⚫ पुरातात्विक अध्ययन : भोरमदेव का शिव मंदिर : अजय चंन्द्रवंशी ,कवर्धा .

11.02.2019
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में स्थित भोरमदेव का शिव मंदिर अपनी स्थापत्य की उत्कृष्टता और पुरातत्विक समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है। उस पर सुरम्य भौगोलिक स्थिति पर्यटकों के मन मे उसके प्रति आकर्षण को और भी बढ़ा देता है। 9 वी से 14 वी शताब्दी के लगभग इस क्षेत्र में फणिनागवंशियों का शासन था।नागवंशी और भी शासक हूए हैं मगर फणिनागवंश का इसके अलावा और कहीं पता नही चलता। बस्तर के छिंदक नागवंशियों से भी इनके सम्बन्धों के कोई साक्ष्य नही मिलते।तत्कालीन समय मे छत्तीसगढ़ क्षेत्र में चूंकि रतनपुर के कलचुरी शसक्त थे;इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि फणिवंशी उनकी आधीनता स्वीकार करते रहे होंगे। कई अभिलेखों में कलचुरी सम्वत के प्रयोग से इस बात को बल मिलता है। इसके अतिरिक्त फणिवंशी रामचन्द्र के कलचुरी कन्या अंबिका देवी से विवाह के अभिलेखीय साक्ष्य भी मिलता है। फणिवंशियो ने इस क्षेत्र में कई मंदिर बनवाये हैं जिनमे भोरमदेव का शिव मन्दिर कलात्मक रूप से उत्कृष्ट और सुरक्षित है। नागर शैली में निर्मित इस मंदिर के बाह्य दीवारों में मिथुन मूर्तियों की बहुलता तथा शिल्प में समानता के कारण इसकी तुलना खजुराहो के मंदिरों से की जाती है, और इसे छतीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है।
भोरमदेव का यह मंदिर जिला मुख्यालय कवर्धा से 18 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम दिशा में मैकल श्रेणी की पहाड़ियों के बीच चौरा ग्राम में स्थित है।मंदिर से लगा हुआ उत्तर में बृहत जलाशय है।
इस मंदिर के बारे में हमे प्रथम जानकारी आर.जेनकिन्स(1825) से मिलती है, जिन्होंने केवल उत्कीर्ण लेखों का ही जिक्र किया है।जेनकिन्स इसे ‘Bhyram Deo’ कहा है तथा दक्षिणी दीवार अभिलेख और योगी मूर्ति अभिलेख का जिक्र किया है। कनिंनघम (1881-82) ने मंदिर के बारे थोड़ा विस्तार से लिखा है-

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“The temple of Boram Deo is situated in a small circular valley of the Mekal range of hills near the village of chapri,11 miles to the east of the town of Kawardha, or Kamardha, as it is written in the maps.The valley is about one mile in diameter, with two narrow openings on east, which are covered by a long low ridge, standing out about a quarter of a mile from the foot of the range. The village of Chapri lies in the southern gap behind the ridge. The Boram Deo temple stands at the western end of a long embarkment which forms a large lake at the north side of the valley”.
” This temple of Boram Deo is often quoted as a proof of the antiquity of the Gond rule in Chattisgarh. I have already disposed of its antiquity as based on a misreading of a modern inscription. I can now add that it’s attribution to the Gonda is equally without foundation. The temple was certainly not dedicated to the Gond deity Boram Deo, but to Vishnu, Whose image is placed over the middle of the three entrances. It is said that the figure of the snake-god is the only image inside the temple, but this was not the case at the time of my visite, as there was a large figure of a bearded man sitting with join hands, which I take to be the image of the Raja’s religious adviser.”
“The real sculpture that belonged to the temple is now standing under a tree a few paces to the eastward. It is a large group of Vishnu and Lakshmi sitting on Garud.Vishnu has the usual four arms, holding the club, Shell and discus. The sculpture is 3 feet 9 inches high and 2 feet broad. As Vishnu is represented with his wife, the temple must have been dedicated to Lakshmi Narayan. Under the same tree there is a second group of Vishnu and Lakshmi, 1 foot 10 inches high and 1 foot 9 inches broad.”
“But whatever may be the date of the Boram Deo temple, whether it be assigned to the 10th, the 11th, or the 12th century, it is certain that it’s founder must have been both wealthy and powerful, as it is one of the most richly decorated temples that I have seen.”
” The temple of Boram Deo, or Buram Deo, is built on the common plane of most of it the medieval temples,with a square Mandapa, or hall, leading through a small antaral, or anteroom, into the sanctum. The temple faces the east, and has three entrances on the north, south, and east sides. It’s extreme dimensions are 60 feet in length by 40 feet in breadth. The Mandapa is 18 feet square inside, with four central pillars 8 feet apart and 12 side pillars or pilasters let into the surrounding walls. Each entrance has a small porch or anteroom 8 feet by 4 feet. The floor of the hall is raised 5 feet above the ground; but the floor of the sanctum is on the ground-level, and is reached by a descent by 5 steep steps from its ante-room. The sanctum is nearly 9 feet square, and at present contains a Lingam, which shows that the name of Boram Deo must be posterior to the time when the figure of Vishnu was removed to make way for the symbol of Siva. The name of Boram Deo was, no doubt, imposed by the Gonda, when they came into power. This probably took.place between five and six hundred years ago, as I found several Sati monuments dated early in the 15th century of the Vikramaditya Samvat. The earliest certain date is Samay 1422, or A.D. 1365, and there are others of 1430, 1433, and 1445. These are all Sati records, and I take them to Belong to the Gonda, because the Haihayas had an era of their own named the Chedi Samvat and the Kalachuri Samvat, which is used in all their inscriptions.”
“The Mandal of Boram Deo has a low roof of overlapping stones inside, but the outside is broken. The tower of the sanctum is complete up to the circular kamalakar fruit, which forms the base of the pinnacle. On the east side of the tower there is a very highly ornamented circular opening, which was most probably intended to lessen the pressure over the entrance to the sanctum. The walls are decorated with three rows of figure of Vishnu and his different Avatar as, with Siva, Kali, and Ganesa, and many obscene groups.In the uppermost row the figure are 1 foot in heigh, in the middle row 1.5 foot, and in the lower row 2 feet in height. The plinth consists of four mouldings, rising to 4 feet. The upper course is ornamented with a continuous procession of elephants and lion boldly sculptured. The tower is complete up to the top of the Kamalakar fruit, but the too of the pinnacle is gone”.
🔵 कनिंनघम के इस विस्तृत उद्धरण से कई बातें उभर कर आती हैं.
(1) पहले दक्षिणी प्रवेश दीवार के अभलेख सम्वत 1608(1551) को सम्वत 160 पढ़ा गया था;और इस कारण मंदिर को छत्तीसगढ़ में गोड़ शासकों के प्राचीनता के लिये साक्ष्य माना जाता था। यह त्रुटि ‘गजेटियर ऑफ सेंट्रल प्रोविनेन्स'(1870, चार्ल्स ग्रांट) में हुई थी; जबकि जेनकिन्स(1825) इसे 1608 उल्लेखित कर चुके थे।
(2) कनिंनघम के अनुसार उन्हें बताया गया था कि मंदिर में केवल ‘नाग’ की मूर्ति है; लेकिन जब वे वहां गए तो वैसी स्थिति नही थी।वहां (सभामंडप ने) दाढ़ी युक्त ‘योगी’ की मूर्ति भी थी। यह मूर्ति आज भी वहां है। इसके अलावा गर्भगृह में राजपुरुष की मूर्ति, एक और योगी की मूर्ति भी है। कनिंनघम ने इनके बारे में कुछ नही कहा है।
(3)कनिंनघम के अनुसार मंदिर ‘गोंड़ों के देवता भोरमदेव’ को समर्पित नही है; बल्कि यह विष्णु को समर्पित है; जिसकी मूर्ति को सभामंडप में रख दिया गया है(यह मूर्ति अभी भी सभामंडप में है)।फिर वे आगे कहते हैं कि मंदिर की वास्तविक मूर्ति पश्चिम में कुछ कदम की दूरी पर एक पेड़ में नीचे रखी गरुणासीन विष्णु-लक्ष्मी की मूर्ति है।
(4) कनिंनघम के अनुसार आज से चार-पांच सौ वर्ष पूर्व गोंड़ शासकों के शक्तिशाली होने से मंदिर के गर्भगृह से विष्णु की मूर्ति को हटाकर वहां शिवलिंग स्थापित किया गया होगा।इस संदर्भ में वे प्राप्त सती स्तंभ लेखों का हवाला देते हैं, जो मुख्यतः चौदहवी-पंद्रहवी शताब्दी के हैं, और जिनमे विक्रम संवत का प्रयोग हुआ है। कनिंनघम के अनुसार कलचुरी सम्वत के बदले विक्रम संवत का प्रयोग शासन व्यवस्था में बदलाव के कारण हुआ होगा।
(5) कनिंनघम ने इसे अपने द्वारा अब तक देखे गए सर्वाधिक अलंकृत मंदिर कहा है, तथा निर्माणकर्ता के शक्तिशाली और समृद्ध होने की बात कही है; जो उचित है।

🔵 विष्णु मंदिर अथवा शिव मंदिर
कनिंनघम ने भोरमदेव मंदिर को मूलतः विष्णु मंदिर मानते हुए अपने तर्क दिए हैं; जिनमे मुख्यतः बाद के दौर में गोड़ शासकों के शक्तिशाली होने पर गर्भगृह से विष्णु की मूर्ति को हटाकर शिवलिंग स्थापित करने की बात कही गयी है। इस सम्बंध में वे बाद के दौर में कलचुरी सम्वत के बदले विक्रम संवत का प्रयोग तथा मंदिर में विष्णु और उसके अवतारों से सम्बद्ध मूर्तियों की बहुलता को साक्ष्य बताया है।
डॉ सीताराम शर्मा कनिंनघम से असहमति प्रकट करते हुए मंदिर के शिव मंदिर होने के सम्बंध में दो महत्वपूर्ण तर्क प्रस्तुत किये हैं-
(1) गर्भगृह सांधार है जो शिवलिंग प्रतिष्ठित करने के लिए निर्मित है। छत्तीसगढ़ अंचल तथा अन्यत्र सांधार गर्भगृहों में शिवलिंग प्रतिष्ठित है।
(2)गर्भगृह के बाहर उत्तर की ओर प्रनाली है। जिसके छोर में व्यालमुख है। इससे शिवलिंग पर अभिषेक किया हुआ जल बहकर बाहर प्रनाली से होते हुए कुंड में एकत्र होता है।
इन दो महत्वपूर्ण तर्कों के अलावा कुछ अन्य तर्क भी दिये जा सकते हैं-
(3) मंदिर के दक्षिणी प्रवेश दीवार के अभलेख सम्वत 1608(1551ई.) में मंदिर को भुवनपाल का शिवालय(भुवनपालस्य सिवालय) कहा गया है। अभिलेखीय साक्ष्य से स्पष्ट है कि मंदिर शिवालय है।
‌(4)अवश्य मंदिर में विष्णु और उसके अवतारों की मूर्तियां पर्याप्त संख्या ने है, मगर शिव से सम्बंधित मूर्तियां भी कम नही है।मंदिरो में विभिन्न देवी-देवताओं के मूर्तियां उत्कीर्ण करने की परंपरा रही है।
(5)चौदहवी-पंद्रहवी शताब्दी में कलचुरी सम्वत के बदले विक्रम संवत का प्रयोग कलचुरियों के समक्ष फणिवंशियों की मजबूत स्थिति अथवा कलचुरियों के दबाव कम होने के कारण भी हो सकता है। डॉ गणेश चन्द्र चंद्रौल के अनुसार यह क्षेत्र गोंड़ शासकों के अधीन सर्वप्रथम 16 वी शती ई. में गोंडराजा संग्रामशाह के शासनकाल में आया।यह बात सत्य हो सकती है क्योंकि 14वी-15वी शताब्दी के बाद फणि वंशियी के साक्ष्य प्राप्त नही हुए हैं। मगर सत्ता परिवर्तन एक बात है मंदिर का शिव अथवा विष्णु का होना दूसरी बात है।
(6) डॉ गणेश चन्द्र चंद्रौल के अनुसार गर्भगृह के प्रवेश द्वार तोरण पर उत्कीर्ण शिव प्रतिमाओं से यह सिद्ध हो जाता है कि मंदिर मूलतः शिव मंदिर है।

 

🔵 मंदिर का स्थापत्य
पूर्वाभिमुख प्रस्तर निर्मित यह मंदिर नागर शैली के मंदिरों का सुंदर उदाहरण है। इस मंदिर में तीन प्रवेश द्वार है-प्रमुख द्वार का मुख पूर्व दिशा की ओर है तथा उत्तर और दक्षिण में एक-एक प्रवेश द्वार है। निर्माण योजना की दृष्टि से इसमें तीन द्वार पर तीन अर्धमंडप, बीच मे चौकोर मंडप, उसमे लगा हुआ अंतराल और अंत मे गर्भगृह है। 1.53 मी. ऊंचे अधिष्ठान पर इस मंदिर का निर्माण हुआ है। मंदिर की कुल लंबाई 18.30 मी. तथा चौड़ाई 12.20 मी. है। प्रत्येक प्रवेश द्वार के अर्धमंडप वर्गाकार(2.44×2.44 मी.) माप वाले तथा दोनो पार्श्व में दो-दो स्तंभों पर आधारित है।मंडप भी वर्गाकार है(5.50×5.50 मी.) तथा 16 स्तंभों पर आधारित है। गर्भगृह भी वर्गाकार(2.80×2.80 मी.) है।गर्भगृह का धरातल प्रांगण के धरातल पर ही है अतः अंतराल से सीढ़ियों द्वारा गर्भगृह में नीचे उतरते हैं, जहां अंधेरा रहता है।

 

🔵 पूर्वी द्वार का अर्ध मंडप
यह प्रमुख प्रवेश द्वार का अर्धमंडप है। द्वार-शाखा लता-बेलों से अलंकृत है। निचली चौखट पर एक-एक शार्दूल दोनो कोनो पर है। दोनो द्वार शाखाओं पर त्रिभंग में खड़े हुए शिवजी का सुंदर अंकन हुआ है।उसके एक ओर द्विभुजी परिचारक खड़े हुए हैं एवं दूसरी ओर हाथ मे चंवर लिए हुए परिचारिका खड़ी हुई है। शिवजी के सिर पर जटा, मुकुट, कानो में कुंडल, गले मे मुक्ताओ की माला एवं हार, कमर में करधनी, हाथों में कड़े, बाजुओं में भुजबन्द तथा पैरों में पायजेब आदि आभूषण हैं। ऊपरी दाहिने हाथ मे त्रिशूल, ऊपरी बायें हाथ मे सर्प तथा निचले हाथ मे दण्ड आयुध है। नीचे का दाहिना हाथ अभय मुद्रा ने है। द्वार के ललाट बिम्ब में नागराज तपश्चर्या में रत दिखाए गए हैं, जिनके सिर पर पांच फनों का आटोप है। इनकी दो भुजाएं हैं।
🔵 उत्तरी द्वार का अर्ध मंडप
इस अर्धमंडप की छत पर तीन अलंकृत फुल्ले बने हैं। इसके दाहिने एवं बाई ओर कटि तक ऊंची दीवार है। द्वार-तोरण के सिर दल के दाहिने कोने पर एक बैठे हुए योगी तथा मध्य में पंचफण भोगयुक्त मानव विग्रह में नागराज तथा बायें कोने पर भी पंचफण युक्त नागराज की बैठे हुए मूर्तियों का अंकन है।
🔵 दक्षिणी द्वार का अर्धमंडप
द्वार तोरण के दक्षिणी भाग पर ‘जोगी मगरध्वज 700’ उत्कीर्ण लेख है। द्वार के बाई ओर 18 पंक्तियों का सम्वत 1608 तिथियुक्त अभिलेख है। इस द्वार के सिरदल में बाई ओर दो हंस तथा आमने-सामने खड़े दो गज;दाहिनी ओर शार्दूल मुख उकेरे गए हैं। इनके अतिरिक्त अन्य अलंकरण उत्तरी द्वार की ही भांति है।
🔵 मंडप
मंडप वर्गाकार है(5.50×5.50 मी.)। तीनो दिशाओं के दोनों पार्श्व में एक-एक स्तम्भ है,जिनकी यष्टि अष्टकोणीय है। स्तम्भ का शीर्ष अधोमुखी विकसित कमल के सदृश्य है जिसपर भारवाही कीचक की आकृति है जो मंडप के छत का भार थामे हुए मुखाकृति युक्त है। इन स्तंभों के सामने चारो कोनो में चार स्तम्भ हैं, जो अलंकरण युक्त है। मंडप की आंतरिक दीवार जे कोनो पर चार दीवार स्तम्भ हैं। इस प्रकार सभमंडप में स्तंभों की कुल संख्या 16 है। मंडप की छत की वास्तु रचना एक जे ऊपर दूसरे पाषाण को रख कर की गई है। सभमंडप की भूमितल से छत की ऊंचाई अधिक नही है। छत पर शतदल कमल की आकृति उभरी हुई बनायी गयी है। बाह्य भाग में दोनों ओर मगर की अलंकृत मुखाकृति है। इससे पानी का निकास होता है।
🔵 अंतराल
सभमंडप और गर्भगृह के मध्य आयताकार अंतराल है, जो छोटे आकार का होते हुए भी भव्य है। अंतराल की तलभूमि सभमंडप से 20 से. मी. ऊंची है। लंबाई 2 मी. और चौड़ाई 90 से.मी. है।इसके ऊपर की छत सादी है तथा उस पर शिलापट्टों की रचना दर्शनीय है।इस भाग को मंदिर का द्वितीय मंडप भी कहा जाता है जो सभमंडप और गर्भगृह, दोनो अंगों को संयुक्त करता है।
🔵 गर्भगृह का प्रवेश द्वार
सभा द्वार तोरण अत्यंत अलंकृत है। सिरदल पर दो-दो मालाधारी विधाधरो का दोनो छोर पर अंकन हुआ है।
बायीं द्वार शाखा पर त्रिभंग में चतुर्भुजी शिव खड़े हूए हैं, जिनके ऊपरी बायें हाथ मे त्रिशूल ऊपरी दायें हाथ मे डमरू तथा निचले दायें हाथ से बायें पैर के समीप दण्ड पकड़े हुए हैं, जबकि उनका निचला बांया हाथ अभय मुद्रा में है। वामपार्श्व ने खड़े हुए एक पुरुष परिचारक(गण) और शिव के बीच मे एक परिचारिका खड़ी हुई है। जबकि शिवजी के दाहिनी ओर त्रिभंग में दो खड़ी हुई नारी सेविकाएं अंकित है।
दाहिने द्वार शाखा पर भी यही दृश्य अंकित है अंतर मात्र इतना है कि इनके दाहिने ओर एक उपासक दम्पति है, और द्वार के वामपार्श्व में दो द्विभुजी सेविकाएं खड़ी हैं।
🔵 गर्भगृह
गर्भगृह सांधार है। प्रवेश द्वार से पांच सीढियां उतरकर यहां पहुंचते हैं। गर्भगृह वर्गाकार है(2.80×2.80 मी.)।इसमें बीचो-बीच जलधारी पर कृष्णप्रस्तर निर्मित शिवलिंग प्रतिष्ठित है। इसकी सीध में ऊपर की छत पर अलंकृत शतदल कमलाकृति है। भीतरी दीवार सपाट और अनलंकृत है।
गर्भगृह के अंदर दीवार के सहारे टिकी हुई चार मूर्तियां हैं- (1) उपासक दम्पति(राजपुरुष) (2)ध्यानस्थ योगी (3)नृत्त गणपति की अष्टभुजी प्रतिमा (4) पंचमुखी नाग प्रतिमा
. 🔵 मंडप की छत
मंदिर के मंडप की छत का निर्माण एक के ऊपर दूसरे प्रस्तर को जमाकर किया गया है। किंतु यह छत अपेक्षाकृत ऊंची नही है। अलंकरण युक्त मंडप की छत के दोनों किनारे पर एक-एक नक्र मुख प्रणाली है जो छत के पानी का निकासी करती है।
🔵 पीठ एवं अधिष्ठान
भोरमदेव मंदिर भूमिज मंदिरो की योजना के अनुसार है। तदनुरूप तरकाकृत तथा पंचरथ शैली में निर्मित है।पूर्व, उत्तर एवं दक्षिण दिशा में इसकी पीठ पांच भूमियों में बनी है। इसके ऊपर गज रथ है। इसमें गजो एवं सिंहो को गतिशील स्थिति में दर्शाया गया है।
🔵 जंघा एवं कटि
गर्भगृह के भाग में जंघे की तीनों दिशाओं में अलिंद या रथिका बिम्ब बने हुए हैं जिनकी संख्या तीन है। जिनमे विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां अवस्थित है।सभमंडप, अंतराल एवं गर्भगृह के बह्यभाग में देव, मानव, नायक-नायिका, आयुधधारी, नृत्य संगीत दृश्यों के साथ ही मिथुन-मूर्तियां हैं। जंघों की दीवाल की चौड़ाई में देवी-देवताओं की मूर्तियां लगाई गई है।
🔵 शुकनाशा
शिखर के सामने अंतराल के ऊपर जो निर्माण किया जाता है उसे शुकनाशा कहते हैं। इसके अनुसार भोरमदेव मंदिर के शुकनाशा अंग में एक वृत्ताकार गवाक्ष है, जिसके ऊपर सज्जापट्टी आमलक तक गई है। तीनो ओर “कूट’ बनाये गयें हैं।
🔵 शिखर
इस मंदिर का शिखर ज्यों-ज्यों ऊपर उठा है, त्यों-त्यों सकरा सकरा होता गया है और अंत मे आमलक को स्पर्श करता हुआ प्रतीत होता है। यही भाग स्कंध है। स्कंध के ऊपर आंवले के आकार की शिला लगा दी है है। आमलक के ऊपर कमलदल से अलंकृत “चंद्रिका” इस मंदिर में नही है। न तो आमलसारिका है न विशाल कलश। मंदिर की भव्यता को देखते हुए निश्चय ही चन्द्रिका, आमलक, कलश आदि संश्लिष्ट रूप में रहा होगा जो अब नही है। दक्षिणी दीवार अभिलेख सम्वत 1608(1551ई.)से यह ज्ञात होता है कि मंदिर के रत्न जड़ित कलश को किसी मांडोपति ने तोड़ा और रतनपुर के बहुराय ने विजय प्रतीक के रूप में ले गया।
शिखर चार सज्जा पट्टियों से चार भागों में विभक्त है। ये सज्जा पट्टियां शुकनाशा के पास चौड़ी हैं तथा शिखर स्कंध तक पहुंचते-पहुंचते सकरी होती गई है।
डॉ सीताराम शर्मा के अनुसार ध्वंसावशेष से यह प्रतिभाषित होता है कि मंदिर में तीन शिखर रहे होंगे। प्रथम शिखर जो गर्भगृह के ऊपर है, दूसरा सभमंडप के ऊपर तथा तीसरा प्रवेश मंडपों के ऊपर।
अंतराल के ऊपर कुछ अंग शिखरकाओं की रचना कर वृत्ताकार अलंकृत गवाक्ष बना है। अंदर एक आयताकार कक्ष है, जिसका प्रयोजन गर्भगृह के ऊपर प्रवेश द्वार के ऊपर भार को कम करना एवं प्रकाश का समावेश करना सम्भव है। मुख्य शिखर भूमितल से 40 फीट ऊंचा है।

🔵 संदर्भ
(1) आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, भाग-17 -ए. कनिंनघम(1882)
(2)भोरमदेव मंदिर प्रदर्शिका- डॉ गजेंद्र कुमार चंद्रौल(1984)
(3)भोरमदेव- सीताराम शर्मा(1989)
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अजय चन्द्रवंशी, राजा फुलवारी चौक, वार्ड नं 09 कवर्धा(छ. ग.)
मो 9893728320

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