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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए अपूरणीय क्षति!

संजय पराते , राज्य सचिव .छत्तीसगढ़ माकपा 

13.02.2019

हालांकि वे 1995 में सीपीआई से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में आये थे, लेकिन सीपीआई के साथियों के प्रति उनमें कभी कटुता नहीं रही. वामपंथी एकता के वे प्रबल पक्षधर रहे, लेकिन सैद्धांतिक दृढ़ता के साथ!! वकालत के पेशे को उन्होंने गरीबों और खासकर आदिवासियों के शोषण और लूट के खिलाफ औजार बनाया. सरगुजा में भूस्वामियों के खिलाफ चले भूमि संघर्ष के वे नेता बनकर उभरे. इस आंदोलन के बाद हजारों आदिवासियों को अपनी जमीन में खेती का अधिकार मिला. नगेशिया जाति के आदिवासियों को, जो भूमि अभिलेख में किसान के रूप में दर्ज है, उनके अधिकार दिलाने की लड़ाई में वे हमेशा आगे रहे. अपनी इस विशेषता के कारण साझा वामपंथी आंदोलन और आदिवासियों के लोकप्रिय नेता रहे.

आदिवासियों के भूमि आंदोलन में लुण्ड्रा में चितालता नामक स्थान पर पुलिस ने दो भाई-बहन कंवल साय और पिछारी बाई की निर्मम हत्या कर दी थी. उनकी शहादत पर हर साल यहां मेला लगता है. इस मेले के आयोजन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी. अपनी बीमारी के अंतिम दो सालों को छोड़कर, जब वे अपने इलाज के चलते अंबिकापुर में ही नहीं थे, हमेशा इस मेले को सजाने-संजोने में, इस मेले में होने वाली पार्टी की राजनैतिक सभा को अंतिम रूप देने में व्यस्त रहते थे. यह मेला उनकी वार्षिक राजनैतिक व्यस्तता का एक अहम हिस्सा होता था.

सीपीआई से आने के बाद वे माकपा के संयुक्त सरगुजा जिले के जिला सचिव बने, उसके बाद राज्य समिति सदस्य, और फिर छत्तीसगढ़ में दो कार्यकालों तक राज्य सचिव मंडल सदस्य भी. अस्वस्थ्यता के कारण उनकी नियमित गतिविधियों में कमी आई, लेकिन पिछले कार्यकाल तक राज्य समिति के विशेष आमंत्रित सदस्य रहे. पहले मध्यप्रदेश में और फिर छत्तीसगढ़ में किसान सभा के राज्य उपाध्यक्ष भी रहे. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपनी सक्रियता, व्यक्तित्व और आम जनता से मिलनसारिता के गुणों के कारण उस जगह पहुंच जाते है, जिनके बिना पार्टी और आंदोलन की कल्पना भी नहीं की जा सकती.

कामरेड_अशोक_सिन्हा_इन्हीं_बिरले_लोगों_में_से_एक_थे.

छात्र जीवन में वे एआईएसएफ के जरिये पहले छात्र आंदोलन और बाद में विशाल वामपंथी आंदोलन से जुड़े. अपनी पढ़ाकू प्रवृत्ति के कारण वे शीघ्र ही उस वामपंथी बौद्धिकों की जमात में शामिल हो गए, जिनसे राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की जा सकती थी. इन विषयों पर उनका एक दृढ़ राजनैतिक दृष्टिकोण होता था, जिससे सहमत होने या असहमति रखने का आपका अधिकार सुरक्षित था. अपनी पढ़ाकू प्रवृत्ति के कारण पुस्तकों को ‘दबाने” की कला में भी सिद्धहस्त थे.

उनके_जाने_की_खबर_से_ही_ऐसा_लग_रहा_है_कि_समय_कहीं_ठहर_सा_गया_है.

लेकिन कुछ समय का यही ठहराव सब साथियों को अपने काम को पुनर्संगठित करने की प्रेरणा देगा. एक छोटा-सा पार्टी आफिस उनका सपना था. इसके लिए उन्होंने बहुत-से जतन भी किये थे, लेकिन यह सपना आधा-अधूरा रह गया, पार्टी के आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण भी. लेकिन हम सभी साथी और कामरेड सिन्हा के परिवारजन, जो पार्टी के बहुत-बहुत ज्यादा नजदीक है, मिलकर उनके इस सपने को पूरा करेंगे. निश्चित ही, अब जो आफिस बनेगा, कामरेड अशोक सिन्हा के नाम और यादों को संजोकर ही बनेगा और वामपंथी आंदोलन के एक शक्तिशाली संघर्ष-केंद्र के रूप में विकसित होगा.

कामरेड_अशोक_सिन्हा_को_यही_सच्ची_श्रद्धांजलि_होगी.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी उनकी अमूल्य यादों को सहेजते हुए उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है और उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति अपनी संवेदना का इजहार करती है. पार्टी के केंद्रीय सचिवमंडल के सदस्य और छत्तीसगढ़ प्रभारी कॉ. जोगेंद्र शर्मा और छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश से जुड़े पार्टी परिवार के अनेकों साथियों ने भी उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है और उनके द्वारा छोड़े गए अधूरे कामों को पूरा करने का संकल्प व्यक्त किया है.

*लाल_झंडा_लेकर_कामरेड_आगे_बढ़ते_जाएंगे*
*#तुम_नहीं_रहे_इसका_गम_है_पर_फिर_भी_बढ़ते_जाएंगे.*
*#कॉमरेड_अशोक_सिन्हा_को_लाल_सलाम!!

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