• 7.02.2019

 

दिल्ली| अम्बेडकरवादी लेखक संघ द्वारा बीते दिनों 3 और 4 फ़रवरी को राजधानी दिल्ली के दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैम्पस स्थित किरोड़ीमल कॉलेज परिसर में नेशनल दलित लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन किया गया. अपनी तरह का देश में ये पहला आयोजन था. दलित मुद्दों पर लिखी गई ज़्यादातर किताबें इस येव्स्तिवल में उपलब्ध थीं. आयोजन की ख़ास बात ये भी रही कि यहां सिर्फ़ किताबें ही नहीं, किताबों के लेखक भी मौजूद थे जिन्होंने आगंतुकों के साथ अपने अनुभव भी साझा किये.


 
सीधे तौर पर कहें तो देशभर के दलित बुद्धिजीवियों का एक खुली छत के नीचे महत्वपूर्ण जगह जमावड़ा था. जिसकी जरूरत बहुत महसूस की जा रही थी.
यह फेस्टिवल दो दिन के लिए आयोजित किया गया था. आयोजको ने कहा कि वो अब इसका आयोजन लगातार करते रहेंगे. महोत्सव में मॉब लीचिंग, सवर्ण आरक्षण और दलितों पर बढ़ रही नफरत की घटनाओं पर बात हुई.

इस महोत्सव की थीम “साहित्य की एक नई दुनिया संभव है” रखी गई थी. इस महोत्सव में लगभग 20  भाषाओं के साहित्यकारों और लेखकों ने भाग लिया.


 
यहाँ मेधा पाटकर, लक्ष्मण गायकवाड़, ममता कालिया,श्योराज सिंह बेचैन, मोहनदास नेमिषारण्य जैसी हस्तियों ने शिरकत की.
साहित्यकार मोहनदास नेमिषारण्य ने कहा कि “दलित साहित्य तक़लीफ़, बुलंद आवाज़ और संघर्षो का गवाह है”.

 

अनुज श्रीवास्तव की रिपोर्ट 

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