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 1. || घरौंदा ||

उन मिट्टी के घरौंदों की कोई तस्वीर नहीं है पास मेरे
जो रचती थी माँ.. बड़े प्यार से हर दिवाली..

उपर-नीचे कमरे होते और सबसे ऊपर एक बरसाती
खिड़कियों और दरवाज़ों पर लेस के पर्दे उजले-नीले
खंभों वाले बरामदे से सीढ़ियाँ जातीं ऊपर तक..

लंबा एक सहन होता था और लाल बजरी का रस्ता
बागीचे में कुछ नन्हे पौधे और कोने में एक बेंच भी बनती
माचिस के खाली डब्बों के फर्नीचर कमरों में होते..

सर्दी के शुरुआती दिन और गुड़ियों को भी ठंडी लगती
माँ बुनती कुछ नन्हे स्वेटर गुड़ियों के दिवाली पर
बड़े ठाठ की दिवाली मनती गुड़ियों की घरौंदे में..

वो चूने गेरू से रंग कर निखरा हुआ घरौंदा जिसकी..
अल्बम में कोई तस्वीर नहीं.. पर दिल में है महफूज़ मेरे

2. ||उसे नहीं पसंद हैं फूल ||

उसे नहीं पसंद हैं फूल..
मुझे पता नहीं था दिनों तक कि
कोई हो सकता है ऐसा भी जिसे..
नापसंद हों फूल..पर उसे नापसंद थे
वजहें भी थीं उसके पास कि..

‘मुर्झा जाते हैं फूल बस दो-एक दिन में
और काट लिए जाते हैं क्यूँकि सुंदर हैं
और रख देते हैं फिर पानी में सजाकर
फिर जब शुरू होती है सड़न धीरे से और
पँहुच जाती है डंडियों से फूलों तक..

बस बिल्कुल तभी.. नाक से होकर पंहुच जाती है
दिमाग की शिराओं तक इनकी सड़ांध और..
सुंदरता की सड़न होती है सबसे वीभत्स’
बस इसलिए.. नहीं पसंद थे उसे फूल
अब भला यह क्या वजह हुई नापसंदगी की..

पर कभी नहीं आए उसे फूल पसंद.. कभी नहीं
और मुझे समझ नहीं आई वजह नापसंदगी की
अब फूल तो होते ही हैं कि.. तोड़ो सजाओ
और सड़ जाएं तो उठा कर फेंक डालो..
खैर! मुझे क्या .. पसंद अपनी-अपनी!!

3 || . डायरी ||

बीत गईं कुछ बातें थीं
भूल गई कुछ यादें भी

एक सूखा हुआ गुलाब
एक पन्ने पर फैली हुई-
रोशनाई में गुम से अक्षर

तितली के पंखों से छूटे-
बिखरे थे कुछ रंग वहाँ
तारों वाली रातें कुछ थीं
उजले भीगे दिन कितने थे

जाने कितनी बातें कितनी यादें
जाने कब से खोई थी….
आज मिल ही गई वो डायरी।।

4. || दीवार ||

ये जो चुपचाप खड़ी दीवार थी..
जाने कितने घर बस आए इसके अंदर
और इसने जाने कितने आँगन बांँटे
कब-कब टूटी और कब खड़ी हुई
जाने क्या-क्या जब-तब देखा..
आँधी पानी सर्दी गर्मी हर मौसम
प्यार -मुहब्बत झगड़े-झंझट..
बस हर पल यूँ ही चुपचाप खड़ी रही
पुरानी होती रही गिर जाने तक..
कुछ औरतें भी दीवारों सी होती हैं…

 

5. || स्पर्श ||

जाते हुए सूरज ने धीरे से
गंगा की लहरों का स्पर्श किया
और, गंगा के कपोल सिन्दूरी हो उठे

आसमान में रूई से उजले बादल
पौधों की कुछ नर्म सी फुनगियां
मंदिर के शीर्ष का ऊँचा त्रिशूल
पानी में पैर डाल कर बैठी वृद्धा के चाँदी से केश
इस मिलन के सारे साक्ष्य, अबीरी-अबीरी हो उठे
झुटपुटे के पर्दे में सूरज के छुप जाने तक

काश! कि मैं चित्रकार होती, तो शायद समेट पाती
चन्द कतरे इस दृश्य के.

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