तुम्हारी तरह न मेरे पास
शब्द पिरोने की कला है
और ना ही शब्दों की
कोई मोटी सी गठरी
हा, जब जरूरत पड़े
तो एक ऑक्सफोर्ड की
शब्दकोश जरूर है..

पर भावनाओ को शब्दकोश में
आखिर कैसे ढूंढ़ा जाए?
अब तुम कोई राजनैतिक दल का विषय तो हो नहीं
जिस पर मै भाषण दे दूं
और सब सही सही व्यक्त हो जाए।

तुम तो इश्क हो मेरा ,
जिसे जी भरके निहारने का दिल करता है
बार बार कुछ कहने का दिल करता है
जिसके साथ घंटो हाथ पकड़कर बैठने को मचलती हू
जिसके आगे इतराने को मिल जाए
अपनी बचकानी हरकते करने को मिल जाए

बस…..वहीं है ना, कि शब्दों के जाल में
फसकर रह जाती हू,
शब्दों से खेल नहीं पाती
कि ठीक से अभिव्यक्त कर सकूं
अपने इश्क को
अपनी मोहब्बत को।।

…प्रिया शुक्ला