छत्तीसगढ़: बदलाव की मृग मरीचिका! :  महेंद्र दुबे !

19.02.2019

अधिवक्ता  महेंद्र दुबे .

पिछले साल 11 दिसम्बर को जब छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के नतीजे आये तो 15 साल बाद सत्ता में लौटी कांग्रेस खुद हैरान थी कि अपने ही क्षेत्रीय क्षत्रपों की आपसी जंग में सालों से उलझी पार्टी में ऐसे कौन से सुर्खाब के पर लगे थे कि प्रदेश की जनता ने न केवल उन्हें उनकी उम्मीद से बहुत ज्यादा दे दिया बल्कि देश की कथित सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को प्रदेश राजनीति में मुंह दिखाने लायक भी न छोड़ा! एक तरफ अकेले जीत का श्रेय लेने में कांग्रेस नेतृत्व तक सकुचाता रहा तो दूसरी तरफ सम्हाले न सम्हलने वाले बहुमत पर इतराती कांग्रेस के सामने मुख्यमंत्री और मंत्री तय करना मुश्किल हो गया था! यद्यपि जीत का सेहरा सामूहिक नेतृत्व के माथे पर चिपका कर कांग्रेस जनता के प्रति कृतज्ञता दिखाती रही मगर ये कांग्रेस की जीत से बहुत ज्यादा रमन सिंह और भाजपा की हार थी! दरअसल जनता कांग्रेस को जिता नहीं रही थी बल्कि भाजपा को हरा रही थी! इसको समझने के लिए बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार आलोक पुतुल के आंकलन पर गौर करना जरूरी है। आलोक पुतुल ने पहले चरण के ही चुनाव में राजनांदगांव और बस्तर में पाया था कि वो जहां जहां पहुंचे वहां कांग्रेस का कार्यकर्ता मतदाता के घरों में दस्तक तक नहीं दिया था जबकि भाजपा का कार्यकर्ता कम से कम दो बार हो कर जा चुका था इसके बाद भी ज्यादातर मतदाता का कहना था कि इस बार बदलना है।

यद्यपि किसानों के मुद्दे पर कांग्रेस का घोषणापत्र भाजपा पर भारी जरूर पड़ा मगर देखा जाये तो जनता की “इस बार बदलना है” की इसी चाबी से कांग्रेस के लिए सत्ता का दरवाजा खुला मगर जीत का तमगा घर बैठे कांग्रेसी ले उड़े!

आखिर प्रदेश की जनता “इस बार बदलना है” के भाव से क्या बदलना चाहती थी? और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस की सरकार के आने के बाद उस बदलाव की कोई आहट सुनाई देती भी है या नहीं? छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े मुद्दे किसानों की कर्जमाफी का पेंच अभी भी फंसा हुआ है, इसे ऐसे समझिये कि पूरा मामला नाबार्ड से जुड़ा हुआ है और नाबार्ड से कर्ज अपेक्स बैंक को मिलता है और वहां से सहकारी बैंकों, समितियों और अन्य बैंकों को ट्रांसफर होता है जो किसान को सीधे कर्ज देते है।

प्रदेश के करीब 36 लाख किसान कर्ज के दायरे में है जिनमे लगभग 20 लाख सहकारी बैंक और समितियों के अलावा राष्ट्रीय बैंकों के कर्जदार है! पिछले साल धान खरीदी की रकम का भुगतान करते समय किसान की खाते से कर्ज की रकम नहीं काटी गयी है मगर जब तक सरकार नाबार्ड को किसानों के लिए ऋणों की राशि नाबार्ड को वापस नहीं करती तब तक किसान कर्जदार ही रहेगा! दूसरी तरफ राष्ट्रीयकृत बैंकों के कर्जदार किसानों की कर्जमाफी अभी तक नहीं हुई है, जिसके लिए सरकार ने अपने नए बजट में 5 हजार करोड़ का प्रावधान किया है, जो बैंकों के खाते में जमा होने के बाद ही किसान को मुक्त करेंगे! फिलहाल तो किसानों की कर्जमाफी प्रक्रियाधीन ही है, उन्हें कर्ज माफी का प्रमाण पत्र अभी तक नहीं मिला है। यहां ये भी ध्यान रखिये कि 16 लाख किसान ऐसे है जो या तो छोटी जोत के है या बटाई पर खेती करते है! इन किसानों को बैंक कर्ज नहीं देता और ये साहूकारों के भरोसे रहते है मगर इनके कर्ज का न कोई सर्वे किया गया है और न ही इनके राहत के लिए कोई प्रावधान किया गया है। बदलाव की आहट सुनने के लिए किसानों के इस अहम मुद्दे को नजीर बना कर देखिये, सबकुछ समझ आ जायेगा!

अपने अपने इलाके में मुख्यमंत्री और मंत्रियों के आगमन पर सड़क किनारे लगने वाले होर्डिंग्स और बैनरों पर मुस्कुराते चेहरों पर गौर कीजिये, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के आसपास मंडराते मठाधीशों की पृष्ठभूमि तलाशने की कोशिश कीजिये, सरकार के विवेकाधीन पदों पर बिठाए गये सलाहकारों, मुख्यमंत्री से अपनी नजदीकी के प्रचार के लिए मुख्यमंत्री के साथ सोशल मीडिया में रोज ब रोज फोटों सर्कुलेट करने वाले पत्रकारों की रिपोर्टिंग और कालम के निहितार्थ समझने का प्रयत्न कीजिये और सरकारी और संविधानिक संस्थाओं में नियुक्ति का ठेका उठाये घूम रहे कथित पैनलिस्टों के पूर्व चरित्र और आचरण को समझने का श्रम कीजिये, जनता के “इस बार बदलना है” की भावना की हवा निकल जायेगी!

हमारे मित्र पत्रकारगण अपनी लेखनी से रमन सिंह और भाजपा के खिलाफ जनमत खड़ा करते करते कब कट्टर कांग्रेसी हो गये, पता ही नहीं चला! बस्तर में पुलिसिया अत्याचारों के अनेक आरोपो से घिरे पुलिस अधिकारी श्री कल्लूरी को एन्टी करप्शन ब्यूरो का चीफ बनाये जाने पर हमारे कलमवीर परम मित्र चार लाइन नहीं लिख सके मगर चर्चित पुलिस अधिकारी मुकेश गुप्ता के मामले में रोज अखबार रंगे हुए है! कहना नहीं चाहिए मगर कई अभिन्न पत्रकार मित्र जो रमन सिंह से चिपक कर मलाई काट रहे पत्रकारों को पत्तलकार लिखने और कहने से चूकते नहीं थे उनकी तटस्थता सिरे से नदारत है, अब वो भी उन्ही की तर्ज पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से अपनी नजदीकियां दिखा कर मलाई काटने की बराबरी पर उतर आये हैं! बस्तर के पत्रकार हमारे मित्र कमल शुक्ला जब कल्लूरी के खिलाफ़ धरने पर बैठे तो कल्लूरी के खिलाफ रमन सिंह को घेरने वाले इस पाले के पत्तलकार महोदयों ने अपने अपने मुंह पर दही जमा ली! कुल मिला कर इस मोर्चे पर बदलाव यही है कि कई मित्र पत्रकार पत्तलकार हो गये है!

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भाजपा शासनकाल में ज्यादतियां झेली है, विपरीत परिस्थितियों में बहुत संघर्ष किया है, उनकी नियत और भावना पर भी संदेह नहीं है मगर जमीनी स्तर पर जनता के चाहे गये बदलाव को अमली जामा पहनाने के लिए उनको चाटुकारों और दलालों की पहचान करनी होगी और अपने विवेक से फैसले करने होंगे वरना लोकसभा चुनाव में जनता की सहानुभूति के उलटने की स्थिति कांग्रेस खुद जिम्मेदार होगी! फिलहाल तो सरकारी अस्पताल अपने पुराने ढर्रे पर है, पुलिस का चेहरा बिल्कुल भी नहीं बदला है, सरकारी स्कूलों का हाल वैसा ही जैसा रमन सिंह छोड़ कर गये है तो फिर आम आदमी के लिए क्या बदल गया है? पत्रकार मित्र मार्गदर्शन करेंगे.

 

 

महेन्द्र दुबे ,अधिवक्ता छत्त्तीसगढ हाईकोर्ट 

 

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