क्या सच में 3 दिनों में हो जाती है बलात्कार के दोषियों को सज़ा? या मोदी फिर झूठ बोल गए या झुठ बोलना उनकी  प्रवृत्ति बन गई हैं  ?

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अनुज श्रीवास्तव

बीती 30 जनवरी को प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा भरी सभा में कही गई एक बात खूब चर्चा में रही. प्रधानमन्त्री पिछले महीने गुजरात दौरे पर गए थे इस दौरान वे सूरत में हो रहे न्यू इंडिया यूथ कॉन्क्लेव में शामिल हुए और युवा पेशेवरों से बातचीत की. अपने संबोधन के दौरान मोदी ने ये दावा किया कि उनके सत्ता में आने के बाद से बेटियों की सुरक्षा के लगातार नए नए कदम उठाए जा रहे हैं और इस कारण बलात्कार के मामलों में दोषियों को अपराध के एक महीने के अन्दर ही सज़ा हो रही है.

कानूनी विसंगतियों से जूझती ज़मीनी हकीकत से बिलकुल अलग है प्रधानमन्त्री मोदी की ये बात. तो क्या नरेन्द्र मोदी देश की जनता से झूठ बोल रहे हैं? या सच में परिस्थितियां इतनी बेहतर हो गई हैं? शायद हम सभी इस बात की हकीकत जानते हैं, पर फिर भी प्रधानमन्त्री की इस बात का फैक्ट चैक कर सच सबके सामने रखना ज़रूरी है. ऑल्ट न्यूज़ ने तथ्यों की जाँच करके इस पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है.
न्यू इंडिया यूथ कॉन्क्लेव कार्यक्रम का जो वीडियो प्रधानमन्त्री कार्यालय द्वारा जारी किया गया उसके 28:30वें मिनट से प्रधानमन्त्री मोदी ने कहा है “इस देश में बलात्कार पहले भी होते थे. समाज की इस बुराई, कलंक ऐसा है कि आज भी उस घटनाओं को सुनने को मिलता है. माथा शर्म से झुक जाता है, दर्द होता है लेकिन आज 3 दिन में फांसी, 7 दिन मे 11 दिन में फांसी, एक महीने में फांसी लगातार उन बेटियों को न्याय दिलाने के लिए एक के बाद एक कदम उठाए जा रहे हैं और नतीजे नजर आ रहे हैं, लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि बलात्कार की घटना तो 7 दिन तक टीवी पर चलाई जाती है लेकिन फांसी की सजा की खबर आकर के चली जाती है.”

भाजपा के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से भी प्रधानमन्त्री ओदी का ये बयान ट्विट किया गया.

https://twitter.com/BJP4India/status/1090613581781987329
एएनआई न्यूज़ एजेन्सी ने भी प्रधानमन्त्री के इस बयान को ट्विट किया है

Ani photo

मोदी ने अपने वक्तव्य में साफ़ शब्दों में ये कहा है कि उनका कार्यकाल शुरू हो जाने के बाद से बलात्कार के दोषियों को 3 दिन से लेकर एक महीने तक में फांसी दे दी जा रही है. इन दोनों ट्विट पर कमेन्ट करते हुए लोगों ने बलात्कार से सम्बंधित ऐसे कई मामलों का उल्लेख किया जिनमें घटना के कई वर्षों बाद तक भी दोषियों को सज़ा नहीं मिल पाई है.

अपवादों का ज़िक्र कर रहे हैं प्रधानमन्त्री
यहां, पीएम मोदी उन मामलों का जिक्र कर रहे थे जिनमें स्थानीय अदालत द्वारा रिकॉर्ड समय में फांसी की सजा सुनाई गई थी. ऐसे कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं.

अगस्त, 2018 में, मध्यप्रदेश की एक स्थानीय अदालत ने छह-वर्षीया-बालिका से बलात्कार के लिए एक व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा 8 अगस्त, 2018 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार — “अभियोजन अधिकारी पुष्पेंद्र कुमार गर्ग ने बताया, दतिया के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हितेंद्र द्विवेदी ने मोतीलाल अहिरवार (25) को हाल ही में पेश किए गए आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2018 की धारा 376(ए)(बी) तथा यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण के प्रावधान (पाक्सो/POCSO) अधिनियम के तहत दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।”- (अनुवादित) इस मामले की सुनवाई तीन कार्य दिवसों में पूरी की गई थी.

इंदौर, मध्यप्रदेश की एक अन्य स्थानीय अदालत ने रजवाड़ा के निकट तीन-माह की बच्ची से बलात्कार और हत्या के लिए एक व्यक्ति को मृत्युदंड सुनाया. द टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित एक लेख में कहा गया, “मृत्युदंड का निष्पादन उच्च न्यायालय से पुष्टि के बाद होगा.” अभियुक्त को रिकॉर्ड 21 दिनों में दोषी सिद्ध किया गया.

जुलाई, 2017 में, कटनी, मध्यप्रदेश की एक अदालत ने 5 दिनों की सुनवाई के बाद एक नाबालिग से बलात्कार के लिए ऑटो रिक्शा चालक राजकुमार कोल को मृत्युदंड दिया. द टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा 27 जुलाई, 2017 को प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया, “उसे 7 जुलाई को गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने 12 जून को आरोप-पत्र दाखिल किया और अदालत में मामले की सुनवाई 23 जून को शुरू हुई.” तीन महीने बाद खबरें आईं कि मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने मृत्युदंड को कम करके 20 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया. राजस्थान और कर्नाटक के दो अन्य व्यक्तिगत बलात्कार मामलों में अपराधियों को 22 दिनों में मौत की सजा दी गई.

मोदी का बयान आंकड़ों से मेल नहीं खाता. फिर भी, ये कहते हुए कि बलात्कार के अपराधों के साबित होने के एक महीने के भीतर मौत की सजाएं सुनाई गई हैं, वे उनसे एकदम अलग भी नहीं हैं.

2017 में मृत्युदंड

इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017 में कुल 109 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई थी, जिनमें 43 को, यौन अपराधों के साथ हत्या के शामिल होने से, हत्या के साथ बलात्कार के मुख्य अपराध के लिए, मौत की सजा सुनाई गई. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, ” यह 2016 में ऐसे ही अपराधों के लिए मौत की सजा 24की तुलना में 79% ज्यादा था.”

पिछले 14 वर्षों में भारत में मृत्युदंड का परिदृश्य

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित व्यापक सिद्धांत, जो कहता है कि केवल अति दुर्लभ श्रेणी से संबंधित अपराध को ही मौत की सजा की योग्य मन जाता है. इसलिए देशभर में मृत्युदंड के मामलों की संख्या कुछ ही है. हमें ये बात भी ध्यान में रखनी होगी कि उँगलियों में गिने जा सकने वाले कुछ चुनिन्दा मामलों को छोड़ दें तो, ऐसे किसी मामले के थाने तक पहुचने, बड़ी जद्दोजहद के बाद मामला दर्ज होने, सुनवाई चलने और फ़ैसला सुना दिए जाने तक की प्रक्रिया बहुत लम्बी और थका देने वाली होती है
जहां तक मौत की सजा के निष्पादन का संबंध है, 1993 के मुंबई बम विस्फोट मामले में अपनी भूमिका के लिए सजा पाए याकूब मेमन के सबसे हालिया मामले समेत, 2004 से केवल चार दोषियों को फांसी दी गई है. बलात्कार के लिए मौत की सजा का सबसे हालिया उदाहरण 2004 का है, जब 1990 में कोलकाता में एक किशोरी से बलात्कार और हत्या के लिए धनंजय चटर्जी को फांसी की सजा दी गई थी. फांसी पर चढ़ाए जाने से पहले, चटर्जी का मुकदमा लगभग 14 साल तक चला था.

क्या कहते हैं एनसीआरबी के आंकड़े

गृह मंत्रालय (MHA) के अधीन आने वाले संगठन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा प्रकाशित ‘भारत में अपराध’ की पिछली रिपोर्ट 2016 की है. 2016 के इस ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में 38,947 मामले दर्ज हुए, जबकि पिछले वर्षों के 16,124 मामले जांच के लिए विचाराधीन थे. तो वर्ष 2016 के लिए कुल 55,071 मामले जांच के दायरे में थे. इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि उस समय 1,52,165 मामले मुकदमा-प्रक्रिया के इंतजार में थे. एनसीआरबी के ये आंकड़े 2016 में प्रकाशित हुए थे. अगर हम ये भी मान लें कि पिछले तीन साल में बलात्कार के मामलों की संख्या उतनी ही रही जितनी उससे पहले थी तब भी, प्रधानमंत्री का यह निष्कर्ष कि आपराधिक न्याय प्रणाली में काफी सुधार हुआ है, एक छलावा है. पीएम मोदी का तर्क, तेज़ सजा के केवल चुनिंदा मामलों (अपवाद) पर आधारित है.

नरेंद्र मोदी का ये कहना पूरी तरह गुमराह करने वाला है, कि भारत की न्याय प्रणाली में, विशेष रूप से महिलाओं के खिलाफ अपराध में, काफी सुधार हुआ है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ऐसे मामले जिनमें सज़ा बहुत जल्दी सुना दी गई, वे इक्का-दुक्का ही हैं और इतने थोड़े से मामलों को पूरी न्याय प्रणाली का आइना नहीं माना जा सकता. यह केवल चुनिंदा मामलों पर आधारित है, जिनमें बलात्कार के अभियुक़्तों को शीघ्र शैली में सजा सुनाई गई है. फिर भी, प्रधानमंत्री को ANI और दिलचस्प तरीके से उनकी अपनी पार्टी द्वारा भी, गलत उद्धृत किया गया था. अपने भाषण में, वे ‘मौत की सजा’ का जिक्र कर रहे थे ‘फांसी पर लटकाने’ का नहीं।
पूर्व में, ऑल्ट न्यूज़ ने जयदीप सरकार का एक विस्तृत विश्लेषण प्रकाशित किया था जिसमें उन्होंने सवाल उठाया था कि क्या महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते यौन अपराधों का समाधान मौत की सजा है; और निष्कर्ष दिया था कि यह नहीं है.

कुल जमा बात ये कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने चक्कर खाते मंच के बीच खड़े हो कर जो दावा किया कि उनके आने के बाद से बलात्कार के दोषियों को 3 दिन से लेकर एक महीने के भीतर ही फांसी दी जा रही है, वो कोरी गप्प भर है.

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