🔵 इधर , ट्रम्प_की_आरती_उतारते_हुक्मरान ; उधर , अमरीकी_जेलों_में_युवा_हिन्दुस्तान

लोकजतन की अंतर्राष्ट्रीय डैस्क

11.02.2019

इधर मौजूदा हिंदुस्तानी हुक्मरान अमरीका के – अब तक के सबसे पगले – राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को तकरीबन ब्रह्मा का अवतार और उसके कहे को वेदोचित वाक्य का दर्जा देने के लिए रातों दिन एक किये हुए है उधर ट्रम्प और उसकी नौकरशाही कंस-मोड में आयी हुयी है और अमरीका में “पढ़ने” गए सवा सौ से ज्यादा भारतीय छात्रों को अमरीकी जेलों में ठूंस दिया गया है । सैकड़ों जेल जाने वाली पाइप लाइन में हैं।

● ट्रम्प और अमरीकी आव्रजन विभाग के मुताबिक़ यह वीसा धोखाधड़ी का, फ्रॉड का मामला है । फ्रॉड वीसा – जो खुद अमरीकी सरकार देती है — में हुआ है, मुजरिम उन्हें बनाया गया है जो दरअसल फ्रॉड के शिकार हैं।

● अमरीकी प्रशासन के मुताबिक़ मिशीगन नामक शहर में एक कोई “यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़र्मिंगटन” नाम की अमरीकी यूनिवर्सिटी और आठ अन्य भर्ती कंपनियों (रिक्रूटर्स) का स्टिंग ऑपरेशन करके आव्रजन कस्टम प्रवर्तन विभाग ने एक बड़ा घोटाला पकड़ा । ये यूनिवर्सिटी/यूनिवर्सिटियां मोटी फीस लेकर अनेक हिन्दुस्तानी विद्यार्थियों को ऐसी क्लास में ‘दाखिला’ देती थीं, जिसमे उन्हें क्लास अटेंड करने की कोई बाध्यता नहीं थी । एक तरह से ये छात्र अमरीका में “रहने” और छात्रों को मिलने वाले एफ-1 वीसा को बनाये रखने की रकम चुका रहे होते थे ।

● अमरीकी आव्रजन अधिकारियो के मुताबिक़ इन फर्जी यूनिवर्सिटीज, जिनकी चिट्ठी के आधार पर वीसा दिया गया, के साथ साथ फ्रॉड का शिकार होने वाले विद्यार्थी भी दोषी हैं, क्योंकि वे जानते थे कि ऐसा ही होना है ।

● खुद दुनिया भर में बिन बुलाये जा धमकने वाला ट्रम्प का अमरीका अपने देश में बाहर से आने वालों पर रोक लगाने के लिए बदहवासी से बिलबिलाया हुआ है। कभी मैक्सिको की सीमा पर कंक्रीट या स्टील की दीवार खड़ी करने का बेहूदा और हास्यास्पद प्लान लेकर आता है और खुद अमरीकी संसद से पंगा ले लेता है – तो कभी बाकियों को बाहर धकेलने के लिए शरणार्थियों के दुधमुंहे से लेकर शिशुओं तक की उम्र के बच्चे उनकी मांओं से छीन लेता है। इस बार उसका बहाना वीसा फ्रॉड है !! लाखों का खर्च करके अमरीका पढ़ने गए इन विद्यार्थियों को “डिपोर्ट” करने यानि कि जबरिया वापस भेजने की ओलम लिखना शुरू हो गयी है।

सवाल तीन  हैं  ;

#पहला कुछ बड़ा सा प्रश्न तो ये कि अमरीका के पैदा होने से कुछ 2-3 हजार साल पहले से धरती के जिस हिस्से जम्बूद्वीपे भारतखण्डे में नालंदा और तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय और अनेक विश्वस्तरीय पीठ और शिक्षा केंद्र रहे हों – वहां ऐसी क्या मरी आन पडी कि उसके युवा मिशीगन पढ़ने जाएँ ? ये हालत क्यों कैसे हुयी । क्या इसे रोका जा सकता है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि अपढों और बुद्दिभीरुओं के ताजे दौर में शिक्षा संस्थानों को मटियामेट करने की जो मुहिम सी चल रही है उसके बाद सेकेंडरी स्कूली पढ़ाई भी अमरीका और यूरोप के लिए “आउटसोर्स” कर दी जाने वाली है ? कुछ भी हो सकता है उनके खून में व्यापार है, शिक्षा तालीम थोड़े ही है !!

● इस तरह की धोखाधड़ी के पीछे #दूसरा लोभ रोजगार का हो सकता है ; देश में नहीं मिल रहा तो चलो बाहर चलें !! तो ब्रह्मा जी 5 साल से क्या उस घास को खोद रहे हैं जो उनके सहगोत्री पूर्ववर्ती उगा कर गये थे ?

● #तीसरा और फौरी सवाल है कि हाल के कुछ वर्षों में आमतौर से और पिछले पांच वर्षों में खासतौर से अमरीकी हुक्मरानों की लल्लो-चप्पो करने वाले हमारे नेता और सरकारें क्या इतनी भी हैसियत नहीं बना पाये कि अपनी यूनिवर्सिटियों की धोखाधड़ी के लिए भारतीय छात्रों को बलि का बकरा बनाने की अमरीकी हरकत के लिए उसे फटकार सकें – अपने बच्चों को – बोनाफाइड भारतीय नागरिको को बांध-बूंध कर वापस डिपोर्ट करने से रोक सकें ? इत्ता भी नहीं कर सकते तो फिर कर क्या सकते हो !!

● इस फ्रॉड के पहले ही पिछली 2 सालों में एफ-1 वीसा में अमरीका पढ़ने जाने वाले हिन्दुस्तानी छात्रों की #संख्या_तेजी_से_घटी है। वर्ष 2015 में यह 74,831 थी और 2017 में 44741 रह गयी, इस तरह 40% कम हो गयी है । अब इस फ्रॉड में जो धरे गए हैं उनके साथ जो होगा वह होगा, फिलहाल तो हिन्दुस्तानी विद्यार्थियों के लिए अमरीका जाने के दरवाजे भूलभुलैया में बदलते नजर आ रहे हैं ।

● किसी #बॉबी_जिंदल – जो ठोंक कर कहता है कि “मैं भारतीय-वारतीय नहीं हूँ, चौबीस कैरट अमरीकी हूँ “- के लुइसानिया का गवर्नर बन जाने पर छद्म राष्ट्रवादी ग्रंथि को सहलाने या किसी #कमला_हैरिस – जो मोदी से किसी भी तरह के रिश्ते से इंकार करते करते गला बैठाये हुए हैं – के भावी राष्ट्रपति के संभावित उम्मीदवार बनने की दौड़ में शामिल हो जाने पर “भारतीय गौरव” की आभासीय उपलब्धि पर इठलाना विदेश नीति नहीं होती। शरण मांगने आयी अरब देश की राजकुमारी को जबरिया वापस भेज देना भैंस चोरों द्वारा वसूली जाने वाली पनिहाई से अधिक नहीं होती ; विदेश नीति तो कत्तई नहीं होती।

● विदेश नीति अंतर्राष्ट्रीय जगत में हैसियत प्राप्त करने का माध्यम होती है और यह अपनी दम पर, अपने रिश्तों से हासिल की जाती है – पीछे घिसटते रिरियाते हुए माँगी नहीं जाती।

● मोदी सरकार के भरोसे तो इसका हल निकलने से रहा । जैसा कि ऊपर लिखा है और खुद उन्होंने अनेक बार कहा है ; उनके खून में तो व्यापार है, शिक्षा या विदेश नीति या भारत की वैश्विक हैसियत नही । लिहाजा दबाब बनाने के दूसरे तरीके खोजने ही होंगे ।

(लोकजतन की अंतर्राष्ट्रीय डैस्क)

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