकशित होती रहती है। बस्तर पर आपके उपन्यास और शोधपरक लेख देश में ख्याति प्राप्त है .

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