दस्तावेज़ ःः. भूमकाल बस्तर जब हिल उठा ःः  उत्तम कुमार

सम्पादक दक्षिण कोसल

10.02.2019

वर्तमान छत्तीसगढ़ के बस्तर में गोण्ड़ों की गौरवशाली परंपरा रही है। सीमाएं चाहे जो भी हो, पर यह कहना बिल्कुल सही होगी कि यह पूरा इलाका आदिवासियों का ही है। आदिवासियों ने सबसे ज्यादा विद्रोह बस्तर में किए थे। बस्तर के आदिवासियों ने 1774 से 1910 ईस्वी के मध्य विदेशी शक्तियों (मराठा व अंग्रेज) के विरूद्ध भयंकर युद्ध लड़े थे। इन विद्रोह में हल्बा विद्रोह (1774-77), भोपालपट्टनम संघर्ष (1795), परालकोट का विद्रोह (1824-25), तारापुर का विद्रोह (1842-1854), मेरिया विद्रोह (1842-1863), महान मुक्ति संग्राम (1856-57) कोया विद्रोह (1859), मुरिया विद्रोह (1876), रानी विद्रोह (1978-82)। इन सभी विद्रोहों में फरवरी 1910 का महान भूमकाल मुख्य विद्रोहों में से एक माना जाता है।

आजादी के पूर्व ब्रिटिशकालीन छत्तीसगढ़ की रियासतों में बस्तर और कांकेर दो महत्वपूर्ण रियासतें इसी क्षेत्र में आती थी। प्राचीन काल में यह अंचल वत्सर, दण्डकारण्य, माहाकांतर, पुरूषोत्तम क्षेत्र आदि नामों से पुकारा जाता था। 1857 तक अंग्रेजों ने सम्पूर्ण बस्तर और कांकेर रियासतों पर अपना आधिपत्य कर लिया था। आधुनिक भारतीय इतिहास में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रारंभ 1857 से माना जाता है, लेकिन इसके 32 वर्ष पहले ही बस्तर जिले के नारायणपुर तहसील के परालकोट के जमींदार गेंदसिंह ने 24 दिसंबर, 1824 व 25 फरवरी 1910 को वीर गुंडाधूर ने बहादुरी के साथ संघर्ष किया था।

ये सभी विद्रोह आदिवासियों को अपने निवास क्षेत्र, भूमि व वन में हासिल परंपरागत अधिकारों को छीने जाने के विरोध में, अस्मिता और संस्कृति के संरक्षण के लिए था। वे मुख्यत: बाह्य जगत व शासन के प्रवेश से अपनी जीवन शैली, संस्कृति एवं निर्वाह व्यवस्था में उत्पन्न हो रहे खलल को दूर करना चाहते थे। विद्रोहियों ने नई शासन व्यवस्था और ब्रिटिश राज द्वारा थोपे गए नियमों व कानूनों का विरोध सशस्त्र विद्रोह से किया था।

बस्तर में 10 बड़े विद्रोह में से एक 1910 का महान भूमकाल आदिवासी इतिहास में स्वतंत्रता व राजसत्ता प्राप्ति का प्रस्थान बिंदु माना जाता है। बस्तर के इतिहास में 1910 के आदिवासी संग्राम का विशेष महत्व है। प्रथम आदिवासियों ने बड़े पैमाने पर अंग्रेजों के विरूद्ध हिंसात्मक विप्लव में भाग लिया था। 1910 का आदिवासी संग्राम बस्तर को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने का महासंग्राम था।

बस्तर में भूमक अथवा भूमकाल का शाब्दिक अर्थ है-भूमिका कंपन या भूकम्प अर्थात उलट-पुलट। यह संग्राम ‘बस्तर, बस्तरवासियों का है’ के नारे को लेकर प्रारंभ हुआ था। इस आंदोलन के द्वारा आदिवासी बस्तर में मुरिया राज स्थापित करना चाहते थे। 1910 के विद्रोह के अनेक कारण थे। इन कारणों में (1)लाल कालेन्द्र सिंह और राजमाता स्वर्ण कुंवर देवी की उपेक्षा (2) वन उपज का सही मूल्य न देना (3)स्थानीय प्रशासन में बुराइयां (4)अंग्रेजों द्वारा राजा रूद्रप्रतापदेव के हाथों सत्ता न सौंपना (5)बस्तर के वनों को सुरक्षित वन घोषित करना (6) राजवंश से दीवान न बनाना (7) लगान में वृद्धि करना और ठेकेदारी प्रथा को जारी रखना (8) नई शिक्षा नीति (9) आदिवासियों को कम मजदूरी देना (10)घरेलु मदिरा पर पाबंदी (11) बस्तर में बाहरी लोगों का आना और आदिवासियों का शोषण करना (12) आदिवासियों को गुलाम समझना (13) पुलिस कर्मचारियों के अत्याचार (14)अधिकारियों, कर्मचारियों और शिक्षकों द्वारा आदिवासियों से मुफ्त में मुर्गा, शुद्ध घी और जंगली उपज प्राप्त करना (15) बेगारी प्रथा (16) ईसाई मिशनरियों द्वारा आदिवासियों को धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य करना आदि।

अक्टूबर 1909 के दशहरे के दिन राजमाता स्वर्ण कुंवर ने लाल कालेन्द्र सिंह की उपस्थिति में ताड़ोकी में आदिवासियों को अंग्रेजों के विरूद्ध सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित किया था। ताड़ोकी की सभा में लाल कालेंद्र सिंह ने आदिवासियों को अंग्रेजों के विरूद्ध सशस्त्र क्रांति के लिए पे्ररित किया था। ताड़ोकी की सभा में लाल कालेंद्र सिंह ने आदिवासियों में से नेतानार ग्राम के क्रांतिकारी वीर गुंडाधूर को 1910 की क्रांति का नेता बनाया और एक-एक परगने से एक बहादुर व्यक्ति को विद्रोह का संचालन करने के लिए नेता मनोनीत किया था। लाल कालेंद्र सिंह के मार्गदर्शन में अंग्रेजों के विरूद्ध क्रांति करने के लिए एक गुप्त योजना बनाई गई थी। जनवरी, 1910 में ताड़ोकी में पुन: गुप्त सम्मेलन हुआ, जिसमें लाल कालेन्द्र सिंह के समक्ष क्रांतिकारियों ने कसम खाई कि वे बस्तर की अस्मिता के लिए जीवन व धन कुर्बान कर देंगे।

1 फरवरी 1910 को समूचे बस्तर के क्रांतिकारियों ने क्रांति की शुरूआत की थी। विद्रोहियों की गुप्त तैयारी से पोलिटिकल एजेंट डी ब्रेट भी बेखबर था। विद्रोहियों ने इस विद्रोह में भाग लेने के लिए हर गांव में प्रत्येक परिवार से एक सदस्य को सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया और उनके पास लाल मिर्च, मिट्टी के ढेले, धुनषबाण, भाले तथा आम की डालियां प्रतीक के स्वरूप भेजी थी। 1 फरवरी 1910 को समूचे बस्तर में विप्लव की शुरूआत हुई। 2 फरवरी 1910 को विद्रोहियों ने पूसपाल बाजार में लूट मचाई थी। 4 फरवरी को कूकानार के बाजार में बुंटू और सोमनाथ नामक दो विद्रोहियों द्वारा गीदम में गुप्त सभा आयोजित कर मुरिया राज की घोषणा की थी। इसके बाद विद्रोहियों ने बारसूर, कोंटा, कुटरू, कुआकोंडा, गदेड़, भोपालपट्टनम, जगरगुंडा, उसूर, छोटे डोंगर, कुलुल और बहीगांव पर आक्रमण किए थे। 16 फरवरी 1910 को अंग्रेजों और विद्रोहियों के मध्य इंद्रावती नदी के खडग़घाट पर भीषण संघर्ष हुआ था। इस संघर्ष में विद्रोही परास्त हुए थे। खडग़घाट युद्ध में हुंगा मांझी ने अपनी वीरता का परिचय दिया था। 24 फरवरी 1910 को गंगामुंडा के संघर्ष में विद्रोहियों की पराजय हुई थी।

25 फरवरी, 1910 को डाफनगर में विद्रोहियों ने गुंडाधूर के नेतृत्व में अंग्रेजों के साथ भीषण संघर्ष किया था। अबूझमाड़, छोटे डोंगर में आयतू महरा ने अंग्रेजों के साथ संघर्ष किया था। छोटे डोंगर में विद्रोहियों ने गेयर के साथ भयंकर संघर्ष किया था। सुप्रीम कमांडर गेयर ने पंजाबी सेना के बल पर विद्रोहियों का दमन किया था। अंग्रजों ने 6 मार्च, 1910 से विद्रोहियों का बुरी तरह से दमन करना शुरू कर दिया था। लाल कालेन्द्र सिंह और राजमाता स्वर्ण कुंवर देवी को अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया था। अनेक विद्रोहियों को कठोर कारावास दिया गया। हजारों आदिवासियों को नि:शस्त्रीकरण किया गया था। हजारों आदिवासियों को कोड़ा लगाने की कार्यवाही अंग्रेजों ने प्रारंभ की थी। कोड़े लगाने की प्रकिया महीनों तक चलती रही थी। अंग्रेजों की यह जघन्य कार्रवाई यहीं नहीं रूकी आसू, किंदारिया, कोरली, कोला, चंड, जोगी, तिहरू, डोडा, पेंदा, दलाम, दनिया, नरसिंह, पांडू, बलया, बधूर, बुधसेन, भदरू, भागा, भैरा, मंगतू, मुंडी, मुसमी, हड़पा, मुलिया, मिलिया, रूद्रापेंपा व रूपधर जैसे बहादुर क्रांतिकारियों को प्राणदंड से दंडित किया गया था।

1910 का विद्रोह बस्तर में 1 फरवरी से 29 मार्च, 1910 तक चलता रहा था। 1910 का भूमकाल बस्तर में आदिवासियों के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसने बस्तर में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला दिया था। विद्रोह की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने आदिवासी संस्थाओं को सम्मान देते हुए आदिवासियों से जुडऩे का प्रयास किया था। यदि इन विद्रोह में बस्तर के राजा रूद्रप्रताप देव और कांकेर के राजा कोमल देव क्रंातिकारियों का साथ देते तो निश्चित रूप से बस्तर में 1910 का विप्लव सफल होता और अंग्रेजों को बस्तर छोडऩा ही पड़ता। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के अलग हिस्सों में 1918 का किसान उरांव बगावत व 1932 में कोरिया रियासत में गोंड़ विद्रोह इतिहास में दर्ज है।

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उत्तम कुमार , संपादक दक्षिण कोसल.

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